सोचते-सोचते

कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है मनवा सोचते-सोचते
के कहीं कोई नज़र नहीं आता हैं रस्ता देखते-देखते

अब और क्या तोड़ोगे हमारे दिल को सनम
पत्थर हो चुका है दिल भी तो ये सज़ा सहते-सहते

दर्द की वो इंतहा आकर गुज़र भी गयी
आंसू भी हंसने लगे हैं अब तो यहाँ बहते-बहते

कुछ तो तक़्दीर के तिलिस्म,
और कुछ ख़ाहिश-ए-जिस्म
क्या से क्या बन जाता है इंसान यहाँ देखते-देखते

ग़ैरों से शिकवा भला, करना ही क्या इरफ़ान यहाँ
एक उम्र गुज़र जाती हैं यहाँ अपना पता पूछते-पूछते।

6 thoughts on “सोचते-सोचते

  1. आप हमेशा मोहब्बत पर क्यो लिखते हो?मतलब थोड़ी सी santy शायरी but ..Osm 👌होती है क्या ऐसा रियल हुआ है आपके साथ।

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