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“लफ्ज़ो कि ज़ुबान”

MAST HAI=2

चंद टेढ़ी मेढ़ी लकीरो से
बनता है उसका वुज़ूद
कागज़ पर उतर कर
ज़िंदा करती गुजरा कल
कुछ भी ना बोले
पर सब कुछ कह देती है
वो है लफ्ज़ो कि ज़ुबान
जिसने छुआ इसे कभी
लज्ज़त में फिर डूबता गया
एहसास के गहरे समंदर में
तैरता रहता क़श्ती कि तरह
जो समझते है इस ज़ुबां को
उनके लिए ये इक जूनून
ज़ज्बातो को अपने फिर
पहनाते है अल्फ़ाज़ी लिबास
अलग अलग है रंग जिनके
ख़ुशबू भी है ज़ुदा ज़ुदा
कभी उदास, कभी बदहवास
जो रूठी तो दर्द बनी
लफ्ज़ो से रिसता हुआ
दर्द धीमे धीमे टपकता है
माशूक़ कि पलकों से जो लिपटी
हुस्न-ओ-नज़ाकत कि अदा कहलाई
कलम का उम्दा फ़न है ये
जिसे चाहे फ़राज़ दे
नूरानी क़ैफियत से नवाज़ दे
शब्दो के इस मेले में
बस ये कह रहा ‘इरफ़ान’
शायर के दिल से जो है जुड़ी
वो है लफ्ज़ो कि ज़ुबान …..