“क्या बादलों पे चलना चाहते हो”

क्या बादलों पे चलना चाहते हो
तुम गिरके फिर संभलना चाहते हो

तो खोल दो अपने वो पंख सारे
गर परिंदों के जैसे उड़ना चाहते हो

पहले अपने दिल को रौशन करो
गर रौशनी के जैसे दिखना चाहते हो

बेतहाशा सब्र रखो और दर्द चखो
गर आग के जैसे जलना चाहते हो

मिटा दो मन के अँधेरे वो सारे
गर सूरज के जैसे बनना चाहते हो

थमना नहीं है कहीं, बात यही है सही
गर सफ़र के जैसे चलना चाहते हो

ज़िन्दगी को हँसकर गले लगाओ, नाचो गाओ ख़ुशी मनाओ
गर ज़िन्दगी के जैसे जीना चाहते हो।

“मुझमें है जो मेरा उसे कहीं और ढूँढता हूँ”

 

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मुझमें है जो मेरा उसे कहीं और ढूँढता हूँ
मैं गुमशुदा राहों से अपना पता पूछता हूँ

हक़ीक़त से मुझको रूबरू कराने वाले
मैं ख़्वाब में भी तेरा ख़्वाब देखता हूँ

करने को तो बहुत कुछ हैं, इस दुनिया में मगर
दिल लगे जिसमें काम मैं वही करता हूँ

सुनने में अजीब है, लेकिन सच यही है
मैं अनजानों से नहीं अपनों से डरता हूँ

दूर है मंज़िल पास है मुश्किल, इसलिये
सफ़र के लिये कुछ साँसें बचाके रखता हूँ

चलना बेहद ज़रूरी है, रुकना तो खुद एक दूरी है
मैं बिना रुके बेसबब बस चलता रहता हूँ

सवालों के सफ़र में जवाब बस यही मिला
मुझमें है जो मेरा उसे कोई और कहता हूँ।

“कुछ ऐसे मिले वो हमसे के हमारी दुनिया बन गये”

कुछ लम्हे लम्हे ही रहे, कुछ लम्हे सदियाँ बन गये
कुछ ऐसे मिले वो हमसे के हमारी दुनिया बन गये

कई दिनों से इंतज़ार, कर रही है ज़िंदगी धूप का
रंजो ग़म में डूबे लम्हे ठिठुरती हुई सर्दियाँ बन गये

हिज़्र-ए-दिलबर का असर, दिल पर कुछ ऐसा हुआ
के नज़रों के ख़ामोश ख़त बहती हुई नदियाँ बन गये

नज़र नहीं आता कुछ भी, दिल को अपने ही घर में
दर्द से सराबोर अल्फ़ाज़ दिल की अँखियाँ बन गये

सालों बीत गए हैं, नींद को सोये हुए, नैनों को रोये हुए
बचाकर रखे जो ख़्वाब वो नींद का तकिया बन गये

पहले जिससे मोहब्बत थी, उससे अब नफ़रत हो गई
दिल के सब अरमान मानो जलता हुआ दिया बन गये

दोनों ने बहुत कोशिश की, रिश्ते को बचाने की खातिर
पता नहीं ऐसा क्या हुआ जो फ़ासले दरमियाँ बन गये।

 

 

 

 

 

“किसे होता यहाँ खुद पे गुमान नहीं”

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यह तज़ुर्बा भी इतना आसान नहीं
किसे होता यहाँ खुद पे गुमान नहीं

किराये की बस्ती है, ये दुनिया ये महफ़िल
यहाँ किसी का अपना मकान नहीं

चुरा के शख़्सियत, पहन लेता हूँ अक्सर
मेरी अपनी कोई पहचान नहीं

पहले लुटा, फिर टूटा, फिर रूठा
दिल अब पहले सा नादान नहीं

हँसते हुये जलना, सीख लिया है इसने
यूँ होता आजकल परेशान नहीं

चंद पल मिले हैं, गुज़र जायेंगे
मेहमान हैं ये पल मेजबान नहीं

तीर तो तैयार है कब से, दिल चीरने को
कसी हुई मगर नज़रों की कमान नहीं।

“एक दिन मेरे लिए बहुत तरसोगे तुम”

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याद रखना, एक दिन मेरे लिए बहुत तरसोगे तुम
वक़्त रहते क्यों नहीं समझे, खुद से ये कहोगे तुम

यूँही नहीं कह रहा हूँ, लिख लो तुम यह बात मेरी
एकदम से नहीं, यूँ धीरे-धीरे मुझ को खो दोगे तुम

झाड़कर वक़्त की धूल, न पाओगे तुम मुझ को भूल
दबे हैं जो दर्द डायरी में कहीं, कभी तो पढ़ोगे तुम 

अभी तो ठुकरा रहो हो, ठुकरा लो कोई बात नहीं
बाद में मुझे ही याद करके, तन्हाई में रोओगे तुम

सताएगी जब बैचैनी तुम्हें, मिलेगा नहीं चैन तुम्हें
रात रातभर जागकर, यूँ इधर-उधर टहलोगे तुम 

पहले लहू टकपने लगेगा, फिर दिल धड़कने लगेगा
ज़ख्मों को जब भी, यादों के नश्तर से छुओगे तुम

महसूस करो या न करो, पर इतना ज़रूर जान लो
हरजगह हरघड़ी, फ़क़त मुझ को ही पाओगे तुम।

“दिल को नये बहाने और लिखने को मौज़ू देती है”

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दिल को नये बहाने और लिखने को मौज़ू देती है
वो कौन है जो आरज़ू बनकर मेरे दिल में रहती है।

उसके बारे में क्या कहूँ, मैं बिन कहे कैसे रहूँ
वो जो होंठो से नहीं, आँखों से हर बात कहती है।

दिल से धड़कन का रिश्ता, कुछ ऐसा है हमारा रिश्ता
दिल के हर इक हिस्से में आजकल वही रहती है।

जब भी वो आती है, मेरी दुनिया महका जाती है
एक खुशबू है वो एक खुशबू, जो रूह में बसती है।

इक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, हम साथ होकर ही पूरे हैं
मैं ठहरा आवारा बादल, वो हवाओं सी बहती है।

दिल चाहता है उसकी बातें, करता रहूँ बस करता रहूँ
वो जो ख़ामोश रहकर भी, अनकही हर बात कहती है।

ज़िंदगी में ज़िंदगी बनकर, जब से वो आयी इरफ़ान
सोहबत में उसकी यह ज़िंदगी, फूलों सी महकती है।।

मौज़ू – topic

“तो लिखता हूँ मैं”

जब मन नहीं करता है कुछ करने का, तो लिखता हूँ मैं
जब मन करता है मन को छूने का, तो लिखता हूँ मैं।

ज़िंदगी से लड़ते-लड़ते, ज़िंदगी गुज़र जाती है
जब मन करता है कभी जीने का, तो लिखता हूँ मैं।

कोशिश करता हूँ लफ़्ज़ों से,
जज़्बात जता सकूँ, जज़्बात छुपा सकूँ
जब मन करता है तुझे याद करने का, तो लिखता हूँ मैं।

बिन बादल बरसात,
देखी है कभी, सुनी है कभी
जब मन करता है कभी भीगने का, तो लिखता हूँ मैं।

मन की गहराई,
जितनी गहरी है, उतनी सुनहरी है
जब मन करता है इसमें उतरने का, तो लिखता हूँ मैं।

आसमान में उड़ने की ख़्वाहिश,
हर परिंदे की बस यही ख़्वाहिश
जब मन करता है कभी उड़ने का, तो लिखता हूँ मैं।

हँसते हुये कैसे रोया जाये,
सोचा है कभी, किया है कभी
जब मन करता है ऐसा करने का, तो लिखता हूँ मैं।।

#RockShayar

“मैं तेरी नज़र में हूँ”

लहू में हूँ, जिगर में हूँ, साँसों की हर लहर में हूँ
ज़रा आईना तो देखो जानाँ, मैं तेरी नज़र में हूँ।

पैरों को ठहराव अब भाता नहीं, भाये भी कैसे
जब से होश संभाला है, तब से ही सफ़र में हूँ।

इत्तेफ़ाक़न ही मिल जाओ, किसी मोड़ पे तुम
कितने बरसों के बाद, मैं आया तेरे शहर में हूँ।

ज़िंदगी को हमेशा, यही शिकायत रही मुझसे
सुकून से मैं घर पे नहीं, जीता भी सफ़र में हूँ।

सवाल पूछा जब दिलबर से, बोली वह माशूक शायर से
मैं तुम्हारी महबूब ग़ज़ल, जो कि बहर में हूँ।

एक ख़्वाब से जब बात हुई, तो उसने ये कहा
अँधेरी रात गुज़ारकर, मैं सुकूंभरी सहर में हूँ।

शीशा-ए-दिल हर रोज़ यह याद दिलाता है इरफ़ान
के मैं खुद को भूलकर किसी और के असर में हूँ।।

“निशाना मेरा चूका है मगर दूर तक जायेगा”

एक ना एक दिन तो ये राज़ भी खुल जायेगा
दिल की आह सुनकर ये दिल पिघल जायेगा।

ख़ुदा को ढूँढ़ने वाले, इतना तो ख़ुद पे यक़ीन रख
ख़ुदा को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तू ख़ुद से मिल जायेगा।

ज़िन्दगी की शाम का, सूरज जब ढलने लगेगा
लौटकर हर एक परिन्दा अपने घर पर जायेगा।

जीतने की आदत, हर एक ज़ुनूनी की है यही आदत
हर बार जो गिरेगा उठेगा और फिर संभल जायेगा।

वक़्त की बिसात पे, कौन चलेगा अगली चाल
वक़्त आने पर तुम्हें सब पता चल जायेगा।

आग लगाकर तमाशा देखने वालों, अब ज़रा ये भी सुन लो
आग से जो खेलेगा वो ख़ुद भी जल जायेगा।

इतना भी ना इतराओ, अपनी नज़रों पे तुम
निशाना मेरा चूका है मगर दूर तक जायेगा।।

“डर के घर की दहलीज़ लांघकर जो ख़ुशी होती है”

डर के घर की दहलीज़ लांघकर जो ख़ुशी होती है
यक़ीन मानिये ऐसी ख़ुशी और कहीं नहीं होती है।

सोच के सागर को पार करना, महज एक दीवानगी है
ये दीवानगी तो अक्सर सोच से परे जाकर ही होती है।

बचपन से जो कहते आये, तुमसे ये ना हो पायेगा
वही जब ये कहे, “सच में ये तूने किया है !” तो ख़ुशी होती है।

सरहद के दोनों तरफ, एक उम्मीद बराबर बँटी है
बारूद से ढकी ज़मीं पे जो अमन के बीज बोती है।

तारों से दिल की बात करती है, अँधेरे से नहीं डरती है
सब सो जाते हैं लेकिन ये रात कभी नहीं सोती है।

बस एक यही सच तो बाक़ी रह गया है ज़िंदगी में
के कुछ पाने के लिये ज़िंदगी बहुत कुछ खोती है।

पत्थर के टुकड़ों को कीमती समझने वाले इंसान
सबसे कीमती इस जहान में तेरे मन का मोती है।।

“ज़िंदगी से ज्यादा कुछ नहीं, बस थोड़ी ज़िंदगी चाहिये”

ज़िंदगी से ज्यादा कुछ नहीं, बस थोड़ी ज़िंदगी चाहिये
जीने के लिये जो काफी हो, बस उतनी ज़िंदगी चाहिये

किश्तों में हर रोज़ यूँ, घुट-घुटकर जीना भी कोई जीना है
मौत से मुलाक़ात हो जिसमें, हमें नहीं ऐसी ज़िंदगी चाहिये

जो करना चाहे वो कर पाये, सपने वो सब सच कर दिखाये
ग़मों से कोसों दूर, फ़क़त हँसी-खुशी वाली ज़िंदगी चाहिये

बादलों के पार रहती है जो, हवाओं पर सवार रहती है वो
ख़्वाबों में रोज़ आती है जो, हक़ीक़त में वैसी ज़िंदगी चाहिये

इश्क़ बिना ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं, इश्क़ बिना बंदगी बंदगी नहीं
हर शख़्स को मोहब्बत के गुलाब से सजी हुई ज़िंदगी चाहिये

चाँद की रोशन चाँदनी है जो, माशाअल्लाह मरहबा आफ़रीं है वो
जो देखे वही कहे रश्क़-ए-क़मर, ऐसी हसीं ज़िंदगी चाहिये

अब और क्या कहूँ इरफ़ान, हाल-ए-दिल अपना करू बयान
जिसकी चाहत पाल रखी है दिल ने, हाँ वही ज़िंदगी चाहिये।

फ़क़त – केवल
आफ़रीं – जिसकी तारीफ़ मुमकिन नहीं
रश्क़-ए-क़मर – चाँद को भी जिससे ईर्ष्या हो

“नज़रों से जो दिल में घर कर ले, हाँ वही साहिर हूँ मैं”

सीने में संभालकर रखना, दिल चुराने में माहिर हूँ मैं
नज़रों से जो दिल में घर कर ले, हाँ वही साहिर हूँ मैं।

सफ़र में कई हमसफ़र मिले, अपने अंदर जो छुपे थे
ज़िंदगी के लंबे सफ़र का, बंजारा एक मुसाफ़िर हूँ मैं।

अपनी ही तलाश में उसे, कई बार लाश बनना पड़ा
जब से राह भटकी है रूह, तब से ही मुहाज़िर हूँ मैं।

निगाहों में जब क़ैद करता हूँ, रिहा नहीं होने देता हूँ
अपने मोहब्बत करने के अंदाज़ से मुताहसिर हूँ मैं।

एक जादू ही तो है ये ज़िंदगी, इससे ज्यादा और क्या है
सामने होकर भी ना दिखे जो, हाँ वही ज़ाहिर हूँ मैं।

ख़यालों के पंखों से, पलभर में सदियाँ नाप लेता हूँ
हुक्म कीजिये हुज़ूरे आला, ख़िदमत में हाज़िर हूँ मैं।

खेल चाहे लफ़्ज़ों का हो, या दिलजले इस दिल का
यकीन मानिये इरफ़ान, इन दोनों में माहिर हूँ मैं।।

साहिर – Magician
मुहाज़िर – Refugee
मुताहसिर – Affected
ज़ाहिर – Direct/In front of
ख़िदमत – Service
[12:56 AM, 10/23/2017] +91 77377 13079:

“ये ज़रूरी नहीं के डरे हुये लोग अक्सर अल्फ़ाज़ों के पीछे छुपते हैं”

ये ज़रूरी नहीं के डरे हुये लोग अक्सर अल्फ़ाज़ों के पीछे छुपते हैं
कभी-कभी चंद अल्फ़ाज़ भी काग़ज़ पर खुद बखुद उतर आते हैं।

इश्क़ में हँसते हुये जल जाना,
एक अंगारे और सूफ़ी की है यही अदा
अपनी ही भड़कायी आग में, ये दोनों मुस्कुराते हुये जलते हैं।

ख़यालों की ख़याली दुनिया, दरअसल एक हक़ीक़त है
तभी तो गहरे ख़याल, कमी या जज़्बात की नमी में पनपते हैं।

अनकहा जो होता है, उसे कहने का ज़रिया क़लम है
गर शिद्दत की स्याही हो क़लम में तो अल्फ़ाज़ महकते हैं।

एहसास की मीठी ज़ुबाँ, सबकी समझ में ना आये
जिसकी समझ में आ जाये, उसे ज़िंदगी के कई रूप दिखते हैं।

मोहब्बत में इंतज़ार बहुत है, मोहब्बत इंतज़ार की हद है
मोहब्बत के इंतज़ार में, दिल के जज़्बात और भी निखरते हैं।

ये ज़रूरी नहीं के टूटे दिलवाले हमेशा लफ़्ज़ों का सहारा लेते हैं
कभी-कभी कुछ एहसास भी डायरी में खुद बखुद उतर आते हैं।।

“लिखना तो मैंने सीख लिया, पर जज़्बात से दूर हो गया”

लिखना तो मैंने सीख लिया, पर जज़्बात से दूर हो गया
पता नहीं ऐसा क्या हुआ के अपने आप से दूर हो गया।

यारों ने बहुत समझाया, पर मुझे यह एहसास नहीं था
बाद में यह एहसास हुआ के मैं एहसास से दूर हो गया।

ख़ामोशी की चादर ओढ़े, एक लम्हे ने जब आवाज़ लगाई
तब मुझे यह पता चला मैं अपनी आवाज़ से दूर हो गया।

हर अंदाज़ का अपना एक अंदाज़ होता है, राज़ होता है
इतने अंदाज़ बदले के खुद अपने अंदाज़ से दूर हो गया।

अल्फ़ाज़ों में वज़ूद अपना, नुमायाँ करने चला इक शख़्स
अपना कल बनाते-बनाते वो अपने आज से दूर हो गया।

एकतरफा इश्क़ की बीमारी, बड़ी ही लाइलाज बीमारी
जान बूझकर दिल इस बीमारी के इलाज से दूर हो गया।

काग़ज़ और क़लम से दूरी ऐसे लगती है इरफ़ान
जैसे कोई परिन्दा अपनी परवाज़ से दूर हो गया।।

“तो तस्वीर कुछ और ही होती”

हमारा मिलना-बिछुड़ना तो तक़दीर का लिखा है
जो हम साथ रह पाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

सालों से तुम्हारा इंतज़ार, और उस पर दिल ये बेक़रार
गर हम एक हो जाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

एक दूसरे को बहुत चाहते थे, हम कमियां और ख़ूबियां जानते थे
जो जज़्बात जताते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

अपने हिस्से का दर्द हमने, ना बताया कभी, ना जताया कभी
गर ग़म ना छुपाते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

बिन पूछे सब जान लेना, एक दूसरे को मान देना
जो नज़रें मिला लेते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

जमाने की दीवार खड़ी थी, और ज़िंदगी ज़िद पर अड़ी थी
गर बंदिशें तोड़ जाते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

अफ़साना अपनी मोहब्बत का, कुछ यूँ लिखा हमने इरफ़ान
जो हम पहले मिल जाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।।

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“हम जान बूझकर जाने जाँ तुमसे हार जाते है”

किसी से नहीं बस अपने दिल से हार जाते है
हम जान बूझकर जाने जाँ तुमसे हार जाते है।

जब भी तुमको देखते है, बड़ी हसरत से देखते है
दिलबर मेरे उसी पल, दिल ये तुम पे हार जाते है।

पहले तो मिलती नहीं, मिले तो फिर हटती नहीं
हम किसी से नहीं बस तेरी नज़र से हार जाते है।

तेरी शोख़ हसीन अदायें, मेरे दिल का चैन चुराये
अपने दिल का चैन हम बड़े आराम से हार जाते है।

खुशी का क्या है, पलभर में मिले सदियों तक ना मिले
तेरी खुशी के लिये हर खुशी हम, खुशी से हार जाते है।

हारी बाज़ी जीतने की, जब भी बारी आती है
किसी से नहीं बस अपने आप से हार जाते है।

ज़िंदगी की यह जंग भी, कैसी जंग है इरफ़ान
सब कुछ जीतकर भी आखिर में हार जाते है।।

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“मैं हर रोज़ तुम पर एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ”

कई दिनों से तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ
मैं हर रोज़ तुम पर एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ।

हालाँकि ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है हमें मिले हुये
मैं फिर भी तुम्हारे बारे में सब जानना चाहता हूँ।

आँखों ने आँखों को चुन लिया, ओ रे पिया मोरे पिया
आँखों से आँखों के अनकहे अल्फ़ाज़ पढ़ना चाहता हूँ।

अब और क्या सोचना, बस यही अब सोचना
मैं तुम से ज्यादा तुमको अब सोचना चाहता हूँ।

चेहरों के घने जंगल में, चेहरा तेरा नूरानी है
मैं हर चेहरे में बस तेरा, चेहरा देखना चाहता हूँ।

दिल मेरा सहम जाता है,
जब भी दूर जाने का वक़्त पास आता है
मैं दूरियों का नहीं बस तुम्हारा होना चाहता हूँ।

दिलबर मेरे, दिल की खुशबू है तू, आरज़ू है तू
मैं रोज़ तुम्हें ज़िंदगी की तरह जीना चाहता हूँ।।

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“आज़ादी क्या होती है”

उड़ते हुये परिंदों से पूछो, आज़ादी क्या होती है
शहर के बाशिंदों से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

अंधेरे में साँस घुटती है, ज़िंदगी की लौ बुझती है
कभी किसी क़ैदी से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

जब कोई गाँव मरता है, उसकी क़ब्र पर शहर बसता है
कभी किसी घर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

चाँद के पार चले जाना, सूरज को गले से लगाना
कभी किसी सहर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

दिल में तूफ़ान जगाये, कश्ती किनारे सब भूल जाये
कभी किसी लहर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

रास्तों से गुज़रते हुये, खुद अपना रस्ता ढूँढ़ते हुये 
कभी किसी सफ़र से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

हर रोज खुद से लड़ते हो, हर रोज खुद से डरते हो
कभी अपने उस डर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।।

“तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया”

तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया
के तारीफ़ तो लाज़मी है, ये सलीक़ा ग़ज़ल ने बताया

शोख़ियों के सुर्ख़ जोड़े में सजी हुई कोई दुल्हन लगती हो
मन के मोतियों की माला पहनकर तुम तो ख़ूब जचती हो

खुद तो चैन से रहती हो, और बेचैनियाँ हमको देती हो
उनींदी आँखों में रातभर तुम ख़्वाब की तरह जगती हो

बड़ी ख़ूबसूरती से बुना गया है, तुम्हारी साँसों का ये ताना-बाना
पहली नज़र में तुम किसी शायर का ख़याल लगती हो

मेरे अलहदा अंदाज़ ने तुमको, इस क़दर दीवाना किया
कि ये अंदाज़ अच्छा लगता है मुझे, ये बार-बार कहती हो

तेरी आवाज़ के आगे हर आवाज़ बेआवाज़ हैं, क्योंकि
कानों में तुम खनकती हुई आवाज़ के झुमके पहनती हो

हुस्न की सुर्ख़ ज़री में सजी हुई कोई दुल्हन लगती हो
हया के हीरों का हार पहनकर तुम तो ख़ूब जचती हो

खुद तो सुकून से सोती हो, और रतजगे हमको देती हो
रात की आँखों में दीप जलाकर, नींद को तुम ठगती हो

पहली बार देखो, चाहे दूसरी बार, या फिर बार-बार
जब भी देखो तुम तो बस क़ुदरत का कमाल लगती हो

तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया
के तारीफ़ तो लाज़मी है, ये तरीका ग़ज़ल ने बताया।।

@RockShayar

“मुझको रोकने की कभी हिम्मत न करना”

मुझको रोकने की कभी हिम्मत न करना
गलती से भी टोकने की हिम्मत न करना।

दहकती आग हूँ मैं, मासूम मोम हो तुम
पास आने की कभी ज़ुर्रत न करना।

माफ़ कर देना, दिल को साफ़ कर लेना
रब से किसी की शिकायत न करना।

औरों के लिये, कोई और बनकर
खुद से कभी तुम बग़ावत न करना।

महसूस न कर पाओ जिसे खुद में तुम
उस शख़्स से कभी मोहब्बत न करना।

मौत भी तो एक मुकम्मल ज़िंदगी है
फिर ऐसी ज़िंदगी की चाहत क्या करना।

मरकर हमने तो इतना ही जाना इरफ़ान
के खुद से कभी तुम नफ़रत न करना।।

“गुच्छे की आखिरी चाबी भी कभी-कभी ताला खोल देती हैं”

गुच्छे की आखिरी चाबी भी कभी-कभी ताला खोल देती हैं
ये सच है कि निगाहें दिल की अनकही हर बात बोल देती हैं।

नज़रों की बेनज़ीर शमशीर, जब किसी पर चलती है तो
कुछ बोलने से पहले नज़रों में छुपा हर डर खोल देती हैं।

गुनगुनाते हुये गीत की तरह, मुस्कुराते हुये संगीत की तरह
इतनी गहरी है तुम्हारी आँखें कि मेरा मन टटोल लेती हैं।

वैसे तो बेज़ुबां आँखें बोलती नहीं, राज़ कभी कोई खोलती नहीं
पर हो यक़ीं जिस पर, अपना हर राज़ उसे बोल देती हैं।

पढ़ने वाली और लिखने वाली, एक ही नज़र के कई हुनर
बिना तराजू और बाट के फट से वज़्नी हर्फ़ तोल देती हैं।

पहली नज़र का वो असर, नज़रों से कभी नज़र मिलाकर तो पूछो
बिना सोचे-समझे बिना पूछे-ताछे बस हाँ बोल देती हैं।

सारी ज़िंदगी गुज़र गयी, बस यही बात नज़र आयी
कि रोते वक़्त अमूमन आँखें अपना दिल खोल देती हैं।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“बदलते-बदलते आखिरकार पूरी तरह बदल गयी”

बदलते-बदलते आखिरकार पूरी तरह बदल गयी
गिरते-पड़ते चलते-चलते ज़िंदगी खुद संभल गयी।

कल को आज समझ बैठे, पल में कई सदियाँ समेटे
ये उम्र भी आखिर उम्र निकली, एक रोज़ ढ़ल गयी।

पकड़ने की बहुत कोशिश की, पर नतीजा यह निकला
के ज़िंदगी की मछली वक़्त के हाथों फिसल गयी।

पता ही नहीं चला कभी, कब दिन ढ़ला कब रात हुई
चुपके-चुपके दबे पाँव, तन्हाई मुझको निगल गयी।

सुना है कि पत्थरदिल पिघलते नहीं, गलत सुना है
मरते-मरते मौत भी खुद मौत देखकर पिघल गयी।

जो चाहा वो पाया, जो सोचा वो कर दिखाया
और कुछ नहीं बस मेरी तन्हाई मुझको खल गयी।

अब भी महसूस करता हूँ, वो तपिश अपने अंदर
ऐसी आग लगाई उसने कि रूह तक जल गयी।।

@राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“वो हुस्न ही क्या जो सही सलामत छोड़ दे”

वो हुस्न ही क्या जो सही सलामत छोड़ दे
वो इश्क़ ही क्या जो बग़ावत करना छोड़ दे।

इंतक़ाम की हसरत, बड़ी क़ातिल और हसीन हसरत
वो नफ़रत ही क्या जो नफ़रत करना छोड़ दे।

मुहाफ़िज़ बन बैठे हैं सब मुज़रिम आजकल
वो अदालत ही क्या जो खुद अपना क़ानून तोड़ दे।

गुनाहों से सौ बार डरना, फिर भी हर बार गुनाह करना
वो शरीफ़ ही क्या जो शराफ़त का दामन छोड़ दे।

खेल-खेल में रेल चलाना, हर बात को खेल समझना
वो बचपन ही क्या जो शरारत करना छोड़ दे।

अंदर ही अंदर रहती है, सोच में कहीं बहती है
वो हसरत ही क्या जो अपनी हसरत करना छोड़ दे।

नसीब का यह अजीब पहिया, नसीब ही जाने भय्या
वो किस्मत ही क्या जो पल-पल बदलना छोड़ दे।

ज़िंदगी से मोहब्बत, क्या खाक़ मोहब्बत
वो मोहब्बत ही क्या जो हमें ज़िन्दा छोड़ दे।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“ज़िंदगी बहुत हसीं है अभी”

जहाँ रखी थी वहीं है अभी
ज़िंदगी बहुत हसीं है अभी।

सवाल पूछकर क्या करोगे
जवाब हमारा नहीं है अभी।

कौन हूँ मैं, क्या कर सकता हूँ
ये एहसास तुम्हे नहीं है अभी।

वक़्त रहते जी लो ज़रा
वक़्त बहुत सही है अभी।

मुलाकात में अब वो बात कहाँ
ये मुलाकात अधूरी है अभी।

तुझसे मिलकर, मैं मैं न रहा
जानाँ तू मुझमें कहीं है अभी।

क्यों मानते हो हार इरफ़ान
पूरी ज़िंदगी बाक़ी है अभी।।

@राॅकशायर

“Faded पुरानी Jeans की तरह होती हैं यादें”

किसी Faded सी पुरानी Jeans की तरह होती हैं यादें
वक़्त के Rear Mirror में खुद को देखकर रोती हैं यादें।

दिनभर सोचते-सोचते, ख़याली Work out से चूर होकर
ख़्वाबों के आगोश में सुकूनभरी Sleep सोती हैं यादें।

Pain की बरसती Rain में, धीरे-धीरे Dissolve होना है
पलकों के साथ Sometimes Soul भी भिगोती हैं यादें।

खोना और पाना, Lifetime यही Cycle चलता रहता है
Tiny-Tiny आँखों में Triple XL सपने संजोती हैं यादें।

I have never understood, किस तलाश में हूँ यहाँ मैं
Real में कहूं तो समंदर के जितना Deep डुबोती हैं यादें।

Life की यह Philosophy, लगे जो किसी Race की Trophy
कुछ पाने की खातिर Always बहुत कुछ खोती हैं यादें।

Flashback में जाकर जो, गुज़रा हुआ कल दिखाये
दिल की Film के उस Scene की तरह होती हैं यादें।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं”

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लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं
उसकी कही बातें याद आती हैं, अब वो शख़्स नहीं।

सिर्फ पढ़ने से ही जिसे, जग उठे वो एहसास फिर से
ज़िंदगी सब कुछ लिख देती हैं, मगर वो लफ़्ज़ नहीं।

कह गये वो शायर सयाने, इश्क़ के जो थे दीवाने
मिल जाये जो बड़ी आसानी से, असल वो इश्क़ नहीं।

शिद्दत और मेहनत, शर्त यही के दोनों साथ हो
फिर पूरी न की जा सके जो, ऐसी तो कोई शर्त नहीं।

साये की किस्मत है, सुबह से शाम चलना और ढ़लना
धूप का तिलिस्म है ये तो, साये का अपना कोई अक्स नहीं।

ज़ईफ़ जिस्म का नहीं, जवां रूह का हुस्न है मोहब्बत
देखकर जिसे खुद नैन कहे, कभी देखा ऐसा नक्श नहीं।

वक़्त की बेवक़्त ख़ामोशी का, बयान है यह तो इरफ़ान
एक वक़्त के बाद सब लौट आते हैं, मगर वो वक़्त नहीं।।

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“पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है”

पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है
नज़रों से नज़रों का सफ़र, अब तक याद है।

इक़रार इंकार तक़रार ऐतबार, और फिर प्यार
जज़्बातों का वो जादुई सफ़र, अब तक याद है।

ख़यालों की एक नदी, यादों के जंगल में बहती थी
एहसास की वो ऊँची लहर, अब तक याद है।

ख़्वाबों का घर लगता था, नहीं जहाँ पर डर लगता था
उम्मीदों का वो उम्दा शहर, अब तक याद है।

कई चेहरे देख लिये, सब रंग सुनहरे देख लिये
पर वो एक चेहरा शाम-ओ-सहर, अब तक याद है।

यादें हैं कि मिटती नहीं, रातें हैं कि कटती नहीं
ज़िंदगी की वो कड़ी दोपहर, अब तक याद है।

नफ़रत जिसके सामने, ज्यादा देर टिक न पाये
मोहब्बत तेरी वो इस क़दर, अब तक याद है।।

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“मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं”

लहरों के दरमियाँ सफ़र करता हूं
मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं।

जो कुछ कमाया है, जो कुछ पाया है
कदमों में आपके वो नज़र करता हूं।

तेरा याद आना लाज़िम है मेरे लिए
तेरी यादों के सहारे गुज़र-बसर करता हूं।

लबों से निकलकर जो आसमाँ तक जा पहुँचे
मैं दुआ हूं, तेरे दिल में घर करता हूं।

बता नहीं सकता तुझे इस क़दर करता हूं
मैं प्यार तुझसे इस क़दर करता हूं।

मेरी नज़रों में रहने वाले, ऐ मेरे हमसफ़र
तेरा इंतज़ार मैं हरपहर करता हूं।

चाहे तू मुझको सज़ा दे, चाहे तू अपना बना ले
कदमों में हाज़िर अपना ये सर करता हूं।।

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“शर्त यही थी के कोई शर्त न हो”

 

शर्त यही थी के कोई शर्त न हो
रुख़्सत के वक़्त कोई दर्द न हो।

सहेजकर रखी है जिसे दिल में
उस तस्वीर पर कोई गर्द न हो।

नफ़रत की ज़हरीली आँधी में
सब्ज़ पत्तों का रंग ज़र्द न हो।

बड़ा तड़पाता है, बड़ा सताता है
दर्द का मौसम कभी सर्द न हो।

तसव्वुर में तकब्बुर आ जाता है
जज़्बाती जब कोई फ़र्द न हो।

न जीने दे, न मरने दे
ज़िंदगी इतनी भी बेदर्द न हो।

दिल को बहुत बुरा लगता है
हमदर्द ही जब हमदर्द न हो।।

“हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है”

हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है
अपने लिए ख़ुद जान दी है।

ज्योंही पैर डगमगाने लगे
बन्दूक सिर पर तान दी है।

दो गज ज़मीन के अलावा
अपनी पूरी ज़मीन दान दी है।

गिरवी ख़्वाब छुड़ाने की ख़ातिर
खेत मकान और दुकान दी है।

ज्यादा कुछ नहीं बस अपनी
आन बान और शान दी है।

जिसने भी दिल की सुनी है
दिल ने उसे ज़ुबान दी है।

शहीदों को सलाम करो इरफ़ान
देश के लिए इन्होने जान दी है।।

“गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है”

ज़ेहन के हर हिस्से पर उसका ही कब्ज़ा है
गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।

चलता ही चला जाता है, मंज़िलों के पार
ठहरता नहीं ये रस्ता जाने कैसा रस्ता है।

बेजान पड़ा रहता है, अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है
धड़कता नहीं ये हिस्सा जाने कैसा हिस्सा है।

जिस्म की तपिश में भी रूह को पहनता है
पिघलता नहीं ये नुत्फ़ा जाने कैसा नुत्फ़ा है।

जो पैदा हुआ है, उसे मरना है एक रोज
बदलता नहीं ये नुस्ख़ा जाने कैसा नुस्ख़ा है।

मुद्दे की बात करे तो आज़ादी एक मुद्दा है
उछलता नहीं ये मुद्दा जाने कैसा मुद्दा है।

मछली की तरह बार-बार फिसल जाता है
ठहरता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।।

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