दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक
उसकी इक मुस्कान साथ है अब तक

उसने तो पलभर में दूूरियों का दामन थाम लिया
दूर होकर भी मेरे वो पास है अब तक

उसका चेहरा किसी की याद दिलाता है मुझे
वो चेहरा मेरे लिए ख़ास है अब तक

क़िस्मत ने मिलवाया, ज़रूरत उसे बनाया
उसका मिलना एक राज़ है अब तक

सागर भी सारा पी लिया, नदियां भी समेट ली
फिर भी लबों पे इक प्यास है अब तक

जिस रोज़ उसे देखा था, देखता ही रह गया
उसकी आँखों का नूर याद है अब तक

कई बरस हो गए हैं, मनाते हुए रोते हुए
न जाने क्यों ज़िंदगी नाराज़ है अब तक।