अच्छी शायरी क्या होती है (part 2)By Fehmi Badayuni


आगे बढ़ने से पहले ‘आमद’ (स्वतःस्फूर्त शायरी ) और ‘आवुर्द’ (प्रयासजन्य शायरी ) पर एक छोटी सी बहस बहुत ज़रूरी है क्यों कि अब सारा दारोमदार इन्ही पर आने वाला है। आपने अक्सर शायरों को कहते सुना होगा कि ”अब वो शेर सुनिए जिसके लिए ग़ज़ल कही” या कहना पड़ी या ”हासिल-ए-ग़ज़ल शेर समाअत करें” वग़ैरह वग़ैरह। इस शेर को आमद का शेर कहते हैं यानी अचानक आपके ज़हन में एक ख़्याल या एक मिसरा पैदा होता है और थोड़ी सी कोशिश करके आप शेर मुकम्मल कर लेते हैं। आम तौर पर ‘आमद’ का शेर अच्छा ही होता है।

इसके बरअक्स आवुर्द यानी कोशिश करके शेर ‘बनाया’ जा सकता है, लेकिन इनमें वो बात नहीं होती जो ‘आमद’ वाले शेर में होती है। कुछ पुराने उस्तादों का क़ौल है कि शेर बनाया नहीं जाता बल्कि होता है या हो जाता है। ठीक है मान लिया कि एक शेर हो गया आपने उसका क़ाफ़िया और रदीफ़ Set कर लिया। अब आप ग़ज़ल पूरी करने के लिये अलग अलग क़ाफिये चुनेंगे और शेर ‘बनाने’ में लग जाएंगे, जब कि शेर बनाया नहीं जा सकता, बल्कि हो जाता है।

तो फिर आप क्या बना रहे हैं। महज़ ग़ज़ल पूरी कर रहे हैं, ताकि आप आमद का एक शेर सुनाने के अहल हो जाएँ। दूसरी बात ये कि ‘आमद’ हर वक़्त नहीं होती, कभी कभी होती है। 5 / 7 शेर की पूरी ग़ज़ल ही आमद की हो जाये, ये ना-मुमकिन सा है।

मगर हम ग़ालिब के यहां देखें या किसी और बड़े शायर के यहाँ देखें तो ग़ज़ल के सारे शेर एक ही Quality के होते हैं और मुतअस्सिर भी करते हैं, इससे साफ़ ज़ाहिर है कि अच्छा शेर ख़ुद भी हो सकता है और ‘बनाया’ भी जा सकता है। कम से कम उसे 70 / 80% तक आमद के शेर में ढाला जा सकता है। बड़े शायरों के ऐसे ही शेर ध्यान से पढ़ कर ये तलाश किया जा सकता है कि इन्होंने क़ाफिये रदीफ़ को अच्छे शेर में बदलने के लिए क्या किया है। मैंने ये अमल नए पुराने नामचीन शायरों पर किया और कुछ नतायज हासिल किए, जो सब में Common थे, और कुछ अलग अलग थे।

एक बात और कहनी है कि ये तजज़िया हमने अपनी फ़हम के मुताबिक और अपनी सहूलत के लिए किया है। आपका या किसी का भी इससे मुत्तफ़िक़ होना ज़रूरी नहीं है। और न मेरा कोई ज़ोर है कि आप इसे ही अपनी शायरी पर Apply करें।

शायरी बिल-ख़ुसूस ग़ज़ल की शायरी इशारों कनायों और तशबीह (Simile) का फ़न है इसका अहम ज़ेवर इस्तिआरे यानी Metaphors हैं। इस्तिआरे का मानी उधार लेना है, यानी हम किसी लफ़्ज़ का मफ़हूम किसी दूसरे लफ़्ज़ से लेते हैं, तो वो इस्तिआरा कहलाता है, जैसे ‘सफ़र’ ज़िन्दगी का इस्तिआरा है, ‘दरिया’ वक़्त का इस्तिआरा है क्योंकि वक़्त की तरह आगे बढ़ता रहता है। वग़ैरह वगैरह!! जैसे हमारी आपकी Family होती है उसी तरह अल्फ़ाज़ की भी Family होती है और इसमें इज़ाफ़ा भी वक़्त के साथ होता रहता है। उर्दू शायरी के सबसे पुराने ये चन्द इस्तिआरे एक ही Family के मेम्बर हैं।

1- आशियाँ
2- बिजली
3- शजर
4- क़फ़स
5- चमन

किसी शेर की तशकील में इस में से कम से कम दो इस्तिआरे (रूपक) लेना ज़रूरी है, दो से ज़्यादा भी लिए जा सकते हैं, फिर उनके बीच कोई Link क़ायम करते हुए एक ख़्याल अख़्ज़ करना है। उस ख़्याल को दूसरे अल्फ़ाज़ की मदद से किसी बहर में बांधना है। एक मिसरा बन जायेगा। इस पर दूसरा मिसरा लगा कर शेर पूरा करना है। इस्तिआरे किसी एक मिसरे में या दोनों मिसरों में लाये जा सकते हैं। दोनों में लाएंगे तो शेर और ज़ियादा मानी-दार हो जाएगा। मफ़हूम की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं अगर आपने Link को Natural लिया है तो मफ़हूम अपने आप पैदा हो जाएगा। लेकिन ये Group बहुत Old है, हज़ारों शेर पुराने लोगों ने इन इस्तेआरों की मदद से निकाले हैं। आपका शेर किसी न किसी से टकरा ही जायेगा, लिहाज़ा इस पर कोशिश न करें, ये Example के तौर पर लिया गया है। अब एक शेर ग़ालिब का देखिए इस Group का सबसे अहम शेर यही लगा मुझे।

क़फ़स में मुझ से रूदाद ए चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यों हो

अब हम ये चाहते हैं कि इस Group से शेर कहें। क्योंकि रवायत से जुड़े रहना भी ज़रूरी है, और साथ ही ये भी चाहते हैं कि शेर ताज़ा और नया भी हो तो उसकी एक तदबीर है कि हम इस Group में इसी फ़ैमिली के कुछ नए लफ़्ज़ शामिल करें। जैसे आशियाँ के Base पर चिड़िया या परिंदा, शजर के Base पर फल, फूल,पत्थर में से कुछ। इस से ये होगा कि जो अल्फ़ाज़ आपने नए लिए हैं, उनमें आपसी Relation ज़रूर क़ायम किया जा सकता है क्योंकि Origin एक ही है। अब चिड़िया, फल, फूल, पत्थर में हमें एक Link मिल गया जिससे एक ख़्याल नमूदार हुआ कि ”अगर शजर पर पत्थर मार कर फल तोड़ा जाए तो वो चिड़िया के भी लग सकता है” मिसरा ये रहा,

”एक चिड़िया गिरी थी फल के साथ”

ये मिसरा पूरा बनाया हुआ नहीं है लगभग ‘आमद’ जैसा ही है अब ऊपर के मिसरे में पत्थर का ज़िक्र ज़रूरी है। ‘शजर’ या ‘पेड़’ का ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ‘शजर’ की Family के दो लफ़्ज़ पहले ही आ चुके हैं, जो Reader को ‘शजर’ तक पहुंचा देंगे।

अब शेर इस तरह हुआ,

मैंने पत्थर से हाथ तोड़ लिया
एक चिड़िया गिरी थी फल के साथ

यक़ीन है कि ये शेर उस्तादों के शेर से लग्गा नहीं खाता। अब एक और मिसाल देकर ये सिलसिला ख़त्म किया जाएगा।

दूसरे नम्बर पर जिस Group के इस्तिआरों का इस्तेमाल जम कर किया गया है, वो यह है,

1- हवा या आंधी
2- दिया या चराग़
3- उजाला या अंधेरा

हर शेरी मजमूए में आपको इस पर शेर मिल जाएंगे। लिहाज़ा अगर आप इसी Group से ख़्याल उठाएंगे तो रवायत के साथ किसी शेर से भी जुड़ जाएंगे। आइये फिर वही कर के देखते हैं,

हवा के Base पर पेड़ या खिड़की लिया
दिये के Base पर मिट्टी,चाक और तेल लिया
उजाले के Base पर कमरा या दीवार लिया

किसी ख़्याल की पैदाइश के लिए अब इसमें से हमें दो या तीन लफ्ज़ Consider करना है। एक तो यूँ हुआ ”कुम्हार अगर तेल में मिटटी गूंथ कर दिया बनाये तो क्या situation होगी” सोचने पर ये ख़्याल कुछ अटपटा सा लगा, लिहाज़ा Pending में डाल देते हैं। दूसरा ये हुआ कि ”जब कुम्हार चाक पर मिट्टी का दिया बना रहा हो तो उस वक़्त हवा के ज़हन में क्या चल रहा होगा” इस ख़्याल में जान नज़र आई तो शेर भी हो गया,

हवाएँ चाक के नज़दीक आन बैठी हैं
अभी बना भी नहीं है चराग़ मिट्टी का

चाक और मिट्टी की मौजूदगी में कुम्हार को मिसरे में लाने की ज़रूरत नहीं है, ये मैं इस लिए बार बार बता रहा हूँ कि एक भी फ़ालतू लफ़्ज़ शेर को बेकार कर सकता है। उम्मीद है कि आपको ये सिलसिला पसन्द आएगा लेकिन इस के इस्तेमाल के लिए बड़ी Study और माथा-पच्ची की ज़रूरत है। होनी भी चाहिए कि शायरी यूँही थोड़ी हो जाती है।

इसी तरह हर दौर की ग़ज़लिया शायरी में कोई न कोई Group हावी रहता है। 1980 से 2000 तक के दौरान हवा, चराग़ का दबदबा रहा था। जिधर देखिये हवा ही हवा, चराग़ ही चराग़ नज़र आते थे। मौजूदा वक्त में ख़ाक, बदन, वहशत का Group हावी है। ग़ज़ल की शायरी पर उस्ताद तो उस्ताद नौजवान लड़के भी इसी पर लगे हुए हैं।

दर असल ये तसव्वुफ़ के सूफ़ी शायरों ने अमूमन फ़ारसी में इस्तिआरों की शक्ल में ख़ूब इस्तेमाल किये हैं । तसव्वुफ़ का फ़लसफ़ा बड़ा Complicated है वुजूद, वहदत-उल-वुजूद,अज़ल, अदम और इसी तरह के कई भारी भरकम लफ़्ज़ इसमें भरे पड़े हैं।

इस पर लगातार अच्छी शायरी करने वाले नौजवानों मे से दो एक को छोड़ कर बाक़ी ने ये अल्फ़ाज़ सुने भी नहीं होंगे मगर Group में कोई Link बना कर शेर कह देते हैं और मफ़हूम कुछ न कुछ निकल ही आता है। अब तो इसमें ‘ख़ाक’ और ‘बदन’ की family भी बढ़ गयी है चाक, कूज़ा-गर लहू, सांस, भी शामिल हो गए हैं।

Symbolic शायरी का सबसे बड़ा फ़ायदा ही ये है कि इसमें शाइर ख़ुद मफ़हूम पैदा नहीं करता बल्कि सारे symbols मिल कर ख़ुद एक माना बनाते हैं। ब-राहे-रास्त की जाने वाली नफ़्सियाति शायरी में ज़्यादा महनत करना पड़ती है और Fiction, फ़िल्म, News वग़ैरह से तहरीक हासिल करना पड़ती है। एक बात और कि ऊपर का System मेरी ज़ाती ईजाद नहीं है। आप अमीर ख़ुसरो को पढ़ें तो उसमें एक Chapter कह-मुकरनी का है। इसमें होता ये था कि वो लोगों से कहते थे कि सब एक एक लफ़्ज़ बोलें, जब तीन-चार लफ़्ज़ जमा हो जाते तो अमीर ख़ुसरो उनका इस्तेमाल करते हुए एक शेर जैसा कुछ कहते और उसे कहमुकरनी बताते। मिसाल के लिये एक बार वो कहीं जा रहे थे कि किसी गाँव से गुज़रे तो पनघट पर औरतें पानी भर रहीं थी, उन्होंने वहाँ पानी पिया और उनसे कहा कि एक एक लफ्ज़ बोलो तो चारों औरतों ने खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल का लफ़्ज़ अदा किया, जिनमें ब-ज़ाहिर कोई Link नज़र नहीं आता, मगर ख़ुसरो ने उसी वक़्त ये मुकरनी सुनाई,

खीर पकाई जतन से चरखा दिया जला
आया कुत्ता खा गया तू बैठी ढोल बजा

तो मैंने कोई नया शगूफ़ा नहीं छोड़ा है, सिर्फ़ अमीर खुसरो की इस Technique को Modernize किया है।

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