तुम आओ तो बात बने

कहती है तन्हाई अक्सर ये मुझसे के तुम आओ तो बात बने
थक गई निगाहें राह तकते-तकते तुम आओ तो बात बने

तेरी परछाई का नामोनिशां नज़र तक नहीं आता कहीं अब
इंतज़ार में है इंतज़ार जो मिलने तुम आओ तो बात बने

रुख़्सत के वक़्त भले ही अपना सब कुछ वापस ले जाना
पर अलविदा से पहले इक़रार करने तुम आओ तो बात बने

मेरे नसीब में क्या है ये तो मैं नहीं जानता
मगर हबीब मेरे गर नसीब में मेरे तुम आओ तो बात बने

एक अर्से से दिल ये मेरा टूटा हुआ आईना है
गर इस आईने में अक्स देखने तुम आओ तो बात बने

दूरियों ने बहुत कोशिश की हैं हमें दूर-दूर करने की
जो अब दिल से दूरियां मिटाने तुम आओ तो बात बने

ये ज़िंदगी तो ख़ैर यूँही तन्हा गुज़र गई इरफ़ान
गर फ़िरदौस में साथ मेरा देने तुम आओ तो बात बने।

मैं काग़ज़ पर दिल की बेचैनियाँ उड़ेलता हूँ

जो कह नहीं पाता उसे लिख देता हूँ
मैं काग़ज़ पर दिल की बेचैनियाँ उड़ेलता हूँ

मुझे भला किसी सितमगर की क्या ज़रूरत
मैं अपने ज़ख़्म यहाँ ख़ुद कुरेदता हूँ

उसने बड़ी चालाकी से पीठ पर वार किया
इसीलिए तो धोखे से इतना डरता हूँ

सुना है लोग मुझको मजनूँ बुलाते हैं
बुलाएंगे ही सही हर वक़्त लैला-लैला करता हूँ

तुमने आने में ज़रा देरी कर दी
अलविदा ओ मेरी लैला अब मैं चलता हूँ।

सर्दियों में मुँह से निकलते धुएं की मानिंद है ये ज़िंदगी

सर्दियों में मुँह से निकलते धुएं की मानिंद है ये ज़िंदगी
वज़ूद जिसका बस कुछ देर तक ही कायम रहता है
बाद उसके वो हवा हो जाता है
ना जाने कहाँ खो जाता है
या यूँ कहे के फ़ना हो जाता है

मगर जितनी देर भी वो कायम रहता है
कई तरह के अलग-अलग नज़ारे दिखाता है

कभी वो हँसी का छल्ला बन जाता है
तो कभी ग़मों का मोहल्ला सजाता है
कभी वो खुशियों का मल्लाह बन जाता है
तो कभी ख़ाहिशों का दुमछल्ला कहलाता है

सर्दियों में मुँह से निकलते धुएं की मानिंद है ये ज़िंदगी
वज़ूद जिसका बस एक उम्र तक ही कायम रहता है
बाद उसके वो हवा हो जाता है
गहरी वाली नींद में सो जाता है
या यूँ कहे के धुँआ हो जाता है।

#poetry #rockshayar #shayari #nazm

तुम्हारा हँसना बारिश से कम नहीं लगता मुझे

तुम्हारे चेहरे पर ये ग़म नहीं जचता मुझे
तुम्हारा हँसना बारिश से कम नहीं लगता मुझे

पहली दफ़ा जब मिली थी मेरे लिए अजनबी थी
चेहरा ये तेरा अजनबी हाँ अब नहीं लगता मुझे

डर लगता है आज भी फिर से टूट जाने का
पर साथ तुम्हारे जब होता हूँ डर तब नहीं लगता मुझे

सुना है मुझे ग़म देने वाले आजकल ख़ुद ग़मज़दा हैं
अफ़सोस के ग़म भी अब तो ग़म नहीं लगता मुझे

बेशक मौजूद हैं यहाँ एक से बढ़कर एक फ़नक़ार
पर अपना क़िरदार किसी से कम नहीं लगता मुझे।

My Rock Style

मेरा लहजा समझने वाले खुद को भूल जाते हैं
कई दिनों तक खुद में वो मुझको ही पाते हैं

हालांकि मैं ये सब जानबूझकर नहीं करता हूं
मैं उनका दिल बहलाता हूं वो मेरे ज़ख़्म सहलाते हैं

“दहशतगर्दो के नाम मेरा ये पैग़ाम”

यूँ तो नाम से मैं भी एक ख़ान हूँ,
दीन-ओ-मज़हब से मुसलमान हूँ

कुरआन-ओ-हदीस की रौशनी में,
अल्लाह रसूल पर रखता ईमान हूँ

हलाल-हराम में फर्क़ समझकर,
इस्लाम को मानने वाला इंसान हूँ

नबी के तरीके ज़िन्दगी में लाकर,
नेकी की राहों पर गतिमान हूँ

मुल्क़ में अम्न-ओ-चैन के लिए,
इंसानियत की ख़ातिर क़ुर्बान हूँ

जो भी हूँ मैं जैसा भी हूँ इरफ़ान
नहीं मगर तुम्हारी तरह हैवान हूँ

© RockShayar Irfan Ali Khan

जय हिंद

सुन बे नापाक पड़ोसी तुझे हम अब और मौका नहीं देंगे
खत्म हुई मोहलत तेरी अब तो बस घर में घुसकर मारेंगे

सालों से तू हमारे सब्र को कमज़ोरी समझता रहा
खुल्लमखुल्ला हमेशा चोरी करके सीनाजोरी करता रहा

अपने हालात के लिए तू खुद जिम्मेदार है
दहशत का गढ़ तू पूरे इस्लाम का गद्दार है

ना तो तुझे मासूम बच्चों की चीखें सुनाई देती हैं
ना ही अपनी आवाम की बदहाली दिखाई देती हैं

सत्तर सालों से एक पागल कुत्ते की तरह भौंक रहा है
साड्डी जनता को भुखमरी व दहशतगर्दी में झोंक रहा है

नित नये राग बदलकर जंग की गीदड़ भभकी देता है
हर बार हाथ मिलाने के बहाने पीठ में छुरा भोकता है

कुत्ते की पूँछ न तो कभी सीधी हुई न ही कभी होगी
अब तो बस तेरी हालत कुछ इसी तरह पतली होगी

सुन बे नामुराद पड़ोसी अब तुझे हम और मौका नहीं देंगे
सब्र हमारा खल्लास हुआ अब तो यूँही घर में घुसकर मारेंगे

#RockShayar

सोचते-सोचते

कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है मनवा सोचते-सोचते
के कहीं कोई नज़र नहीं आता हैं रस्ता देखते-देखते

अब और क्या तोड़ोगे हमारे दिल को सनम
पत्थर हो चुका है दिल भी तो ये सज़ा सहते-सहते

दर्द की वो इंतहा आकर गुज़र भी गयी
आंसू भी हंसने लगे हैं अब तो यहाँ बहते-बहते

कुछ तो तक़्दीर के तिलिस्म,
और कुछ ख़ाहिश-ए-जिस्म
क्या से क्या बन जाता है इंसान यहाँ देखते-देखते

ग़ैरों से शिकवा भला, करना ही क्या इरफ़ान यहाँ
एक उम्र गुज़र जाती हैं यहाँ अपना पता पूछते-पूछते।

आईने से बातें

आईने से आख़िर क्या बातें करते हो
बताओ कभी
तुम दोनों के बीच हुई वो अनकही बातें
जो न बता सको तो जताओ कभी
तुम दोनों के दरमियां वो अधूरी मुलाक़ातें
जो न जता सको तो सुनाओ कभी
तुम दोनों के भीतर दबी वो अनसुनी आहें
जो न सुना सको तो दिखाओ कभी
तुम दोनों की आँखों में ठहरी वो गीली यादें

आईने से आख़िर क्या बातें करते हो
बताओ कभी
यूं देर तलक आलम-ए-तन्हाई में
आईने के भीतर किसे निहारते रहते हो
अनगिनत अक्स के बीच
आख़िर किसे तलाशते रहते हो
बताओ कभी
चलो अब बता भी दो

Raj Mandir Cinema Jaipur

लोग यहाँ सिर्फ फ़िल्म देखने नहीं आते हैं

वो यहाँ आते हैं

ज़िन्दगी को पर्दे पर साकार होते देखने

Salute to Real Heroes

बेशक़ीमती है ये किसी मुआवज़े की मोहताज नहीं
बयान कर सकू मैं शान ऐसे तो कोई अल्फ़ाज़ नहीं

इसकी क़ीमत लगाने की ज़ुर्रत न कर बैठना सियासतदारों
ये शहादत है तुम्हारा कोई सियासी तख़्त-ओ-ताज नहीं

Zindagi ka yeh offer hai limited

ज़िन्दगी का ये ऑफर है लिमिटेड
समटाइम शाइनी समटाइम ग्रे शेड

ऐवरीडे खुलते जाये जित्ते न्यू पिटारे
खुली आईज से देखो उत्ते व्यू नज़ारे

सरप्राइज है जित्ते साइज भी उत्ते
एज पर किस्मत है प्राइज भी उत्ते

जाॅय दी राइड विद ग़मग़ीन टाइड
फुल ऑन फील रखो टेंशन साइड

अप एन डाउन डे नाइट लाइफ डेथ
बुलशिट है सब रखो गर खुद पे फ़ेथ

साॅ ऑवरआल फंडा है बस यही
प्रजेंट में जियो है अर्जेंट बस यही

ज़िन्दगी का ये ऑफर है लिमिटेड
समटाइम शाइनी समटाइम ग्रे शेड ।।

#RockShayar

#Pray4MyPaPa

After successful completion of the Whole Brain Radio Therapy, now the Chemotherapy will be started on 11th February 2K19@BMCHRC, Jaipur under the supervision of renowned Medical Oncologist Dr. Naresh Somani.

It is the 3rd clinical process followed by the Surgical and Radiation Oncology. It is also known as Medical Oncology.

PAPA you must have to defeat CANCER again and again at every single stage.

अल्लाह आपको शिफ़ा-ए-क़ामिला अता करे…आमीन…Aameen

“ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है”

कभी गिरती है कभी संभलती है
ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है

बाहें खोले बेबाक बहती है
न जाने कौनसी गली में रहती है
पता मिल जाये तो बताना मुझे
इसे कैसे जीते है सिखाना मुझे

कभी हँसती है कभी रोती है
ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है

तरह-तरह के दौर दिखाती है
न जाने किसकी याद दिलाती है
याद करके जिसे आँखें भर आती हैं
अश्क़ों में उसी की बातें नज़र आती हैं

कभी गिरती है कभी संभलती है
ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है।

@RockShayar.com

“वतन-वतन”

साल में दो दिन वतन-वतन करने वालों
तुमको साड्डे वतन दा प्यार भरा सलाम

ज़रा ग़ौर से सुनना तुम देशप्रेमी लोग आज
वतन ने ख़ास तुम्हारे लिए भेजा है ये पैग़ाम

सुबह-सुबह जो तिरंगे वाली तीव्र लहर शुरू होती है
दोपहर आते-आते तो वो पूरी तरह दम तोड़ देती है

देशभक्ति वाले धांसू गीत गाकर और चंद लटके-झटके दिखाकर
बताओ तो तुम ये वतनपरस्ती का कौनसा नमूना पेश कर रहे हो?

ये जो मज़हब के नाम पर तुम लोग एक दूसरे को मार डालते हो
सच कहूं तो तुम मुझे नित नये कभी नहीं भरने वाले घाव देते हो

साल में दो दिन वतन-वतन करने वालों
तुमको साड्डे वतन दा है बस इत्ता ही कहणा

चाहे कुछ भी हो जाए
पर अपने अंदर इंसानियत को मरने ना देणा

चाहे कुछ भी हो जाए
पर अपने अंदर थोड़ी इंसानियत बचा के रखणा

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए जश्न मनाओ तुम
फिर चाहे मेरी शान में ख़ूब जोशीले नग़मे सुनाओ तुम

अगर मेरी कोई बात बुरी लगी तो बहुत अच्छी बात है
आख़िर वतन हूँ मैं तुम सबका नाम मेरा हिंदोस्तान है।

@RockShayar.com

मैं अब वो दिन नहीं रहा रात काली हो चुका हूँ

अंदर से पूरी तरह से ख़ाली हो चुका हूँ
मांगना भूल चुका है जो मैं वो सवाली हो चुका हूँ

मेरी परछाई का पीछा करने वाले तुझे मायूस होना पड़ेगा
मैं अब वो दिन नहीं रहा रात काली हो चुका हूँ

वो जब डूबने लगते है

वो जब डूबने लगते है मदद के लिए हमेशा हमको ही पुकारते है
और अगले ही पल बदले में एक बड़ा सा खंजर पीठ में उतारते है

न जाने कैसा दस्तूर है ये उनका जो अब तक समझ नहीं आया
के वक़्त रहते तो क़द्र करते नहीं और बाद में वक़्त-वक़्त पुकारते है

उसने हमदर्द बनके हर बार हज़ारों दर्द दिए

उसने हमदर्द बनके हर बार हज़ारों दर्द दिए
पुराने हो चले थे सो फिर से नए ज़ख़्म दिए

वो जानता था के मैं चुका नहीं पाउंगा कभी
उसने फिर भी मुझ को कर्ज़ पे कर्ज़ दिए

शिकवा भी क्या करे किसी और से हम यहां
जब ख़ुद अपने ही हकीम ने हम को मर्ज़ दिए

हम मरीज़-ए-इश्क़ दिलबर-दिलबर करते रहे
और दिलबर ने दिल खोलकर ख़ूब दर्द दिए

दर्द सहते-सहते जब मौत लाज़िम हो गई
तब जाकर ज़िंदगी ने आँखों में कुछ अश्क़ दिए।

डायरी बोल उठी

काफी देर तक जब मैं अपनी डायरी में कुछ भी नहीं लिख पाया
तब मेरी वो डायरी खुद ही बोल उठी
आखिर किस ख़याल में डूबे हुए हो शायर
जिसने तुम्हें इतना परेशान कर रखा है
कि आज तुमसे एक अल्फ़ाज़ तक नहीं लिखा जा रहा है

अरे तुम तो वो हो जो कुछ ही देर में मेरा पूरा पन्ना भर दिया करते थे
तो फिर आज ऐसा क्या हो गया
जो तुम चाहकर भी मुझ पर कुछ नहीं लिख पा रहे हो

क्या तुम्हें याद हैं वो सारी नज़्में
जो तुमने लिखी थी किसी दौर में मुझमें
पाकर जिन्हें मैं अपने पन्नों पर
खुद को खुशनसीब समझने लग गई थी

तुम भले ही खुद को भूल गए हो आज
मगर मुझे याद है अब भी वो चेहरा तुम्हारा
जिस पर नज़्म लिखते वक़्त एक अलग ही शिद्दत नज़र आती थी
भले ही वो कुछ देर को आती थी, मगर अपना काम कर जाती थी
और फिर मैं उस नज़्म को कई दिनों तक
अपने दामन में समेटकर खुशियां मनाती थी

सुनो ना शायर, चाहे कोई समझे या न समझे
पर मैं तुम्हारे जज़्बात बख़ूबी समझती हूँ
तो ज्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है
मैंने तुम्हारे वो सब अनलिखे अल्फ़ाज़
आज भी ठीक उसी तरह समझ लिए हैं
जैसे पहले समझ जाया करती थी
मुझे यक़ीन है कि तुम मुझे फिर से खुशनसीब ज़रूर बनाओगे
तब तक के लिए तुम बस मुझे अपने सिरहाने रखकर सो जाओ
और मेरे साथ मेरी दुनिया में चले आओ
सुनो मेरे साथ मेरी दुनिया में चले आओ…

पता कोई पूछे तो कहना वक़्त के सताये हैं

कुछ राज़ हमने सिर्फ ख़ुद को ही बताये हैं
पता कोई पूछे तो कहना वक़्त के सताये हैं

तक़दीर का तिलिस्म भी देखो कितना अजीब है
वो आज खुद चलकर हमारे दर पे आये हैं

हमने भी कोई कसर नहीं छोड़ी ख़ातिर में
आख़िर में लफ़्ज़ शातिर के मानी उन्हीं ने तो सिखाये हैं

वो अब रोज़ माफ़ी मांगते है, खुद से भी और मुझसे भी
ज़िन्दगी ने भी क्या-क्या मंज़र दिखलाये हैं

हमने तो उन्हें कब का माफ़ कर दिया
ये तो वक़्त की लौटकर आने वाली सदाये हैं

उस दौर को जब याद करते है तब यही याद आता है
के कुछ रिश्ते हमने बेवज़ह ही निभाये हैं

बड़ी मुश्किल से इस टूटे दिल को सहेज पाये हैं
पता कोई पूछे तो कहना वक़्त के सताये हैं…

@RockShayar.com

दिल ने जब आदाब कहा तेरी यादों से

नींद गायब हो गई मेरी इन आँखों से
दिल ने जब आदाब कहा तेरी यादों से

बहुत दिन हो गए तेरा ख़्वाब नहीं आया
मुझको सुकून मिलता है तेरे ख़्वाबों से

तूने मुड़कर देखना भी गंवारा न समझा
मुझको शिकायत है तेरे उन वादों से

चलो इतना तो बता दो मुझे तुम
क्या मिटा पाई हो अपनी यादों से

जवाब देना न देना तुम्हारी मर्ज़ी है
मेरा तो सवाल है सिर्फ तेरी आँखों से।

सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं

सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं
चोर को हराके डाकू को जिताते हैं
सत्ता की कुर्सी पांच साल की लीज पर दे देते हैं
हालांकि पहले ही साल अपनी गलती मान लेते हैं
द्रुतगति से सिस्टम को कोसना शुरु कर देते हैं
और अगले चुनाव में फिर किसी मौसेरे को चुन लेते हैं
पब्लिक हैं भई आखिर पूरा लोकतंत्र चलाते हैं
सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं…

हमने कई सूरमाओं को धूल चटाई हैं
हमने कई नेताओं को नानी याद दिलाई हैं
मगर अब तक हमारी समझ में ये बात ना आई हैं
के इन नेताओं को चुनाव के वक़्त ही हमारी याद क्यों आई हैं

सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं
चोर को हराके डाकू को जिताते हैं
प्रदेश का फ्यूचर पांच साल के अनुबंध पर दे देते हैं
हालांकि पहले ही साल अपनी गलती मान लेते हैं
द्रुतगति से दूसरा विकल्प खोजना शुरु कर देते हैं
और अगले इलेक्शन में फिर किसी मौसेरे को चुन लेते हैं
सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं
चोर को हराके डाकू को जिताते हैं।

“Suno Ae Taj” (सुनो ऐ ताज)

देखिए एक शायर की ताजमहल से की गई अब तक की सबसे अनोखी और तल्ख़ गुफ़्तगू जिसने आखिर में खुद मुमताज की रूह को क़ब्र में छटपटाने और शायर में समाने पर मज़बूर कर दिया…

Emotional Love Poetry by RockShayar Irfan Ali Khan at Nojoto Open Mic Agra which was held on 30th September, 2018. Watch Heart Touching Hindi Poetry. 

पश्मीना वो यादें तेरी

दर्द के सर्द मौसम में जब ज़िंदगी बग़ावत करती है
पश्मीना वो यादें तेरी मेरी रूह की हिफ़ाज़त करती है।

तू तो न जाने वादी के किस हिस्से में रहती है
ये ज़िंदगी तो अब तेरी तलाश से मोहब्बत करती है।

मिलेगी जो किसी मोड़ पर तो पूछूंगा ऐ ज़िंदगी
तू क्यूँ हर बात पर इतनी शिकायत करती है।

बहुत पसंद था न तुझे मेरे मोहब्बत करने का अंदाज़ वो
और मुझे ये बात के तू उस अंदाज़ से मोहब्बत करती है।

इत्तेफ़ाक़न ही सही पर इक मुलाक़ात तो हो कभी
बस इसीलिए तो आँखें तेरे ख़्वाब की हसरत करती है।

मालूम नहीं था मुझे दस्तूर तेरे फ़िरदौस का
के हूर जहां केवल फ़रिश्तों से मोहब्बत करती है।।

लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सफेदपोश उड़ा रहे इक दूजे का मखौल है
लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सियासती इस दौर में बहुत कुछ बदलने वाला है
आज है जो गली का गुंडा कल वो वज़ीर बनने वाला है

पंचवर्षीय ये योजना फिर से दोहराई जाएगी
बेचारे कर्मचारियों की इलेक्शन ड्यूटी लगाई जाएगी

ऐसी ड्यूटी से तो हर कर्मचारी को मुक्ति चाहिए
और जनता को तो बस भ्रष्टाचारी से मुक्ति चाहिए

ऐसे में मतदान के रूप में उम्मीद की नई किरण नज़र आती है
मगर नई सरकार बनते ही खुद अपने भरण-पोषण में जुट जाती है

हालांकि इलेक्शन कमीशन लगातार अपनी रेप्यूटेशन बनाए हुए है
मुद्दत से इस महान डेमोक्रेसी का डेकोरम मेंटेन किए हुए है

मगर अफसोस के पॉलिटिक्स को कुछ नेताओं ने गंदा किया
सत्ता को सट्टा समझकर उसे अपना पुश्तैनी धंधा बना लिया

पहले बैलट होता था अब ईवीएम का जमाना है
हर पार्टी का मूलमंत्र यही के बस पब्लिक को रिझाना है

अब देखना ये है कि जनता किसे चुनती है
शायद जो कमचोर है जनता उसे चुनती है

अपना अच्छा-बुरा जनता को खुद समझना चाहिए
इस बार तो ईवीम पर केवल नोटा ही दबना चाहिए

हो सकता है ये पंचवर्षीय फुटबॉल मैच यही खत्म हो जाएं
और शासन चलाने का कोई नया फॉर्मूला हाथ लग जाएं।

परिन्दा

कोई तो अंदर है जो बाहर आने को छटपटा रहा है
शायद कोई परिन्दा है जो उड़ने को फड़फड़ा रहा है

पर कट चुके हैं सभी, पर सोच के पर बाक़ी हैं अभी
सोचकर यही वो परिन्दा गिरकर भी मुस्कुरा रहा है

एक दिन तो छूना ही है उसे, ये सारा नीला आसमां
फिलहाल तो वो ज़मीं पे अपने क़दम आज़्मा रहा है

क़ैद किया था जिसने उसे, अँधेरे इक कमरे में कभी
सुना है इन दिनों खुद को वो उसी कमरे में पा रहा है

किसी हादसे ने नहीं, उसे उसके घर ने बेघर किया 
तभी वो परिन्दा साँझ ढले अब अपने घर नहीं जा रहा है…

#RockShayar

तेरे गुलाबी गालों सा लगता है मेरा शहर

Dedicate to Delicious Kashmiri Cuisine…

तेरे शहर की नून चाय सा दिखता है मेरा शहर
सुन तेरे गुलाबी गालों सा लगता है मेरा शहर

मिलने आओ न कभी तुम पहाड़ों से मैदान में
वादियों के जहान से मेरे दिल के रेगिस्तान में

दिल ने बनाया जिसे मोहब्बत के उस मक़ान में
शिद्दत से सजाया जिसे उस दावत-ए-वाज़वान में

शुरूआत में तुमको लज़ीज़ तबाक माज परोसूंगा
साथ में जिसके बीते लम्हों की बाकरखानी होगी

और फिर मैं तुमको इश्क़ का वो क़हवा पेश करूंगा
तन्हाई में जिसे मैंने चाँद के नूर से तैयार किया था

हालांकि यादों का यख़नी पुलाव भी बनकर कब से तैयार है
मगर ग़मों की गुश्ताबा करी एक अर्से से ज़ेहन पर सवार है

यक़ीनन कुछ जज़्बात अब भी सहमे हुए और ख़ामोेश हैं
पर कोई बात नहीं अभी हमारे पास रूहानी रोग़न जोश है

तो बताओ फिर कब आ रही हो मेरे शहर
अब तो मेरी नून चाय भी खत्म हो गई है

अब तो इस इंतज़ार को और इंतज़ार न बनाओ
अब तो बस आ ही जाओ सुनो तुम आ ही जाओ

वरना मैं तो फिर आ ही रहा हूँ इस बार तेरे उन पहाड़ों पे यार
देख ही लूंगा इस बार आख़िर ऐसा क्या है उन पहाड़ों के पार।

नून चाय – कश्मीरी चाय जो गुलाबी रंग की होती है
वाज़वान – कश्मीरी व्यंजनों में एक बहु-पाठ्यक्रम भोजन है
लज़ीज़ – स्वादिष्ट
तबाक माज – तले हुए मटन चॉप्स
बाकरखानी – एक मोटी मसालेदार रोटी
क़हवा – कश्मीरी कॉफ़ी
यख़नी – कश्मीरी पुलाव का एक अन्य रूप
गुश्ताबा करी – पारंपरिक कश्मीरी करी
रोग़न जोश – कश्मीरी मटन डिश

मुझको आजकल कहीं भी सुकून नहीं मिलता

मुझको आजकल कहीं भी सुकून नहीं मिलता
लिखना तो चाहूँ लेकिन मज़्मून नहीं मिलता।

अभी कुछ और तड़पना होगा, कुछ और बरस
इतनी जल्दी तो किसी को जुनून नहीं मिलता।

गर जुड़ाव हो तो ज़मीन-ओ-आसमां के जैसा
दरमियाँ जिनके कहीं कोई सुतून नहीं मिलता।

आधी उम्र गुज़र गई, तब जाकर ये पता चला
के मेरे अपनों से मेरा ज़रा भी ख़ून नहीं मिलता।

तोड़ने पर मिले सज़ा, दिल जोड़ने पर मिले जज़ा
इस जहां में ऐसा तो कोई क़ानून नहीं मिलता।।

@RockShayar.com

मज़्मून – विषय, Subject
सुतून – खंभा, Pillar
जज़ा – अच्छे काम का बदला, Reward

“उसकी कहानी उसका हर इक अश्क़ कहता है”

कोई कमबख़्त कहता है कोई बदबख़्त कहता है
फ़क़त इक यार ही तो मुझ को दरख़्त कहता है।

उसने देखा है मुझ को शजर से पत्थर होते हुए
वो मेरे दर्द को छूकर उसे फिर नज़्म कहता है।

क़ैद हैं क़िस्से कई उसकी पथराई आँखों में
उसकी कहानी उसका हर इक अश्क़ कहता है।

छुपाएं थे मैंने कभी ज़ख़्म किसी जमाने में
ज़माना जिसे के गुज़रा हुआ वक़्त कहता है।

बिन बताएं वो बिन जताएं दर्द से राहत दिलाएं
इसीलिए तो हर शख़्स उसे हमदर्द कहता है।

फ़र्क़ नहीं पड़ता मुझे अब ज़माने के किसी ताने का
ज़माना तो हर ख़ुद्दार को ख़ुदग़र्ज़ कहता है।।

कमबख़्त/बदबख़्त – अभागा/Unfortunate

फ़क़त – केवल/Only

दरख़्त – पेड़/Tree

शजर – एक पेड़/ a tree

नज़्म – उर्दू में कविता का एक रूप/Poetry

अश्क़ – आँसू/Tears

ख़ुद्दार – स्वाभिमानी/self-respecting

ख़ुदग़र्ज़ – स्वार्थी/Selfish

“माशा अल्लाह ! आपने क्या ख़ूब इंसाफ़ किया”

बे-क़ुसूर को सज़ा सुनाई, गुनहगार को माफ़ किया
माशा अल्लाह ! आपने क्या ख़ूब इंसाफ़ किया।

मुंसिफ़ भी आपका, वकील भी आपका
हमने तो मानो अदालत आके ही गुनाह किया।

मिजाजपुर्सी को आने लगे हैं लोग आजकल
ग़मों ने हमको कुछ इस क़दर बीमार किया।

मुनाज़िर नहीं है वो, जो हर बात पर जीत जाएं
वो जीता इसलिए, क्योंकि उसने पीठ पर वार किया।

घबरा रहा है दिल ये, पिछले कुछ दिनों से बहुत
लगता है इसने फिर किसी पर ऐतबार किया।।

मुंसिफ़ – न्यायाधीश, Judge
मुनाज़िर – शास्त्रार्थ करने में दक्ष, तर्क-वितर्क में माहिर
मिजाजपुर्सी – बीमार का हालचाल पूछना
ऐतबार – भरोसा, विश्वास

“मोहब्बत करना किसी की मज़बूरी नहीं होती”

ये कैसी तलाश है जो कभी पूरी नहीं होती
हरचीज़ को पाने की ज़िद ज़रूरी नहीं होती

बहुत कुछ सिखा देती है ज़िन्दगी
मोहब्बत करना किसी की मज़बूरी नहीं होती

भले ही दूर आसमानों में रहता है वो
गर दिल से मांगों दुआएं कैसे पूरी नहीं होती

कुछ तो कमी रही होगी दर्द के एहसास में
वरना ये कहानी अब तक अधूरी नहीं होती

उसने मुड़के देखना भी ज़रूरी ना समझा
जो देख पाती तो दरमियां आज ये दूरी नहीं होती।

“क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद तुम तुम ना रहोगी”

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मेरे अंदा़ज़ को अपना अंदाज़ बना लोगी
नज़रें मिलते ही अपना सब कुछ गंवा दोगी

एक ही मुलाक़ात काफ़ी है इस तज़ु्र्बे के लिए
क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद तुम तुम ना रहोगी

“लंबे सफ़र में धीरे चलो वरना थक जाओगे”

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हमें पिघलाने की ज़िद में खुद जल जाओगे
जलके हमारी तरह तुम भी राख बन जाओगे

यही सवाल हरबार क़दमों को रोक देता है
बिना तैयारी के बताओ तुम कहां तक जाओगे

जिस रोज़ ज़िंदगी से समझौता किया तुमने
खुद को भुलाके शख़्स कोई और बन जाओगे

बचपन की उस कहानी ने यही सबक सिखाया
लंबे सफ़र में धीरे चलो वरना थक जाओगे

किस बात का गुरूर है, जब बात ही इतनी है
के इस मिट्टी से बने हो इसी में मिल जाओगे

सुनो ऐ नादान परिंदों, हर उड़ान की यही दास्तान
लौटकर तुम शाम को अपने ही घर जाओगे।

“मेरी मौत का पुख़्ता कोई सुबूत नहीं है”

क़िस्सा ये मेरा अभी मशहूर नहीं है
दिल ये पहले सा मज़बूर नहीं है
 
इतनी भी क्या जल्दी है क़ाज़ी साहब आपको
नशे में हूँ, निकाह अभी क़ुबूल नहीं है
 
जांच ज़ारी है, मगर क्या फायदा
मेरी मौत का पुख़्ता कोई सुबूत नहीं है
 
चेहरे पे इतने चेहरे लगाए और हटाए
के चेहरे पे अब वो पहले सा नूर नहीं है
 
हररोज़ मुझसे यही कहती हैं कोशिशें मेरी
के मंज़िल तेरी तुझसे अब दूर नहीं है
 
दिल के नाम पे दग़ा देना बहुत बुरी बात है
बस एक यही बात दिल को मंज़ूर नहीं है।

“Radio Jockey/आरजे/रेडियो जॉकी”

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चाँदनी रातों में अक्सर इक मख़मली आवाज़ गूँजती है
हाँ वही दिलकश आवाज़, जो सितारों तक जा पहुँचती है
 
अपनी अलहदा आवाज़ के ज़रिए, वो जो अल्फ़ाज़ में एहसास भरते हैं
नज़र ना आने वाले ऐसे Hidden Heroes को ही हम आरजे कहते हैं
 
मुख़्तसर में अक्सर बहुत कुछ कह जाते हैं
ना होके भी ये सारा दिन हमारे साथ होते हैं
 
वैसे देखा जाएं तो रेडियो जॉकी पब्लिकली नज़र नहीं आते हैं
मगर फिर भी ये रोज़ाना हमारी ज़िंदगी में मिश्री घोल जाते हैं
 
इनके Good Morning Shows किसी का सारा दिन शानदार बना देते हैं
तो इनके Late Night Shows किसी का टूटा हुआ दिल दोबारा जोड़ देते हैं
खुद को अलग-अलग अंदाज़ में पेश करते हैं
ये ज़िंदगी को ज़ाफ़रानी आवाज़ में पेश करते हैं
 
सुनकर जिसे हम हम नहीं रहते हैं
साथ इनके इक नदी बनके बहते हैं
 
पर्दे के पीछे रहने वाले ऐसे नायाब फ़नकारों के लिए, Standing Ovation तो बनता हैं
बेशक दिल जीत लेने वाले ऐसे On AIR क़िरदारों के लिए, Appreciation तो बनता हैं
 
इन छुपे रुस्तमों को मेरा सलाम, इन छुपे रुस्तमों पर मेरा क़लाम
कभी न कभी तो होगा, इन छुपे रुस्तमों की दुनिया में अपना भी नाम।

#RockShayar

#RadioJockey #आरजे #रेडियोजॉकी

“ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है”

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अपनी ही आहट पे चौंक जाता है
ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है?
 
जो होना है वो तो होकर रहेगा
तू क्यों बार-बार खुद को आज़्माता है?
 
ऐसी भी क्या ज़िद है तेरी, क्या नादानी?
जो शीशे का सर लिए तू पत्थर से टकराता है
 
चंद जज़्बातों की खातिर शहीद हो जाता है
किसी से दूर तो किसी के क़रीब हो जाता है
 
पलभर में चाहे जिसे अपना बना लेता है
बाद में मगर सदियों तक भुला नहीं पाता है
 
धड़कन के ज़रिए तू सबको अपने दिल की बात सुनाता है
दिल जो ठहरा आखिर, मोहब्बत में अपना आप गंवाता है
 
कुछ लोग तुझ पर संगदिल होने का इल्ज़ाम लगाते हैं
तो कुछ लोग तेरे रहमदिल होने का एहसास कराते हैं
 
जुड़ने से पहले ही टूटने के डर से घबराता है
ऐ दिल, तू क्यों हरबार खुद से ही हार जाता है?

“थोड़ा पाने के लिए बहुत तड़पना ज़रूरी है”

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जाने से पहले आखिरी बार मिलना ज़रूरी है
जाते-जाते उसका पलटकर देखना ज़रूरी है

वादा करने वाले, एक वादा तू खुद से ये कर
वादा करने से ज्यादा वादा निभाना ज़रूरी है

जब सारे आंसू खत्म हो गए तो पता ये चला
के थोड़ा पाने के लिए बहुत तड़पना ज़रूरी है

कीमत चुकानी पड़ती है हरएक चीज़ की यहां
मरहूम होने के लिए आपका मरना ज़रूरी है

ये दिल जब टूटा तब बस यही सदा सुनाई दी
के ग़ैरों के बजाय इस दिल पे यक़ीं करना ज़रूरी है

गर्दिश में हो गर सितारे, बस इतना याद रख प्यारे
सुबह की खातिर सूरज का ढलना ज़रूरी है।

“Elasticity/लोच/प्रत्यास्थता”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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इस दुनिया में हर चीज़ बलपूर्वक बदलाव का विरोध करती हैं
लेकिन बहुत कम चीज़ें ऐसी होती हैं, जो बल हटते ही पहले जैसी होती हैं

पदार्थ का यही गुण तो Elasticity है
रबर को देखकर हमें कला ये सीखनी है

मगर Elasticity की भी अपनी एक Limit होती है
क्योंकि हर किसी में इतनी सहनशक्ति नहीं होती है

एक यंगमैन ने सबसे पहले इस बात का पता लगाया
Stress और Strain का Ratio Young Modulus कहलाया

Unit Area पर लगाएं गए Force को ही Stress कहते है
जो कि आजकल हम लोग बहुत ज्यादा ही लेते हैं

वही लंबाई में बदलाव को Strain कहते है
और हिंदी में बोले तो इसे विकृति कहते है

जो कि आजकल हम इंसानों की सोच में आई हुई हैं
देखकर जिसे खुद हैवानियत भी घबराई हुई है

हुक बाबू की माने तो Stress व Strain एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं
Elasticity Constant है अनुपात तथा मात्रक को पास्कल कहते है

हालात कैसे भी हो, अगर हम Elastic बन जाएं
तो बबुआ साड्डी लाइफ भी Very Very Fantastic हो जाएं

वादा है जी, अगला Topic More Than लाजवाब होगा
मलाई की तरह लगेगी पढ़ाई, और मज़ा भी बेहिसाब होगा।

“चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं”

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Woman writing in her diary at sunset

चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं
रह रहकर बाद में बहुत याद आते हैं

साथ चलती है सदा परछाई वक़्त की
बीच-बीच में धूप के साये मुस्कुराते हैं

बिना जिनके हर खुशी अधूरी हैं, साथ जिनका कि बेहद ज़रूरी हैं
अँधेरे में यार सितारों से जगमगाते हैं

ना कोई फ़िकर रहती है, ना कोई परेशानी वहां
ज़ुनून के पौधे जिस जगह लहलहाते हैं

खुशबू आती हैं, हरवक़्त अपने अंदर से 
रूहानियत के फूल सारा आलम महकाते हैं

चाहे जितनी हवा भरो, चाहे जितनी दवा करो
मन के ये गुब्बारे फटाक से फूट जाते हैं

मज़बूरी में साथ निभाते हैं, मज़दूरी में कुछ नहीं पाते हैं
दूर जाने के बाद दोस्त बहुत याद आते हैं।

“आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं”

आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं
शायद! वो और कहीं आबाद होना चाहते हैं।

हमें तो उनकी हरइक साँस, है अब तक याद
और वो है के बीती हुई बात होना चाहते हैं।

बहुत वक़्त गुज़रा, फिर भी ज़ख्म नहीं भरे
लगता है अधूरा इक एहसास होना चाहते हैं।

तरबतर कर दे जो, रूह और रूहदार दोनों को
बंजर के लिए हम वो बरसात होना चाहते हैं।

रोते हुए इस बार भी, आंसू नहीं छलके उसके
किसी और की अब वो फ़र्याद होना चाहते हैं।

वो गलती से भी हमें, याद नहीं करते कभी
हम है के उनके लिए बर्बाद होना चाहते हैं।।

“इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है”

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होश गंवाने को तैयार हुए बैठे है
खानाबदोश मन का शिकार हुए बैठे है

चादर चढ़ाने ही सही, पर आओ कभी
इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है

ये हुनर सीखना इतना आसां नहीं हुज़ूर
बिन बादल देखो मल्हार हुए बैठे है

एक आप ही हो, जो क़रार के तलबगार हो
वरना हम तो कब से यूं बेक़रार हुए बैठे है

वज़ह थी इसकी भी, वज़ह बहुत बड़ी
बेवज़ह तो नहीं हम ख़ुद्दार हुए बैठे है

तुमने शायद ग़ौर नहीं किया इस बारे में कभी
मुद्दत से मेरे यार इंतज़ार हुए बैठे है।

हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

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हमने अपने वज़ूद को कुछ यूं बचा रक्खा है
जैसे बरसती हुई बारिश में चराग़ जला रक्खा है

गज़ब हो जाएगा, जिस दिन अश्क़ों का सागर सूख जाएगा
बस इसीलिए तो सीने में एक दरिया दबा रक्खा है

पथराई आँखों को पढ़ने की गुस्ताख़ी ना कर बैठना
हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

कई सिलसिले बाक़ी हैं, अभी कई जलजले बाक़ी हैं
तभी तो हज़ार रातोंं से हमने नींद को जगा रक्खा है

तुमने अभी हमारी मेहमाननवाज़ी देखी ही कहां है?
आओ कभी हवेली पे हमने मौत को दावत पे बुला रक्खा है।