ये कैसी ज़िन्दगी मौला

कभी आतिश कभी बारिश ये कैसी ज़िन्दगी मौला
सफ़र भी अलविदा को है मिलेगी कब ख़ुशी मौला

गुज़रता ही नहीं लम्हा गुज़रता हूँ मैं हर लम्हा
रिहा कर दे मुझे या फिर बदल क़िस्मत मेरी मौला

“उदासी में डूबा हुआ लम्हा”

 

एक लम्हा, उदासी में डूबा हुआ
मुझमें आकर, थम गया
जब कभी बैचैन होता हूँ
चेहरे पर नज़र, आ जाता
खामोश आँखों से, जाने क्या कह रहा
दिल में छुपी, बेबसी का अक्स है
जेसे इक गहरा, नीला समंदर
सीने में, ज़ज्बात दफन किये बेठा हुआ
साहिल पे खड़ा हूँ, कबसे यहाँ
कोई किनारा मगर, दिखता नहीं
कहा चले गए, हंसी के वो बादल
ख़ुशी में जो सदा, बरसते रहते
तलाश भी अब, धुंधली होने लगी है
पलकों के, उदास पानी से
एक शख्स, दर्द में डूबा हुआ
मुझमें आकर, थम गया

“एक नादान परिंदा था वोह”

एक नादान परिंदा था वोह 
पतंग के माँझे से यूँ लटका हुआ 
मेने आज एक कबूतर देखा
कबका मर कर सूख चुका
माँझे से दोनों पंख कटे हुए 
बहुत फड़फड़ाया होगा शायद 
आज़ाद होने को
मगर ना मालूम था उसे
इस जाल के बारे में
इंसान के लिए जो महज खेल
मनोरंजन का साधन है 
परिंदे ने ना सोचा होगा कभी
ये पतंग यूँ मौत का खेल बन जायेगा
वो तो बस शाम को उड़कर
अपने घर लौट रहा था 
पतंगों कि उस बाजी में
जान कि बाजी हार गया
कुछ ना नज़र आया उसे 
बस माँझे में उलझता गया
आखिरी सांस तक फड़फड़ाता रहा 
फिर दम तोड़ दिया 
लटक गया माँझे से यूँ
जेसे हो कोई कटी पतंग 
छत कि मुंडेर से लटकी हुई 
दूर पेड़ो पर बेठे थे चील कौए
बदन को नौंच नौंच कर खा गए
जो बचा उसे धूप सुखा गयी
अब तो सिर्फ मांझा लटका है अकेला
किसी कबूतर के निशान नहीं इस पर 
शायद उसका गुनाह यही के
एक नादान परिंदा था वोह……… 

“भूल कभी ना भूल से”

भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से
इरादे हो तेरे गर आसमानी
हो चाहे हर शय की ज़बानी
चलते चलते यूँ बेफ़िजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

कमा ले जितनी मालो दौलत
बना ले जितनी शानो शौकत
रह जायेगी सब धरी की धरी
बात समझ ले यह ख़री ख़री
गिरते पङते यूँही उसूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

ज़िंदगी तूने जैसे भी जी
बंदगी तूने कैसे भी की
हिसाब होगा हर एक चीज का
बोये गए हर एक बीज का
फलते फूलते यूँही फिजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से
इरादे हो तेरे गर आसमानी
हो चाहे हर शय की ज़बानी
चलते चलते यूँ बेफ़िजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।।

अच्छी शायरी क्या होती है (part 2)By Fehmi Badayuni


आगे बढ़ने से पहले ‘आमद’ (स्वतःस्फूर्त शायरी ) और ‘आवुर्द’ (प्रयासजन्य शायरी ) पर एक छोटी सी बहस बहुत ज़रूरी है क्यों कि अब सारा दारोमदार इन्ही पर आने वाला है। आपने अक्सर शायरों को कहते सुना होगा कि ”अब वो शेर सुनिए जिसके लिए ग़ज़ल कही” या कहना पड़ी या ”हासिल-ए-ग़ज़ल शेर समाअत करें” वग़ैरह वग़ैरह। इस शेर को आमद का शेर कहते हैं यानी अचानक आपके ज़हन में एक ख़्याल या एक मिसरा पैदा होता है और थोड़ी सी कोशिश करके आप शेर मुकम्मल कर लेते हैं। आम तौर पर ‘आमद’ का शेर अच्छा ही होता है।

इसके बरअक्स आवुर्द यानी कोशिश करके शेर ‘बनाया’ जा सकता है, लेकिन इनमें वो बात नहीं होती जो ‘आमद’ वाले शेर में होती है। कुछ पुराने उस्तादों का क़ौल है कि शेर बनाया नहीं जाता बल्कि होता है या हो जाता है। ठीक है मान लिया कि एक शेर हो गया आपने उसका क़ाफ़िया और रदीफ़ Set कर लिया। अब आप ग़ज़ल पूरी करने के लिये अलग अलग क़ाफिये चुनेंगे और शेर ‘बनाने’ में लग जाएंगे, जब कि शेर बनाया नहीं जा सकता, बल्कि हो जाता है।

तो फिर आप क्या बना रहे हैं। महज़ ग़ज़ल पूरी कर रहे हैं, ताकि आप आमद का एक शेर सुनाने के अहल हो जाएँ। दूसरी बात ये कि ‘आमद’ हर वक़्त नहीं होती, कभी कभी होती है। 5 / 7 शेर की पूरी ग़ज़ल ही आमद की हो जाये, ये ना-मुमकिन सा है।

मगर हम ग़ालिब के यहां देखें या किसी और बड़े शायर के यहाँ देखें तो ग़ज़ल के सारे शेर एक ही Quality के होते हैं और मुतअस्सिर भी करते हैं, इससे साफ़ ज़ाहिर है कि अच्छा शेर ख़ुद भी हो सकता है और ‘बनाया’ भी जा सकता है। कम से कम उसे 70 / 80% तक आमद के शेर में ढाला जा सकता है। बड़े शायरों के ऐसे ही शेर ध्यान से पढ़ कर ये तलाश किया जा सकता है कि इन्होंने क़ाफिये रदीफ़ को अच्छे शेर में बदलने के लिए क्या किया है। मैंने ये अमल नए पुराने नामचीन शायरों पर किया और कुछ नतायज हासिल किए, जो सब में Common थे, और कुछ अलग अलग थे।

एक बात और कहनी है कि ये तजज़िया हमने अपनी फ़हम के मुताबिक और अपनी सहूलत के लिए किया है। आपका या किसी का भी इससे मुत्तफ़िक़ होना ज़रूरी नहीं है। और न मेरा कोई ज़ोर है कि आप इसे ही अपनी शायरी पर Apply करें।

शायरी बिल-ख़ुसूस ग़ज़ल की शायरी इशारों कनायों और तशबीह (Simile) का फ़न है इसका अहम ज़ेवर इस्तिआरे यानी Metaphors हैं। इस्तिआरे का मानी उधार लेना है, यानी हम किसी लफ़्ज़ का मफ़हूम किसी दूसरे लफ़्ज़ से लेते हैं, तो वो इस्तिआरा कहलाता है, जैसे ‘सफ़र’ ज़िन्दगी का इस्तिआरा है, ‘दरिया’ वक़्त का इस्तिआरा है क्योंकि वक़्त की तरह आगे बढ़ता रहता है। वग़ैरह वगैरह!! जैसे हमारी आपकी Family होती है उसी तरह अल्फ़ाज़ की भी Family होती है और इसमें इज़ाफ़ा भी वक़्त के साथ होता रहता है। उर्दू शायरी के सबसे पुराने ये चन्द इस्तिआरे एक ही Family के मेम्बर हैं।

1- आशियाँ
2- बिजली
3- शजर
4- क़फ़स
5- चमन

किसी शेर की तशकील में इस में से कम से कम दो इस्तिआरे (रूपक) लेना ज़रूरी है, दो से ज़्यादा भी लिए जा सकते हैं, फिर उनके बीच कोई Link क़ायम करते हुए एक ख़्याल अख़्ज़ करना है। उस ख़्याल को दूसरे अल्फ़ाज़ की मदद से किसी बहर में बांधना है। एक मिसरा बन जायेगा। इस पर दूसरा मिसरा लगा कर शेर पूरा करना है। इस्तिआरे किसी एक मिसरे में या दोनों मिसरों में लाये जा सकते हैं। दोनों में लाएंगे तो शेर और ज़ियादा मानी-दार हो जाएगा। मफ़हूम की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं अगर आपने Link को Natural लिया है तो मफ़हूम अपने आप पैदा हो जाएगा। लेकिन ये Group बहुत Old है, हज़ारों शेर पुराने लोगों ने इन इस्तेआरों की मदद से निकाले हैं। आपका शेर किसी न किसी से टकरा ही जायेगा, लिहाज़ा इस पर कोशिश न करें, ये Example के तौर पर लिया गया है। अब एक शेर ग़ालिब का देखिए इस Group का सबसे अहम शेर यही लगा मुझे।

क़फ़स में मुझ से रूदाद ए चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यों हो

अब हम ये चाहते हैं कि इस Group से शेर कहें। क्योंकि रवायत से जुड़े रहना भी ज़रूरी है, और साथ ही ये भी चाहते हैं कि शेर ताज़ा और नया भी हो तो उसकी एक तदबीर है कि हम इस Group में इसी फ़ैमिली के कुछ नए लफ़्ज़ शामिल करें। जैसे आशियाँ के Base पर चिड़िया या परिंदा, शजर के Base पर फल, फूल,पत्थर में से कुछ। इस से ये होगा कि जो अल्फ़ाज़ आपने नए लिए हैं, उनमें आपसी Relation ज़रूर क़ायम किया जा सकता है क्योंकि Origin एक ही है। अब चिड़िया, फल, फूल, पत्थर में हमें एक Link मिल गया जिससे एक ख़्याल नमूदार हुआ कि ”अगर शजर पर पत्थर मार कर फल तोड़ा जाए तो वो चिड़िया के भी लग सकता है” मिसरा ये रहा,

”एक चिड़िया गिरी थी फल के साथ”

ये मिसरा पूरा बनाया हुआ नहीं है लगभग ‘आमद’ जैसा ही है अब ऊपर के मिसरे में पत्थर का ज़िक्र ज़रूरी है। ‘शजर’ या ‘पेड़’ का ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ‘शजर’ की Family के दो लफ़्ज़ पहले ही आ चुके हैं, जो Reader को ‘शजर’ तक पहुंचा देंगे।

अब शेर इस तरह हुआ,

मैंने पत्थर से हाथ तोड़ लिया
एक चिड़िया गिरी थी फल के साथ

यक़ीन है कि ये शेर उस्तादों के शेर से लग्गा नहीं खाता। अब एक और मिसाल देकर ये सिलसिला ख़त्म किया जाएगा।

दूसरे नम्बर पर जिस Group के इस्तिआरों का इस्तेमाल जम कर किया गया है, वो यह है,

1- हवा या आंधी
2- दिया या चराग़
3- उजाला या अंधेरा

हर शेरी मजमूए में आपको इस पर शेर मिल जाएंगे। लिहाज़ा अगर आप इसी Group से ख़्याल उठाएंगे तो रवायत के साथ किसी शेर से भी जुड़ जाएंगे। आइये फिर वही कर के देखते हैं,

हवा के Base पर पेड़ या खिड़की लिया
दिये के Base पर मिट्टी,चाक और तेल लिया
उजाले के Base पर कमरा या दीवार लिया

किसी ख़्याल की पैदाइश के लिए अब इसमें से हमें दो या तीन लफ्ज़ Consider करना है। एक तो यूँ हुआ ”कुम्हार अगर तेल में मिटटी गूंथ कर दिया बनाये तो क्या situation होगी” सोचने पर ये ख़्याल कुछ अटपटा सा लगा, लिहाज़ा Pending में डाल देते हैं। दूसरा ये हुआ कि ”जब कुम्हार चाक पर मिट्टी का दिया बना रहा हो तो उस वक़्त हवा के ज़हन में क्या चल रहा होगा” इस ख़्याल में जान नज़र आई तो शेर भी हो गया,

हवाएँ चाक के नज़दीक आन बैठी हैं
अभी बना भी नहीं है चराग़ मिट्टी का

चाक और मिट्टी की मौजूदगी में कुम्हार को मिसरे में लाने की ज़रूरत नहीं है, ये मैं इस लिए बार बार बता रहा हूँ कि एक भी फ़ालतू लफ़्ज़ शेर को बेकार कर सकता है। उम्मीद है कि आपको ये सिलसिला पसन्द आएगा लेकिन इस के इस्तेमाल के लिए बड़ी Study और माथा-पच्ची की ज़रूरत है। होनी भी चाहिए कि शायरी यूँही थोड़ी हो जाती है।

इसी तरह हर दौर की ग़ज़लिया शायरी में कोई न कोई Group हावी रहता है। 1980 से 2000 तक के दौरान हवा, चराग़ का दबदबा रहा था। जिधर देखिये हवा ही हवा, चराग़ ही चराग़ नज़र आते थे। मौजूदा वक्त में ख़ाक, बदन, वहशत का Group हावी है। ग़ज़ल की शायरी पर उस्ताद तो उस्ताद नौजवान लड़के भी इसी पर लगे हुए हैं।

दर असल ये तसव्वुफ़ के सूफ़ी शायरों ने अमूमन फ़ारसी में इस्तिआरों की शक्ल में ख़ूब इस्तेमाल किये हैं । तसव्वुफ़ का फ़लसफ़ा बड़ा Complicated है वुजूद, वहदत-उल-वुजूद,अज़ल, अदम और इसी तरह के कई भारी भरकम लफ़्ज़ इसमें भरे पड़े हैं।

इस पर लगातार अच्छी शायरी करने वाले नौजवानों मे से दो एक को छोड़ कर बाक़ी ने ये अल्फ़ाज़ सुने भी नहीं होंगे मगर Group में कोई Link बना कर शेर कह देते हैं और मफ़हूम कुछ न कुछ निकल ही आता है। अब तो इसमें ‘ख़ाक’ और ‘बदन’ की family भी बढ़ गयी है चाक, कूज़ा-गर लहू, सांस, भी शामिल हो गए हैं।

Symbolic शायरी का सबसे बड़ा फ़ायदा ही ये है कि इसमें शाइर ख़ुद मफ़हूम पैदा नहीं करता बल्कि सारे symbols मिल कर ख़ुद एक माना बनाते हैं। ब-राहे-रास्त की जाने वाली नफ़्सियाति शायरी में ज़्यादा महनत करना पड़ती है और Fiction, फ़िल्म, News वग़ैरह से तहरीक हासिल करना पड़ती है। एक बात और कि ऊपर का System मेरी ज़ाती ईजाद नहीं है। आप अमीर ख़ुसरो को पढ़ें तो उसमें एक Chapter कह-मुकरनी का है। इसमें होता ये था कि वो लोगों से कहते थे कि सब एक एक लफ़्ज़ बोलें, जब तीन-चार लफ़्ज़ जमा हो जाते तो अमीर ख़ुसरो उनका इस्तेमाल करते हुए एक शेर जैसा कुछ कहते और उसे कहमुकरनी बताते। मिसाल के लिये एक बार वो कहीं जा रहे थे कि किसी गाँव से गुज़रे तो पनघट पर औरतें पानी भर रहीं थी, उन्होंने वहाँ पानी पिया और उनसे कहा कि एक एक लफ्ज़ बोलो तो चारों औरतों ने खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल का लफ़्ज़ अदा किया, जिनमें ब-ज़ाहिर कोई Link नज़र नहीं आता, मगर ख़ुसरो ने उसी वक़्त ये मुकरनी सुनाई,

खीर पकाई जतन से चरखा दिया जला
आया कुत्ता खा गया तू बैठी ढोल बजा

तो मैंने कोई नया शगूफ़ा नहीं छोड़ा है, सिर्फ़ अमीर खुसरो की इस Technique को Modernize किया है।

अच्छी शायरी क्या होती है (part 1)By Fehmi Badayuni

अच्छी शायरी क्या होती है (part 1)
By Fehmi Badayuni

अच्छी शायरी क्या होती है इसका फ़ैसला करना बहुत मुश्किल है। बड़े बड़े दानिश-वरों और नाक़िदों ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से अच्छी शायरी की तारीफ़ की है इनसे कोई एक ऐसा नतीजा निकालना जो सबको क़ुबूल हो, नामुमकिन सी बात है। आख़िर इसकी वजह क्या है क्यों कोई उसूल इस बारे में नहीं बन सकता। वजह वही है पसन्द अपनी अपनी ख़्याल अपना अपना…

इन्सान की फ़ितरत होती है कि लाशऊरी तौर पर उसका झुकाव उन बातों की तरफ़ होता है जो उसको अच्छी लगती हैं या उसे मुतअस्सिर करती हैं। आलोचक भी चूंकि इन्सान है लिहाज़ा उसकी राय मे उसकी पसन्द ज़रूर दख़्ल-अंदाज़ होगी।

इस लिये हम अच्छी शायरी क्या है ये जानने के लिए Reverse Method अपनाएंगे, यानी पहले ये तय करेंगे कि ख़राब शायरी क्या है लेकिन उससे पहले आधुनिक और रवायती शायरी की भी थोड़ी सी बात कर लेते हैं।

जिन लोगों को किसी शेर में कोई ऐसी बात नज़र आ जाये जो उसने पहले किसी शेर मे न पढ़ी हो और वो बात उसे चौंकाए भी या मुतअस्सिर करे तो वो बरजस्ता कह देगा कि ”बड़ा जदीद शेर है” इसी तरह उसका सौ बार के सुने हुए किसी मफ़हूम का शेर उसे रवायती मालूम होगा। पता ये चला कि अक्सर आधुनिकता और रवायत का तय करना आपके मुतालिए यानी Study पर आधारित है। आपको मीर के यहाँ कोई जदीद शेर भी मिल सकता है और ज़फ़र इक़बाल के यहाँ रवायती शेर भी मिल सकता है।

अच्छी शायरी की बुनियादें
अगर हम अपने शेर मे अपने दौर/समाज का कोई ऐसा मसअला या वाक़िया बयान करते हैं जो मीर या ग़ालिब के दौर में नहीं था तो ये आधुनिक शेर हुआ। ये सोचना ही बेमानी है, ये शेर जदीद आपके लिये थोड़ी हुआ मीर और ग़ालिब के ज़माने वालों के लिये हुआ, वो इसे सुनने या पढ़ने के लिए मौजूद होते तो इसे जदीद कहते। आपके लिए तो आपके दौर का शेर हुआ। इस तरह से ये वक़्त वाला Base भी जदीद और क़दीम के संदर्भ में ज़ियादा असर-अंगेज़ नहीं है।

शायरी (यानी अदब के मेयारों पर पूरी उतरने वाली शायरी) की बुनियाद दर-अस्ल इंसान की फ़ितरी सोच, ज़रूरियात, मजबूरियों, दुख-सुख ,ख़ुशी और ग़म की नफ़्सियात, अपने ज़मीनी तजर्बे, मुशाहिदे और तजज़िये का एक निज़ाम है, जो चंद मुन्तख़ब शब्दों से तरतीब पाता है।

इंसान की फ़ितरी नफ़्सियात की बुनियाद वक़्त पर मुनहसिर नहीं है। ये कभी नहीं बदलती। मुहब्बत के मुख़्तलिफ़ शोबों जैसे ख़ुशी / ग़म हिज्र / वस्ल के अच्छे बुरे अहसास का मज़ा या दर्द आज भी वैसा ही है जैसा सदियों पहले था। वक़्त के साथ इन सब बातों के इज़हार के तरीके बदल जाते हैं बुनियादी सूरत-ए-हाल तो वही रहती है। मिसाल के तौर पर मीर के दौर की दुल्हन पालकी में बैठी हुई है, और हमारे ज़माने की दुल्हन कार में बैठी हुई है, मगर दोनों के दिलो ज़हन में उस वक़्त जो चल रहा है वो कम-ओ-बेश एक जैसा ही है।

रवायती और जदीद शायरी का फ़र्क़
‘अब अगर मैं पालकी में बैठी दुल्हन को अपने शेर का किरदार बनाऊँ तो मैं रवायती हूँ, कार या हवाई जहाज़ में बैठी दुल्हन की मन्ज़र-कशी करूँ तो जदीद हूँ’ अस्ल में ऐसा नहीं है। जब कि हक़ीक़त ये है कि मैं शायर ही नहीं हूँ, मुझे शायर होने के लिए पालकी या कार का ज़िक्र नहीं बल्कि उस का ज़िक्र करना चाहिये जो एक नई दुल्हन के जहन-ओ-दिल में चलता है, या चल रहा है। जो कि मीर के ज़माने में भी ऐसा ही था जैसा कि अब है, लिहाज़ा अस्ल शायरी (यानी दाख़िली शायरी) में जदीद और क़दीम की कोई तफ़रीक़ मुनासिब नहीं। हाँ!! ज़िन्दगी की कुछ क़दरें और रस्म-ओ-रिवाज बदलते रहते हैं अगर वो पहले से अच्छे हो गए हैं तो शायर उसका ज़िक्र नहीं करते। जैसे पहले लड़कियाँ सरकारी नौकरी नहीं करती थीं, शादी के बाद घरेलू काम-काज में ही ज़िन्दगी बसर हो जाती थी । ये एक Positive Change है, इसका ज़िक्र नहीं होगा या बराये नाम होगा। लड़की के कमाने की वजह से उसके घर मे जो मसाइल पैदा होते हैं, जैसे शौहर से तअल्लुक़ात में कशीदगी वग़ैरा, इस पर ख़ूब शायरी होगी और इसे जदीद भी कहा जायेगा। लेकिन ये आफ़ाक़ी Universal नहीं है, दुनिया की तीन अरब औरतों मे कितनी नौकरी करती हैं और कितनों के यहाँ इसकी वजह से फ़ैमिली टेंशन है Universal सिर्फ़ एक Subject है, मुहब्बत इश्क़ और बाक़ी सारी चीज़ें यानी हमारा हंसना, रोना, जीना, मरना, इबादत करना, खाना और खिलाना बच्चों को पालना, बीमार का इलाज करना, मुरदे को दफ़्न करना या जलाना सब मुहब्बत से ही जुड़े हुए Emotions हैं।

क्राफ़्ट की अहमियत
इस से पहले हम रवायती शायरी और जदीद शायरी के फ़र्क़ पर बात कर चुके हैं। इस गुफ़्तुगू में ये बात भी शामिल है कि शायरी में तर्ज़-ए-इज़हार यानी Crafting का रोल बहुत अहम है। शेर कहते वक़्त पहला Step बहर / वज़्न रदीफ़ क़ाफ़िया और दूसरे अरूज़ी लवाज़मात हैं। इन्हें आप किसी अरूज़-दाँ से सीख सकते हैं, किसी किताब से सीख सकते हैं, ये सिर्फ़ साँचा या Packing Material है। इसमें क्या भरना है, कैसा माल भरना है, ये आप के शेरी ज़ौक़, Study, और लगन पर मुनहसिर करेगा। मुख़्तसर ये कि उस्ताद आपको अरूज़ी (बहर के) नियम-क़ायदे सिखा सकता है, मगर शायरी नहीं सिखा सकता। यही सबब है कामयाब अरूज़-दाँ अक्सर कामयाब शायर नहीं होते। उनकी सारी सलाहियत Packing को ख़ूबसूरत और फिट रखने में ख़र्च हो जाती है। अंदर का माल यूँही सा होता है।

आइये अब शेर-गोई की तरफ़ आते हैं!!

आप दो तरह से शेर कह सकते हैं।
1- बराहे रास्त
2- इस्तिआरे और अलामतों के इस्तेमाल के ज़रिए

हमारे लिए ज़रूरी है कि सतही शायरी से बचने की कोशिश करें , जो बराह-ए-रास्त भी होती है और इस्तिआराती (रूपक) भी। यहाँ एक बात और clear करना ज़रूरी है कि मैं सतही शायरी की मिसालें शेर की शक्ल में नहीं दे सकता, फिर ये गुफ़्तगू तवील भी हो जाएगी और किसी की दिल आज़ारी का सबब भी हो सकती है।

बराहे रास्त (सतही) शायरी
हमारे यहाँ अदब में कुछ अक़वाल-ए-ज़र्रीँ मौजूद हैं जो सदियों से चले आ रहे हैं, जिन पर पुराने उस्तादों ने ला-तादाद शेर कह रखे हैं जो लोगों को रट गए हैं, इनका इस्तेमाल आपके शेर को सतही कर सकता है,

1- सच की हमेशा जीत होती है
2- मौत सब को आनी है
3- सब से बड़ा मज़हब इंसानियत है
4- वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
5- मुहब्बत अंधी होती है
6- आईना कभी झूट नहीं बोलता

ऐसे ही और बहुत से जुमले हैं, अगर आप इनका बराह-ए-रास्त इस्तेमाल करेंगे तो कोई बा-ज़ौक़ और सुख़न फ़हम Reader मुतअस्सिर नहीं होगा। आपका शेर सच्चा होते हुए भी सतही हो जाएगा।

हाँ ! अगर इनका इस्तेमाल अगर आप किसी मन्ज़र या वाक़िए की मदद से करेंगे तो आपका शेर अच्छा हो जाएगा।

इस क़ौल की एक शायराना मिसाल ये है कि ”मज़लूम की मदद अल्लाह करता है” ये शेर देखिये,

शिकारी ने तो इक इक तीर बे-आवाज़ फेंका था
परिंदे पेड़ पर बैठे हुए किसने उड़ा डाले

“तुझे सब पता है”

मांगू मैं क्या, तुझे सब पता है
चाहूं मैं क्या, सब तेरी अता है
कहूं मैं क्या, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं क्या, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।

दिल के हाल, सब जानता है तू
मुझको मुझ में, पहचानता है तू
लिखू मैं क्या, तुझे सब पता है
बोलू मैं क्या, सब तेरी अता है
कहूं मैं क्या, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं कहाँ, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।

हर शय पर कादिर है तू
हर जगह यूँ ज़ाहिर है तू
रोऊँ मैं कितना, तुझे सब पता है
बोऊँ मैं कितना, सब तेरी अता है
कहूं मैं इतना, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं कौन, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।।