राह चलते अजनबियों की मदद कर देता हूँ

राह चलते अजनबियों की मदद कर देता हूँ
कुछ इस तरह अपने गुनाह कम कर देता हूँ
 
बहुत तलाशने के बाद भी, जब कोई ख़बर ना मिले
मैं उस सिलसिले को वहीं खत्म कर देता हूँ
 
इल्ज़ाम लगाने वाले, अपने गिरेबां में झांकते नहीं
दोगली दलीलें बिन सुने ही रद्द कर देता हूँ
 
उसकी याद तो अब भी आती है, बहुत आती है
नहीं आती तो वो, ऐसे में जीना कम कर देता हूँ
 
जब दिल का नाम लेकर कोई दिल तोड़ देता है
दिल के दरवाज़े सबके लिए बंद कर देता हूँ
 
खुद को पाने चला था, ख़ुद ही से हार गया
कभी-कभी तो ख़ुदगर्ज़ी की भी हद कर देता हूँ
 
ज़िंदगी की कश्ती, जब कभी डूबने लगती है
अश्क़ों का सैलाब बहाकर खुद उसे गर्क़ कर देता हूँ।

ईद मुबारक

ना वो इब्राहिम सा ईमान बचा है
ना वो आदम सा इंसान बचा है

फिर भी सब कह रहे हैं ईद मुबारक
अब तो बस दिल में यही गुमान बचा है

ये दिल है जनाब इस दिल का यही फ़साना है।

दिल के बारे में मैंने तो बस इतना ही जाना है
न जाना हो जिधर इसे तो बस उधर ही जाना है
 
कई साल हो चुके हैं, न बूढ़ा होता है न मरता है
ऐसा लगता है दिल तो फिल्मी कोई दीवाना है
 
एक बार जो इसे तोड़ दे, जुड़कर भी जुड़ता नहीं
ग़ैरों से नहीं दिल तो अपने आप से बेगाना है
 
चाहतों के पीछे-पीछे, ज़िंदगीभर भागता रहता है
किसी को बताता नहीं क्या इसको पाना है
 
हर बार नया लालच देकर फांस लेता है,
गुंडों का कबीला खुद को समाज कहता है
जमाना आज से नहीं इसका दुश्मन पुराना है
 
तन्हाई अक्सर डराती है इसे,
हज़ारों बार आज़्माती है इसे
जानता है इसे तो बस अपना साथ निभाना है
 
अंगारे बिछे हो जिधर, नंगे पाव उधर ही जाना है
ये दिल है जनाब इस दिल का यही फ़साना है।

नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर

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नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर
पर बाक़ी है उसके कुछ निशान मेरे अंदर
 
रफ़्ता रफ़्ता जो राहत मिली थी, ज्यादा देर न रुक पाई
आबाद हर गली है वो सुनसान मेरे अंदर
 
एक ज़लज़ले ने सब कुछ तबाह किया, फ़ना किया
नज़र आते हैं उजड़े वो मक़ान मेरे अंदर
 
बहुत कुछ कर सकता हूँ, बिना कुछ किए ही
बाक़ी है अब भी इतनी तो जान मेरे अंदर
 
पलकों के घर में, सपनों के टुकड़े चुभने लगेेे हैं
बिखर चुका है ख़्वाबों का जहान मेरे अंदर
 
परछाई बोलती है जिसकी, बिना अल्फ़ाज़ के आवाज़ के
रहता है कहीं साया एक बेज़ुबान मेरे अंदर
 
बहुत बुलाने पर थोड़ा आता है, शायद वो शख़्स शर्माता है
ऐसा लगता है जैसे है वो मेहमान मेरे अंदर
 
इक रोज़ घर में बहुत कुछ हुआ, हर तरफ बस धुआं ही धुआं
बाद उसके नहीं दिखा वो इरफ़ान मेरे अंदर।

महसूस करो नमी मेरी, अश्क़ हूँ मैं पलकों से बहता हूँ

तुम्हें शायद मालूम नहीं मैं तुम्हारी आँखों में रहता हूँ
महसूस करो नमी मेरी, अश्क़ हूँ मैं पलकों से बहता हूँ

कई रोज़ गुज़र जाते हैं, मगर गुज़रती नहीं वो इक रात
उस इक रात की हर बात अपने आँसुओं से लिखता हूँ

मुसाफ़िर कई मिलते हैं रोज़, मिलकर वो बिछुड़ते हैं रोज़
मील के पत्थर सा टकटकी बाँधें उन्हें बस देखता हूँ

उसने तो बड़ी आसानी से एक रोज़ अलविदा कह दिया
और मैं हूँ के अब तलक अलविदा कहने से डरता हूँ

जब इंतज़ार दम तोड़ देता है, और साया भी साथ छोड़ देता है
उस वक़्त एक बदलाव अपने अंदर महसूस करता हूँ

मज़ाक भी उड़ाया गया, और मज़ार भी बनाया गया
ज़िंदगी के ज़ुल्मो सितम बड़ी ही ख़ामोशी से सहता हूँ

भूले भटके से ही आना कभी, पता है मेरा अब भी वहीं
सच कहता हूँ दिल के बेघर घर में मैं अब भी रहता हूँ।

बड़ी ख़ामोशी से लब लफ़्ज़ तलाशते हैं

हर शख़्स में अपना अक्स तलाशते हैं
बड़ी ख़ामोशी से लब लफ़्ज़ तलाशते हैं

मिलके भी मिलता नहीं, शिकायत यही रहती है क्यों
ग़ैरों में हम अपने जैसा शख़्स तलाशते हैं

कुसूर सारा नज़रों का हैं, सब जानते हैं सब मानते हैं
फिर भी जाने क्यों वही नक़्श तलाशते हैं

सीने में शीशे सा दिल लेकर, ज़िंदगी भर
न टूटे कभी जो वो तिलिस्म तलाशते हैं

आखिर में कुछ बचता नहीं, कहीं कोई रस्ता नहीं
रूह को ठुकराकर बस जिस्म तलाशते हैं

इसे तन्हाई का तकाज़ा कहे, या शायर का वहम
ग़ज़ल में लोग आजकल नज़्म तलाशते हैं

ये दुनिया वाले हैं, इन्हें क्या फर्क़ पड़ता हैं
ये तो मौत में भी एक रस्म तलाशते हैं।

आज़ादी हो गई इतनी सस्ती

बूंदी का एक लड्डू और दिन भर की देशभक्ति
यक़ीन नहीं होता आज़ादी हो गई इतनी सस्ती

महज झंडा फहरा लेने से फर्ज़ अदा नहीं हो जाता
जोशीले गानों से मिट्टी का क़र्ज़ अदा नहीं हो जाता

सही मायने में इस आज़ादी का मतलब क्या है?
किसी को इससे कोई मतलब नहीं, यही समस्या है

मैं ये नहीं कहता कि जश्न मनाना गलत है
मगर इस आज़ादी की बहुत बड़ी कीमत है

जिसे चुकाने से पहले हर बंदा हज़ार बार सोचता है
सिर्फ मैं ही क्यों, बस यही ख़याल मुल्क़ को तोड़ता है

साल में एक दिन वतनपरस्ती दिखाने वालों, सुन लो ये
इस दिखावे के बजाए देश के लिए सच में कुछ करे दिल से

खूब खुशियां मनाएं, चाहे घी के दिये जलाएं
पर उन शहीदों की क़ुर्बानी, हम भूल ना जाएं

सिर्फ दो दिन नहीं, पूरे साल ये जश्न चलता रहे
दिन दूनी रात चौगुनी, तरक्की वतन करता रहे।

परियों की तरह रौशन है किरदार तु्म्हारा

परियों की तरह रौशन है किरदार तु्म्हारा
सदियों से न सोई आँखों में है इंतज़ार तुम्हारा

बंजर में गुलशन लगती हो, बहार सी मल्हार सी
बारिश की बूँदें छूकर होता है एहसास तु्म्हारा

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ख़ूब जचता है, चमेली का वो फूल
फूलों की तरह महकता है हर अंदाज़ तुम्हारा

वैसे तो ख़्वाहिशों की कोई इंतहा नहीं, कोई दवा नहीं
फिर भी ज्यादा कुछ नहीं मांगू मैं साथ तु्म्हारा

तु्म्हारे कुर्ते पे जितने फूल बने हैं, उतने ही मैंने सपने बुने हैं
बेसबब हर शब अब देखता हूँ मैं ख़्वाब तु्म्हारा

गर कर सको तो करो यक़ीं, एक वादा करता हूँ अभी
न तोड़ा है न तोडूंगा जानाँ कभी ऐतबार तु्म्हारा

मेरी ग़ज़ल भी तुम हो, शायरी का दिल भी तुम हो

दोस्तों के दरमियां हिसाब नहीं होते हैं

कुछ सवालों के जवाब नहीं होते हैं
दिल के चेहरों पे नक़ाब नहीं होते हैं

बहुत कुछ बह जाता है, फिर भी बाक़ी रह जाता है
आँखों में हर वक़्त ख़्वाब नहीं होते हैं

बस एक रिश्ते ने ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा दिया
दोस्तों के दरमियां हिसाब नहीं होते हैं

वक़्त की आंधी से भला, कौन बच पाया है यहां
बेवज़ह तो रिश्ते ख़राब नहीं होते हैं

भीतर से निखार देता है, बुरा वक़्त सुधार देता है
बिना काँटों के फूल गुलाब नहीं होते हैं

गर मोहब्बत गुनाह है, तो गुनाह ये क़ुबूल है
ऐसे गुनाहों के अज़ाब नहीं होते हैं

धोखा खाकर हमने तो यही सीखा है इरफ़ान
सब इंसान यहाँ खुली किताब नहीं होते हैं।

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक
उसकी इक मुस्कान साथ है अब तक

उसने तो पलभर में दूूरियों का दामन थाम लिया
दूर होकर भी मेरे वो पास है अब तक

उसका चेहरा किसी की याद दिलाता है मुझे
वो चेहरा मेरे लिए ख़ास है अब तक

क़िस्मत ने मिलवाया, ज़रूरत उसे बनाया
उसका मिलना एक राज़ है अब तक

सागर भी सारा पी लिया, नदियां भी समेट ली
फिर भी लबों पे इक प्यास है अब तक

जिस रोज़ उसे देखा था, देखता ही रह गया
उसकी आँखों का नूर याद है अब तक

कई बरस हो गए हैं, मनाते हुए रोते हुए
न जाने क्यों ज़िंदगी नाराज़ है अब तक।

जो अलविदा कह दे कोई तो ज़िंदगी इंतज़ार हो जाती है

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आंसुओं को छुपाने की हर कोशिश बेकार हो जाती हैं
बेचैनियां जिस वक्त मेरे सिर पे सवार हो जाती हैं

लाख मनाओ इस दिल को, दिल है ये माने कहां
दिल को मनाने की ज़िद में ज़िंदगी मज़ार हो जाती है

बहुत वक़्त दिया मैंने, खुद को भी और उसको भी
फिर भी हर बार मेरी तन्हाई से तकरार हो जाती है

कोई क़लम से वार करता है, तो कोई सितम बेशुमार करता है
एक ख़बर में सिमटकर ये ज़िंदगी अख़बार हो जाती है

वैसे तो वैसा कोई मिला नहीं, जैसा मुझको मिला कभी
दिख जाए गर कोई वैसा तो ये आँखें बेक़रार हो जाती हैं

किसी से दिल मिलता नहीं, किसी से दिल भरता नहीं
पता नहीं क्यों मुझसे यही ख़़ता हर बार हो जाती है

एक अलविदा कहने में ये ज़ुबान बेज़ुबान हो जाती है
जो अलविदा कह दे कोई तो ज़िंदगी इंतज़ार हो जाती है।

दर्द महसूस भी होता है, दिल आज भी तड़पता है

दर्द महसूस भी होता है, दिल आज भी तड़पता है
तेरी एक झलक के लिए दिल आज भी तरसता है

बहुत ढ़ूंढा मैंने तुझको, ना मिली तू मुझको
तेरे इंतज़ार में बेक़रार दिल आज भी धड़कता है

कभी खुशबू तो कभी साये के पीछे भागता हूँ

बारिश में भीगकर भी मैं प्यासा रह जाता हूँ
कभी खुशबू तो कभी साये के पीछे भागता हूँ

मेरी नींद का फ़लसफ़ा बस इतना समझ लीजिए
पलकों के ऊपर सोता हूँ पलकों के नीचे जागता हूँ

तुम्हारी ख़ामोशी

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह लफ़्ज़ों के मोल देती है
अनकहे एहसास की गिरह खोल देती है
अंदरूनी आवाज़ की सतह टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

इसी ख़ामोशी ने तो लबों को लरज़ना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो पलकों को झपकना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो दिल को धड़कना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो खुशबू को महकना सिखाया है

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह सांसें कुछ और देती है
सिले हुए लबों की हर गिरह खोल देती है
ठहरे हुए आंसुओं की नमी टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

इसी ख़ामोशी के इंतज़ार में कुछ अल्फ़ाज़ अब तक अधूरे हैं
पूरा करने के लिए जिन्हें मुझे तु्म्हारे एहसास की ज़रूरत है
इस ख़ामोशी की चादर में, मुझको भी छुपा लो न जानाँ
बहुत दिन हो गए हैं शोर में पलते हुए, दिल ने ये माना

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह लफ़्ज़ों के मोल देती है
अनकहे एहसास की गिरह खोल देती है
अंदरूनी आवाज़ की सतह टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

के दिल आ जाता है दिल के किस्सों पर

उसकी आँखों के पन्नों पर
मुझे ऐतबार है अपने लफ़्ज़ों पर
हर बार ये कुछ ऐसा लिख जाते हैं
के दिल आ जाता है दिल के किस्सों पर
ये दिल आ जाता है दिल के हिस्सों पर…

वो नज़दीकियों का मतलब दूरी समझ बैठी…

मोहब्बत को मेरी मज़बूरी समझ बैठी
होके वो दूर, दूरियों को ज़रूरी समझ बैठी

मैं करता रहा इंतज़ार, हर पल पल-पल उसका
वो नज़दीकियों का मतलब दूरी समझ बैठी…

अब पूछ ही लिया है तो सुन ये, बहुत प्यार करता हूँ तुमसे मैं

अब पूछ ही लिया है तो सुन ये
बहुत प्यार करता हूँ तुमसे मैं
इतना के बता भी नहीं सकता
जज़्बात ये जता भी नहीं सकता
गर महसूस कर पाओ तो करो इसे
बंद आँखों से जी भरके निहारो इसे
ये वो एहसास है जो साँसों में बसता है
ये वो अल्फ़ाज़ है जो आँखों में दिखता है
बस इसे पढ़ने का हुनर आना चाहिए
बाक़ी तो सब दिल के हवाले कर देना चाहिए

अब पूछ ही लिया है तो सुने ये
तुमसे ज्यादा तु्म्हें चाहता हूँ मैं
इतना के सोच भी नहीं सकती तुम
सोचना ये छोड़ भी नहीं सकती तुम
गर मुझ पे यक़ीन है तो यक़ीन करो
आसमान हूँ मैं तुम मेरी ज़मीन बनो
अगली बार मत पूछना के क्यों चाहता हूँ तुम्हें मैं
इस सवाल का जवाब तो खुद पता नहीं है मुझको…

कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से

कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में

बारिश की बूँदें बताएंगी तुम्हें, क्या है अक्स तुम्हारा
आँखें ये मूंदे दिखाएंगी तुम्हें, बेहद दिलकश नज़ारा
इन आँखों को किसी चश्मे की ज़रूरत नहीं
बिन देखे ही अक्सर ये बहुत कुछ देख लेती हैं

अकेली राहों का पता, पूछो कभी तन्हा सफ़र से
बीते लम्हों का पता, ढूंढो कभी यादों के शहर में
कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में

एक शख़्स है जो तुमसे बेपनाह मोहब्बत करता है
बिना निगाहों के भी तुम को अपने अंदर देखता है
इज़हार करने के लिए सही मौका तलाश रहा है
वो जो एक अरसे तक ज़िन्दा एक लाश रहा है

नूरानी रातों का पता, पूछो कभी संदली सहर से
बीती बातों की अदा, ढूंढो कभी साँसों की लहर में
कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में…

बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

बारिश में अक्सर तुम याद आती हो
बूँदों के संग-संग मिलने चली आती हो
हवाओं से पुरानी यारी है मेरी
समझती है सारी बेक़रारी ये मेरी
तभी तो घने बादलों को नचाती है वो
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

अंदर के समंदर की बेचैनी जब भाप बनकर उठती है
घनघोर घटाओं का ताना-बाना ये फौरन बुन लेती है
पहाड़ों की दीवार से जब टकराती है वो
ठंडक मिले जहाँ वहीं बरस जाती है वो
बंजर को गुलशन हरदम बनाती है वो
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

मगर इन दिनों ना घटा है, ना हवा है, ना दुआ है
तभी तो ना बारिश होती है, ना ही तुम नज़र आती हो
और ना ही मुझको वो सुर, राग मल्हार आता है
गाकर जिसे मैं जब चाहूँ बुला लूं तुझे पास अपने
हाँ आता है तो बस बरसती हुई बारिश में भीग जाना
नज़र आता है तो बस बारिश में भीगा हुआ तेरा चेहरा
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो
बूँदों के संग संग मिलने चली आती हो

क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं ?

खुद मुझको भी नहीं पता, क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं
हां जानना भी नहीं चाहता, क्यों सोचता हूं तुम्हें मैं

तुमको सोचने से ज़ेहन को ताज़गी मिलती है
तुम्हारी सादगी देखकर मेरी ज़िंदगी खिलती है

तुमने अपनी हंसी में कई अनमोल मोती छुपा रखे हैं
जब भी हंसती हो, ये दिल की ज़मी पे गिरने लगते हैं

उठाने को जब झुकता हूं, तुम्हारी झुकी हुई नज़रें नज़र आती हैं
हर बार ये सुरमई निगाहें तेरी, पहले से ज्यादा अपना बनाती हैं

कई बार तेरे नाम को अपनी हथेली पे लिखकर मिटा चुका हूं
कई बार तेरे चेहरे को अपनी पलकों पे रखकर सहला चुका हूं

कई बार सपने और दिल टूट चुके हैं, सो आदत हो चली है
घाव वो सारेे भर चुके हैं, दर्द से दिल को राहत हो चली है

ये मोहब्बत नहीं तो और क्या है? क्या है आखिर?
पता चले तो बताने ही सही, पर चली आना कभी

खुद मुझको भी नहीं पता, क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं
हां जानना भी नहीं चाहता, बस चाहता हूं तुम्हें मैं

वो पूछती है, मेरे लिए क्यों लिखते हो तुम?

वो पूछती है, मेरे लिए क्यों लिखते हो तुम?
हर जगह आजकल इतने क्यों दिखते हो तुम

उसे क्या बताऊं, ये मन मेरा उसके मन से जुड़ गया
बैठा था कई दिनों से डाली पे जो, वो परिंदा उड़ गया

गर अब भी ना समझ पाए वो, तो अब और मैं क्या करूं
अब तक किया है जितना, प्यार उससे कहीं ज्यादा करूं

मुझको लगता है शायद, ख़बर है उसे भी मेरे दिल की
वरना यूं कोई क्यों पूछता हैं, राहों से डगर मंज़िल की

वो पूछती है मुझे इतना क्यों सोचते हो तुम
हर पल आजकल साथ मेरे क्यों होते हो तुम

उसे क्या बताऊं, ये दिल मेरा उसकी आस में बेचैन है
ना दिन का पता है इसे, ना होती इन दिनों कोई रैन है

गर अब भी ना समझ पाए वो, तो अब और मैं क्या करूं
अब तक किया है जितना, इश्क़ उससे कहीं ज्यादा करूं

मुझको लगता है शायद, ख़बर है उसे भी मेरे दिल की
वरना यूं कोई क्यों पूछता हैं, तूफ़ा से ख़बर साहिल की

बहुत मन था मेरा तुझसे मिलने का

बहुत मन था मेरा तुझसे मिलने का
जिस रोज़ तूने मिलने से मना कर दिया
मैं तो फिर कहीं नहीं गया उस रोज़ 
मगर ये बावरा मन मेरा मिलने तेरे घर गया

हवाओं के संग-संग आया था, सो पता कैसे चलता
पता पूछते पूछते आखिर इसका भी दिल भर आया
लौट आया फौरन, ना रुक पाया ज़रा भी देर वहां
इसे मालूम था, बेचैनी मेरी सता रही होगी मुझेे
आखिर अकेला छोड़कर मुझे, ये कहां रह पाता है
जहां भी जाता है, थोड़ी देर में लौट आता है

आकर जो इसने तुम्हारा हाल सुनाया
है वो अब तक मेरी सांसों में समाया

सुबह से उस रोज़, की थी तुमसे मिलने की तैयारी
इन आँखों में बस चुकी थी, तुम्हें देखने की बेक़रारी

और तुम हो, कि अपने आशिक को यूं तड़पा रही हो
हर रोज़ बेवज़ह बस इंतज़ार के तोहफ़े दिए जा रही हो

ख़ैर कोई बात नहीं, किसी दिन तो तुम्हें एहसास हो ही जाएगा
के जितनी शिद्दत से मैंने चाहा है तुम्हें, ना कोई और चाहेगा

बस इतना याद रखना, मेहरबानी नहीं मोहब्बत का मुंतज़िर हूं
जो ग़ौर करोगे कभी तो पता चलेगा, मैं भटकता हुआ एक दिल हूं…

 


			

वही पूछ बैठी मुझसे यूं देते हो किसे तुम सदाएं

मैं लिखता रहा जिसके लिए शामों सहर वफ़ाएं
वही पूछ बैठी मुझसे यूं देते हो किसे तुम सदाएं

अब मैं उसे समझाऊं, या अपने नादान दिल को
के तुम दोनों ने ही तो दी है मुझे जीने की अताएं..

तुमसे बात करके दिल को सुकून मिलता है

तुमसे बात करके दिल को सुकून मिलता है
तुम्हें याद करके चेहरा मेरा ख़ूब खिलता है

चोट तुमको लगती है और दर्द मुझको होता है
तेरी आँखें याद करके दिल सपने नए संजोता हैं

मिलने को बेताब हूं, बेचैन बेहिसाब हूं
आहिस्ता पढ़ना मुझेे, मैं एक बंद किताब हूं

पल दो पल की मुलाक़ात भी प्यारी लगती है
तुम्हारे बिन साँसें अब बोझिल सारी लगती हैं

तुमने तो बड़ी आसानी से एक रोज़ अलविदा कह दिया
पर तु्मको क्या ख़बर हमने दिल अपना वहीं रख दिया

वादा है मेरा, तुम्हारे हर दर्द को अपना बना लूंगा
लफ़्ज़ों की ही तरह दिल की बातें तुमको बता दूंगा

अब और दूर रहके, इस तरह तो ना सताओ जानाँ
ख़ातिरदारी करेंगे खूब, दिल के दर पे आओ जानाँ

तो फिर कब मिल रही हो जानाँ, ठीक उसी जगह पे आना
जहां छोड़के गया था मैं वो दिल अपना, हां वो दिल अपना

तेरे तो नाम में ही सुर है…

तेरे तो नाम में ही सुर है
जब भी लेता हूँ, आस-पास कई साज बजने लगते हैं
बेहद दिलकश है तेरी आवाज़, अंदाज़, और एहसास
तेरे बारे में जब लिखता हूँ, शहद से मीठे लगते हैं अल्फ़ाज़
इस बात का ख़ास ख्याल रखता हूँ
के ज़िक्र तेरा तन्हाई में करता हूँ
ताकि पहचान तुम्हारी और एहसास मेरे महफ़ूज़ रह पाएं
तुमने कहा था इक रोज़ मुझसे, के पता ना चले किसी को
बस इसी वादे के चलते मुझे भी अब जाकर ये मालूम हुआ
के कुछ तो है तेरे मेरे दरमियां, एक रूहानी सा राब्ता
जो सुकून देता है मुझे, हर पल हर घड़ी यूं गहरा।

तेरी तो बातों में ही धुन है
जब भी सुनता हूँ, पांव मेरे खुद बखुद थिरकने लगते हैं
तेरी शहनाई पर एहसास मेरे, बाहें खोले यूं नचने लगते हैं
बहुत ख़ास है, ये प्यास, सांस, और एहसास
तेरे बारे में जब सोचता हूँ, हक़ीक़त से ज्यादा अच्छे लगते हैं ख़याल
इस बात का ख़ास ख्याल रखता हूँ
के मोहब्बत तुमसे छुप छुपके करता हूँ
ताकि पहचान तुम्हारी और जज़्बात मेरे महफ़ूज़ रह पाएं
मगर अब और ज्यादा दिनों तक मैं छुपा नहीं पाऊंगा
इतना प्यार करता हूँ तुमसे, के कभी बता नहीं पाऊंगा
अब तो समझ जाओ, पास मेरे आ जाओ
लफ़्ज़ों को पढ़के मेरे, संग मेरे मुस्कुराओ…

Happy birthday Aamir bhai..(Rj Aamir)

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है मखमली आवाज़ का जादूगर वो
या कहूं के अंदाज़े बयां का कारीगर वो

गुलों की तरह महकता है, वो सावन की तरह बरसता है
या कहूं के दिलों को जीतने वाला बाज़ीगर वो

रातों को ज़िंदा करता है एहसास के पुर्ज़े वो
आंखों से बयां करता है अल्फ़ाज़ के क़तरे वो

ज़ुबां तो जैसे शहद से लिपटा हुआ एक लिबास है
वो एक शख़्स नहीं यकीनन मुकम्मल एहसास है

है मखमली आवाज़ का जादूगर वो
या कहूं के अंदाज़े बयां का कारीगर वो

है आमिर वो, दिलकश आवाज़ का साहिर वो
नूरानी क़ैफ़ियत से करता सबको मुतासिर वो…

 


			

मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई

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एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई
ज़िंदगी जीने की इज़ाज़त हो गई
तन से मन की बग़ावत हो गई
ख़्वाबों में ही सही, ज़ियारत हो गई
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई

लबों पे आके लफ़्ज़ ठहर जाते हैं
आँखों में अधूरे अक्स नज़र आते हैं
काग़ज़ पे इश्क़ के फ़साने उतर आते हैं
पलकों के पुराने आशियाने महक जाते हैं
यूँही तो नहीं, हम दीवाने कहलाते हैं
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई

दर्द से रूह को राहत हो गई
चाहा था जिसे वही चाहत हो गई
ना छूटे कभी जो वो आदत हो गई
ना टूटे कभी जो वो इमारत हो गई
ज़िंदगी आजकल इबादत हो गई
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई…


			

फिर कहने को भले ही वो मुझसे दूर है…

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कोई बात तो उसके किरदार में ज़रूर है
लबों पे दुआ, चेहरे पे हया का नूर है

मुझसे ज्यादा मेरे दिल के क़रीब है, हबीब है, ज़ेहनसीब है
फिर कहने को भले ही वो मुझसे दूर है...

			

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम…

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम
पीकर जिसे बारिश में दिल ये खुश हो जाता है
या फिर कहूँ के बंजारे के लिेए वो सराय हो तुम
ठहरकर जिसमें बंजारे को घर का एहसास होता है
कभी कभी तो यूँ लगता है बारिश की वो बौछार हो तुम
भीगकर जिसमें बेसबर इस रूह को राहत मिल जाती है
हाँ अगर कहूँ के धूप में साया देता शजर हो तुम
पाकर जिसकी छाव सुकून वाला सुकून मिलता है

बेरोज़गार दिल को बाद महीने के मिली सैलेरी हो तुम
पाकर जिसे ख़यालों का खाता खुशियां क्रेडिट करता है
या फिर कहूँ के गर्मी की वो छुट्टियां हो तुम
मनाकर जिन्हें स्टूडेंट यह मन फिर से खिल उठता है
कभी कभी तो यूँ लगता है शायर की वो क़लम हो तुम
डूबकर जो हर दिन कुछ नया अनकहा लिख जाती है
हाँ अगर कहूँ के मीर की वो ग़ज़ल हो तुम
पढ़कर जिसे दिल में दबे अरमां जगने लगते हैं

हफ़्ते भर की थकन उतारने वाला वो इतवार हो तुम
पाकर जिसे पूरे वीक की वीकनैस छूमंतर हो जाती है
या फिर कहूँ के सफ़र-ए-हयात में वो विंडो सीट हो तुम
बैठकर जहां पे हर मुश्किल सफ़र आसां लगने लगता है
कभी कभी तो यूँ लगता है राइटर का वो थॉट हो तुम
बोट पे जिसकी सवार होके हर रोज नया वो नोट लिख देता है
हाँ अगर कहूँ के मेरे ख़यालों की मलिका हो तुम
सोचकर तुम्हें हर बार प्यार से प्यार होने लगता है

अब तक तो तुम यह बात बहुत अच्छी तरह समझ चुकी होंगी
के मेरे दिल के साथ साथ मेरे लफ़्जों पर भी हुकूमत चलती है तेरी
जो ना लिखूं तु्म्हारे बारे में ज़रा भी
तो ये सारे अल्फ़ाज़ बाग़ी होकर गीला कर देते हैं हर वो काग़ज़
जिस पर लिखने की खातिर अपने जज़्बात उड़ेला करता हूँ
और फिर इसी नमी के चलते गुम हो जाते हैं वो सारे अल्फ़ाज और एहसास
जिनमें छुपाकर रखता हूँ हर रोज़ मैं एक तस्वीर तुम्हारी

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम
पीकर जिसे बारिश में दिल ये खुश हो जाता है
या फिर कहूँ के बंजारे के लिेए वो सराय हो तुम
ठहरकर जिसमें बंजारे को घर का एहसास होता है….RockShayar

 


			

वो जो हो चुके हैं खुद अपने लिए भी पराये

नज़रों पे चाहतों का चश्मा चढ़ाएं
तक रहे हैं कब से आवारगी के हमसाये

खुदगर्ज़ी की तोहमत क्या लगाएं उन पे
वो जो हो चुके हैं खुद अपने लिए भी पराये

पूरा एक महीना हो गया है तुमको देखे हुए….Miss You…

पूरा एक महीना हो गया है तुमको देखे हुए
अब तो आँखों ने भी यादों से सांठगांठ कर ली हैं
तभी तो इन दिनों ज्यादातर बहती ही रहती हैं
आजकल तो इन्हें केवल ख़्वाबों पर ही यक़ीन रह गया हैं
हक़ीक़त वाला दीदार भी तो महज एक ख़्वाब ही हो चुका है
बस इसी डर से बंद रखता हूँ मैं अपनी आँखेंं
के कहीं चला ना जाए ख़्वाब तेरा बुरा मानके
गर खुली रहेंगी ये आँखें, तो धुंधली हो जाएगी वो फोटू
दिलो दिमाग पे जिसने मेरे, किया है ऐसा खूबसूरत जादू
के अब तो हर जगह तुम ही तुम नज़र आती हो
बंजर में भी बारिश वाला वो एहसास दे जाती हो
पाकर जिसे मैं फिर से वो वाला मैं हो जाता हूँ
जीना जिसे अच्छा लगता है, हाँ बहुत ही अच्छा लगता है
महीने भर से भी ज्यादा हो गया है तुमको देखे हुए
अब तो पलकों ने भी यादों से सांठगांठ कर ली हैं
तभी तो इन दिनों ज्यादातर गीली ही रहती हैं
क्या पता इन्हीं अश्क़ों के सदक़े में तू मिल जाएं कहीं
और मैं जीने लगूं फिर से 
सोहबत में तेरी
मोहब्बत में तेरी
चाहत तू मेरी
आदत तू मेरी...

तुम इन दिनों ईद का चांद हो गई हो

तुम भले ही इन दिनों ईद का चांद हो गई हो
पर मैंने तुम्हारे हिस्से की वो सेवइयां 
संभालकर रखी हैं अब तक
मिलो कभी, तो अपने हाथों से खिलाऊं तुम्हें
हाँ पास बैठो कभी, तो जी भरके हंसाऊं तुम्हें
क्योंकि तुम जब हंसती हो 
तो हवाओं में हर तरफ खुशी की एक लहर फैल जाती है
और तुम जब ख़ामोश होती हो 
तो कायनात का हर ज़र्रा तुम्हारी धड़कन बनके धड़कने लगता हैं
हाँ तुम जब धीरे से शरमाती हो
तो काले घने बादल उमड़ आते हैं
फिर जब यूं हौले से दिल चुराती हो 
तो वो बारिश के तोहफ़े मुझे हज़ार दे जाते हैं
इस बारिश में भीगने से ज़ुकाम नहीं होता है
इस बारिश में भीगनेे से तो आराम मिलता है
मिलो कभी इत्तेफ़ाकन ही ऐसी बारिश में, तो बताऊं तुम्हें 
अब तक जितना पाया है, हाँ उससे कहीं ज्यादा पाऊं तुम्हें
तुम भले ही इन दिनों ईद का चांद हो चुकी हो
पर मैंने तुम्हारे हिस्से की वो सेवइयां 
सहेजकर रखी हैं अब तक
मिलो कभी, तो अपने हाथों से खिलाऊं तुम्हें
हाँ पास बैठो कभी, तो जी भरके हंसाऊं तुम्हें
क्योंकि तुम जब हंसती हो तो फिर से ज़िंदा हो जाता हूँ मैं
यूं हर बार बार-बार फिर से जी उठना अच्छा लगता है मुझे
तन्हाई की बजाए तुम्हारे साथ जीना अच्छा लगता है मुझे...
 


			

सच में यार, बहुत प्यार करता हूँ तुम्हें

तुम्हारे माथे पे ज़ुल्फ़ की वो इक लट प्यारी लगती है मुझे
कई बार मैंने तुम्हें इस बारे में बताने का भी सोचा है
सच में यार, बहुत प्यार करता हूँ तुम्हें मैं
बस कहने को लफ़्ज़ ही नहीं मिल पाते कभी
हालांकि लोग कहते हैं, मैं एक शायर हूँ
लफ़्ज़ों से रिश्ता बहुत गहरा है मेरा
मगर जब भी दिल की बात कहने की बारी आती है
लफ़्ज़ों से रिश्ता मेरा एक अजनबी की तरह हो जाता है
कल तक जिस क़लम को हमदम कहा करता था
आज वही क़लम साथ देने से इंकार कर देती है
मुझे लगता है ये सब जज़्बातों का तिलिस्म हैं
बिना रूह के इस जहान में बेजान हर जिस्म हैं
तुम वही गुमशुदा रूह हो मेरी, जो बरसों पहले बिछुड़ गई थी
अब जाकर मिली हो, इस बार तो छोड़कर नहीं जाओगी ना…

दिल ने ये पैग़ाम लिखा है

मेरे दिल के हर हिस्से पे तेरा नाम लिखा है
जो पढ़ सको तो पढ़ लेना, दिल ने ये पैग़ाम लिखा है

बहुत हो गया, यूं चोरी छुपे देखना, जज़्बात पलकों पे सहेजना
इस बार तो दिल ने फ़रमान ये सरेआम लिखा है

दूरियां भले ही मुझे तुमसे, दूर कर दे पर ऐ सनम
ज़ेहन ने तसव्वुर पे तेरे बेशकीमती ईनाम रखा है

शायर हूँ तो ग़ज़ल में बात करता हूँ, ग़ज़ल में बात कहता हूँ
मोहब्बत का ये पहला ख़त मैंने तेरे नाम लिखा है

नज़रें मिली जिस रोज़ तुमसे, तेरा हो गया मैं तो ओ जानाँ 
कभी ग़ौर से पढ़ना ये ग़ज़ल, प्यार का पयाम लिखा है

बहुत ग़म सह चुके हैं, बहुत तन्हा रह चुके हैं
पढ़ो कभी निगाहें, निगाहों में किस्सा तमाम लिखा है

पहुंचा सकूं तुम तक, अपने दिल की हर इक सदा
बस इसीलिए तो जानाँ, मैंने यह क़लाम लिखा है…

 
 
 

तुम्हें तो पता भी नहीं, कितना चाहता हूँ तुम्हें

तुम्हें तो पता भी नहीं, कितना चाहता हूँ तुम्हें
पता चले भी तो कैसे, बेअल्फ़ाज़ ख़त लिखता हूँ तुम्हें

पहली बार जिस रोज़ तुमको देखा था, बस देखता ही रह गया
बाद उसके अब हर जगह बेवज़ह देखता हूँ तुम्हेंं

तुम्हारा चेहरा किसी की याद दिलाता है, पता नहीं किसकी
सोच भी खुद पड़ जाएं सोच में, इतना सोचता हूँ तुम्हें

तु्म्हारी हंसी का वो इक क़तरा, संभालकर रखा है दिल में
जब भी दिल करता है, बेतहाशा जीता हूँ तु्म्हें

आँखें तुम्हारी हैं ग़ज़ल, चेहरा जैसे कोई किताब
जी भरके देखता हूँ पहले, फिर धीरे-धीरे पढ़ता हूँ तुम्हें

पता नहीं तुम कौन हो, हाँ दिल-ए-नादान का चैन हो
दरगाह पे धागे बांधकर, मन्नतों में मांगता हूँ तुम्हें

मैं ज्यादा तो कुछ नहीं जानता, ये क्या हो रहा हैं, ये क्यों हो रहा हैं
बस अपनी हर इक साँस में महसूस करता हूँ तु्म्हें…

तुम्हारी तस्वीर देखने के बाद ही आजकल मुझे नींद आती है 

तुम्हारी तस्वीर देखने के बाद ही आजकल मुझे नींद आती है 
जो ना देखू तुम्हारा नक़्श तो नींद कोसों दूर चली जाती है
लगता है तुमने सुकून भरी नींद को सुरमे की तरह अपनी आँखों में लगा लिया है
और जो बाक़ी बचा कुचा चैन-ओ-सुकूं था वो तुमने अपने आँचल में छुपा दिया है
हालाँकि तुम्हें यह बखूबी पता चल जाता है 
कि मैं देर रात तक तुम्हारी तस्वीरें देखता रहता हूँ
देर रात तक तुम्हें यूं तकने के लिए माफ़ी चाहता हूँ
मगर मैं करूँ भी तो क्या करूँ आखिर
मोहब्बत का मारा दिल ये बेचारा
इज़हार-ए-मोहब्बत करने से डरता है बहुत
इसीलिए तो अक्सर रात रात भर
तुम्हारी तस्वीरों के ज़रिए तुम्हें अपने आसपास महसूस कर लेता है

अब तक तुम्हारी कई तस्वीरें देख चुका हूँ मैं
हर तस्वीर में तुम बेनज़ीर बेहद हसीन लगती हो
किसी में माहज़बीं तो किसी में नाज़नीन लगती हो
कभी चश्मिश बन जाती हो, तो कभी बिना चश्मे के चैन चुराती हो
कभी ख़्वाहिश बन जाती हो, तो कभी बारिश बनके ख़ूब भिगाती हो
कभी फसल की तरह लहराती हो, तो कभी मासूम परी सी शर्माती हो
कई अलबेले से रंग नज़र आते हैं तुम्हारी तस्वीरों में
जीने के बेहतर ढंग नज़र आते हैं तु्म्हारी तस्वीरों में
तु्म्हारी हर एक तस्वीर मेरे लिए बहुत अनमोल हैं
नज़रों से देखकर इन्हें अपने दिल में सहेज लेता हूँ

तस्वीरों के इस तोहफ़े के लिए बेहद शुक्रिया
उम्मीद करता हूँ अगली बार जब भी तुम्हारी तस्वीर देखूंगा
तो तुम उस तस्वीर से बाहर निकलकर मेरे सामने आ जाओगी
और तब बताऊंगा यूं तुम्हें 
के कितना चाहता हूँ तुम्हें…

तो अच्छा लगता है…

तुम जब बात करती हो तो अच्छा लगता है

तुम जब पास रहती हो तो अच्छा लगता है
 
तुमसे दूर जाना, मुमकिन नहीं है जाँना
तुम जब साथ रहती हो तो अच्छा लगता है
 
पाकर यह सोहबत तेरी, मुकम्मल हो गई मोहब्बत मेरी
तुम जब साथ चलती हो तो अच्छा लगता है
 
पल भर की जुदाई, सदियों से लंबी लगती है
तुम जब पास बैठती हो तो अच्छा लगता है
 
आज़ाद हवा सी उड़ती रहो, हरदम ओ हमदम
तुम जब खुलके बहती हो तो अच्छा लगता है
 
चेहरा यह तुम्हारा, है सावन की पहली बारिश
तुम जब अल्हड़ हँसती हो तो अच्छा लगता है
 
वैसे तो नक़ाबपोश चेहरा मेरा, इज़ाज़त नहीं देता किसी को

पर जब तुम मुझे यूं देखती हो तो अच्छा लगता है।

जब कई दिन हो जाते हैं तुमको देखे गए

जब कई दिन हो जाते हैं तुमको देखे गए

तो नज़रों को अपनी काबिलियत पे शक होने लगता है
 
निगाहों का अपनी निगाह पर यूं शक करना
उस वक़्त और भी पुख़्ता हो जाता है
जब ख़्वाब में भी तुम कहीं नज़र नहीं आती हो
हरज़ाई सी हकीकत बनकर ज़ेहन से उतर जाती हो
हर बार दूरियों का दामन थामकर दूर कहीं निकल जाती हो
 
इस बार सोच रहा हूँ
कि उस सोच को ही दबोच लू
जिस सोच में तेरा एहसास बसता है
गर नहीं हुआ जिस सोच में तेरा एहसास
तो उस सोच को ही नज़रों से खरोंच दूंगा
वैसे भी दिल को आजकल दर्द सहने का शऊर आ गया है
अजनबी राहों पर तन्हा चलने का यह फ़ितूर भा गया है
 
जब कई दिन हो जाते हैं तुमको सोचे हुए
तो ख़यालों को अपनी क़ैफ़ियत पे शक होने लगता है
इस शक को दूर करने का अब एक ही तरीका है

हमें मिलकर कुछ यादें सहेज लेनी चाहिए…

रोज़ाना तुमपे कुछ लिखने की सोचता हूँ….

रोज़ाना तुमसे बात करने की सोचता हूँ

रोज़ाना तुमपे कुछ लिखने की सोचता हूँ
 
रोज़ाना मगर उन अल्फ़ाज़ों की तलाश अधूरी रह जाती हैं
जिन अल्फ़ाज़ो के ज़रिए मैं तुम तक वो एहसास पहुंचा सकूँ
 
रोज़़ाना मगर उस एहसास की प्यास अधूरी ही रह जाती हैं
जिस एहसास के ज़रिए मैं तुम्हें अपने दिल की आवाज़ सुना सकूँ
 
जिन अल्फ़ाज़ों के साये तले मैं अपने वो ज़ख़्म सी रहा हूँ
जिस एहसास के साये तले मैं आजकल दोबारा जी रहा हूँ
 
हां वही मखमली अल्फ़ाज़, पढ़कर जिन्हें दिल की बेचैनियां दूर हो जाती हैं
हां वही सुरमई एहसास, महसूस कर जिसे जिन्दगी नूर से तर हो जाती है
 
हां वही अजनबी आवाज़, सुनकर जिसे मेरी धड़कनें तेज़ होने लगती हैं
हां वही मयकशी अंदाज़, देखकर जिसे पलकें नए सपने बुनने लगती हैं
 
रोज़ाना तुमसे बात करने की सोचता हूँ
रोज़ाना तुमपे कुछ लिखने की सोचता हूँ
 
रोज़ाना मगर ना तो वो अल्फ़ाज़ मिलते हैं, ना ही वो एहसास
अब तो बस दिल में बस चुकी है, पूरी तरह से एक ऐसी प्यास
 
जिसको अब भी है, तेरे लौट आने की आस
जिसको अब भी है, तेरे मिल जाने की आस
 
इसी आस ने तो अब तक ज़िंदा रखा है मुझे
वरना वक़्त ने तो कई साज़िशें की थी मौत की
 
मगर मैंने इन सांसों से किया था, सौदा एक सच्चा

मुझे यक़ीं था है और रहेगा, यह इश्क़ मेरा है सच्चा।

तुम बस एक ख़याल नहीं हो…

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तुम बस एक ख़याल नहीं हो, जो ज़ेहन की तश्तरी से भाप बनकर उड़ जाएं

तुम तो दरअसल एक ऐसा सवाल हो, जो कई सदियों से मन में उठ रहा है
 
कई बार मैंने अपने बावरे मन की प्याजनुमा परतों को खोलने की कोशिश की हैं
लेकिन हर बार खुद को उन्ही परतों के दरमियाँ बेसाख़्ता सा लिपटा हुआ पाता हूँ
 
खुद को पाने की मेरी वो कोशिशें आखिर तक दम नहीं तोड़ती हैं
मंज़िल की तलब नहीं हैं इन्हें, ये तो बस बरसों से यूँही बेख़बर हैं
 
जब भी ख़्वाबों का जहान हक़ीक़त के बेहद क़रीब पहुंचता है
फिर से वही एक नया सपनों का शहर बसना शुरू हो जाता है
 
तुम कोई शबनम की बूँद नहीं हो, जो सूरज निकलते ही गुम हो जाएं
तुम तो दरअसल एक ऐसा खुमार हो जो कई सालों से दिल पे छा रहा है
 
कई बार मैंने अपने नादान दिल की सहमी हुई आंखें टटोलने की कोशिश की हैं
लेकिन हर बार खुद को उन्ही नज़रों के दरमियाँ नाबीना सा ठहरा हुआ पाता हूँ
 
वज़ूद को बचाने की मेरी वो कोशिशें आखिर तक दम नहीं तोड़ती हैं
मंज़िल की तलब नहीं हैं रूह को, यह तो बस बरसों से यूँही बेसबर हैं
 
जब भी ख़्वाबों का जहान हक़ीक़त के बेहद क़रीब पहुंचता है
फिर से वही एक एक करके ख़्वाबों का टूटना शुरू हो जाता है
और यह सिलसिला कभी रुकता नहीं है,
बस चलता रहता है

बिना रुके बस चलता रहता है…

तुम्हारे जाने के बाद मुझको ये एहसास हुआ

तुम्हारे जाने के बाद मुझको ये एहसास हुआ
 के तुम्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की मैंने

हालांकि जाते वक्त तुमने मुझे अपना पता बताया था
 लेेकिन तुम्हारा पता सुुुुनते वक्त मैं लापता हो चुका था

अब जो भी हो जानाँ, तुमसे मोहब्बत हो गई है
 तुम्हारी याद में जलना, यूं मेरी आदत हो गई है

हर वक्त तुम्हारी बातें करना, दफ्तर की नौकरी से बेहतर है
 हर घड़ी तुम्हारी आँखें पढ़ना, आईआईटी की तैयारी से बेटर है

आजकल तो इस नींद ने भी निगाहों से रिश्वत ले रखी है
 तुम्हारी तस्वीर देखे बिना ये स्लीप मोड में जाती ही नहीं

मुझे और मेरे जज़्बातों को समझने के बजाए महसूस करना
 तब तुम्हें पता चलेगा, ज़िंदगी हम पे क्यूँ मेहरबान हो रही है

गर फुर्सत मिले कभी, तो एक फोन कर देना यूंही कहीं
 कुछ बातें करनी हैं, वो जो कब से लबों पे आके ठहरी हैं

तुम्हें खोने के बाद मुझको ये एहसास हुआ
 के तुम्हें पाने की कोशिश क्यों नहीं की मैंने।
 

पिछले कुछ दिनों से बहुत ज्यादा याद आ रही हो

पिछले कुछ दिनों से बहुत ज्यादा याद आ रही हो
ऐसा लगता है मानो तुम मेरे और पास आ रही हो

वैसे इतने दिनों से पास ही तो हो तुम, दूर कब गई तुम
यह वहम तो नज़रों को क़दमों के निशां देखकर हुआ है

बहुत मुश्किल हो जाता है कभी-कभी दिल को संभाल पाना
दिल तो बच्चा है ना, अक्सर अपनी ज़िद पर अड़ जाता है

हालांकि अक़्ल भी कभी-कभी नादान होने की नक़्ल कर लेती है
लेकिन आखिर में यह भी अपनी समझदारी पर उतर आती है

और बना देती है मुझे हर बार, पहले से और ज्यादा सख़्त
ज़ेहन की वादी में फिर भी, पनपता रहता है वो यादों का दरख़्त

हरे पत्तों पे जिसके नज़र आता है तु्म्हारी ही नक्श
उसी नक्श की तलब ने तो बना दिया है मुझे, कोई और ही शख़्स

एक ऐसा शख़्स, जो ढूंढ रहा है खुद अपना ही अक्स 
आईना जिसकी आँखों में है, फिर भी नाबीना सा कर रहा है रक्स

इस बार तो अलविदा को भी अलविदा कहना है
अब और नहीं सहा जाता इन दूरियों का सितम

पिछले कुछ दिनों से बहुत ज्यादा याद आ रही हो
ऐसा लगता है मानो तुम मुझमें घर बना रही हो।

तुम्हारी याद जब आती है, मैं वो तस्वीर देख लेता हूूँ

तुम्हारी याद जब आती है, मैं वो तस्वीर देख लेता हूूँ
जिस तस्वीर मेंं तुम मुझ को मेरी तक़दीर लगती हो

कुछ ही तो तस्वीरें हैं तुम्हारी मेरे पास, सो किश्तों मेें देखा करता हूँ
कोई नहीं चाह सकता तुम्हें इस तरह, जिस तरह मैं तुम्हें चाहता हूँ

तुमसे जुड़ी हर चीज मुझे अब अपनी लगती हैं
तुम्हारी बातें वो यादें बहुत ही अच्छी लगती हैं

दूर जाकर भी हर वक़्त मेरे पास रहती हो
ऐसा लगता है मानो आसपास कहीं बैठी हो

याद है मुझे वो मुस्कुराकर मिलना तेरा
उसी मुस्कुराहट से तो बनता था दिन मेरा

कई बार तुमने ही तो जी भरके हँसाया मुझे
दर्द के दरिया से सौ बार बाहर निकाला मुझे

हालांकि तुमसे बात करने को, जी तो बहुत करता है मेरा
मगर मोहब्बत का मारा ये दिल बेचारा बहुत डरता है मेरा

रोज़ तुम्हारे नंबर मोबाइल में टाइप करके मिटा देता हूँ
मुझमें है तू कहीं, यही सोचकर खुद को तसल्ली देता हूँ

तुम्हारी याद जब आती है, मैं वो पल याद कर लेता हूूँ
जिस एक पल मेंं तुम मुझ को मेरी तक़दीर लगती हो

ज्योंही तुमने जाने की कहा, और मेरा यह चेहरा उतर गया

ज्योंही तुमने जाने की कहा, और मेरा यह चेहरा उतर गया
हालांकि ज्यादा कुछ हुआ नहीं, बस वक़्त वहीं पे ठहर गया

इस थोड़े से वक़्त में ही तुमने मुझे कई यादें दी हैं
याद हैं मुझे वो सब, बिन कहे जो हमने बातें की हैं

दिल ठहरा नादान, सो बिना सोचे समझे अपनी करता रहा
दिल ही दिल में चाहत पाल ली, कहने से मगर ये डरता रहा

तुम्हें तो शायद पता भी नहीं, के कितना चाहता हूँ तु्म्हें 
हर जगह नज़र आती हो, इतना ज्यादा सोचता हूँ तुम्हें

हर रोज़ दिन ढलने का इंतज़ार पसंद था मुझे
वही इंतज़ार, जिसने यूं बेक़रार किया था मुझे

तुम्हारे साथ बिताया हर एक लम्हा, पूरी सदी की तरह लगता है
अल्हड़ अलमस्त किरदार तुम्हारा, किसी नदी की तरह लगता है

हो सकता है…यह मोहब्बत मेरी एकतरफ़ा हो
मगर इतना ज़रूर कहूंगा, के तुम नेक वफ़ा हो

इतनी ख़ूबसूरत यादें देने के लिए शुक्रिया
पहली ही नज़र में अपना बनाने के लिए शुक्रिया

ज्योंही तुमने अलविदा कहा, और मेरा यह दिल टूट गया
हालांकि ज्यादा कुछ हुआ नहीं, बस यह फिर से बंजर हो गया।

 

ये ज़िंदगी नंबर से नहीं अंदर की आवाज़ से बनती है

सबने यही कहा कि दसवीं में अच्छे नंबर ले आओ तो ज़िंदगी बन जाएगी

पर किसी ने नहीं कहा ये ज़िंदगी नंबर से नहीं अंदर की आवाज़ से बनती है

मेरे दिल के दफ़्तर में एक लड़की काम करती है…

मेरे दिल के दफ़्तर में एक लड़की काम करती है
आसपास जिसके होने से यह ज़िन्दगी महकती है
 
जिस रोज़ वो नहीं आती है, उस रोज़ मेरा मन नहीं लगता है
जिस रोज़ वो नहीं दिखती है, उस रोज़ ये दिल बहुत डरता है
 
ना कोई बिन बुलायी मेहमान है, ना कोई पुरानी जान पहचान है
फिर भी ऐसा लगता है मानो, गुज़री यादों में उसके ही निशान है
 
उसकी एक मुस्कुराहट से दिन भर की थकान उतर जाती है
उसके क़दमों की आहट सुनते ही ख़ामोशी भी मचल जाती है
 
क़लम की तरह सीधे दिल पे वार करती है
आँखों ही आँखों में बेनज़ीर इक़रार करती है
 
मेरे दिल के दफ़्तर में एक लड़की काम करती है
आसपास जिसके होने से बंजर में भी बारिश होती है
 
जिस रोज़ वो नहीं आती है, उस रोज़ मेरा मन नहीं लगता है
उस रोज उसकी याद में हर एक पल मानो सदी सा गुज़रता है
 
ना कोई मुंतज़िर मेजबान है, ना कोई पुरानी जान पहचान है
फिर भी ऐसा लगता है मानो, उसी में बस गई मेरी जान है।