“दहशतगर्दो के नाम मेरा ये पैग़ाम”

यूँ तो नाम से मैं भी एक ख़ान हूँ,
दीन-ओ-मज़हब से मुसलमान हूँ

कुरआन-ओ-हदीस की रौशनी में,
अल्लाह रसूल पर रखता ईमान हूँ

हलाल-हराम में फर्क़ समझकर,
इस्लाम को मानने वाला इंसान हूँ

नबी के तरीके ज़िन्दगी में लाकर,
नेकी की राहों पर गतिमान हूँ

मुल्क़ में अम्न-ओ-चैन के लिए,
इंसानियत की ख़ातिर क़ुर्बान हूँ

जो भी हूँ मैं जैसा भी हूँ इरफ़ान
नहीं मगर तुम्हारी तरह हैवान हूँ

© RockShayar Irfan Ali Khan

जय हिंद

सुन बे नापाक पड़ोसी तुझे हम अब और मौका नहीं देंगे
खत्म हुई मोहलत तेरी अब तो बस घर में घुसकर मारेंगे

सालों से तू हमारे सब्र को कमज़ोरी समझता रहा
खुल्लमखुल्ला हमेशा चोरी करके सीनाजोरी करता रहा

अपने हालात के लिए तू खुद जिम्मेदार है
दहशत का गढ़ तू पूरे इस्लाम का गद्दार है

ना तो तुझे मासूम बच्चों की चीखें सुनाई देती हैं
ना ही अपनी आवाम की बदहाली दिखाई देती हैं

सत्तर सालों से एक पागल कुत्ते की तरह भौंक रहा है
साड्डी जनता को भुखमरी व दहशतगर्दी में झोंक रहा है

नित नये राग बदलकर जंग की गीदड़ भभकी देता है
हर बार हाथ मिलाने के बहाने पीठ में छुरा भोकता है

कुत्ते की पूँछ न तो कभी सीधी हुई न ही कभी होगी
अब तो बस तेरी हालत कुछ इसी तरह पतली होगी

सुन बे नामुराद पड़ोसी अब तुझे हम और मौका नहीं देंगे
सब्र हमारा खल्लास हुआ अब तो यूँही घर में घुसकर मारेंगे

#RockShayar

सोचते-सोचते

कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है मनवा सोचते-सोचते
के कहीं कोई नज़र नहीं आता हैं रस्ता देखते-देखते

अब और क्या तोड़ोगे हमारे दिल को सनम
पत्थर हो चुका है दिल भी तो ये सज़ा सहते-सहते

दर्द की वो इंतहा आकर गुज़र भी गयी
आंसू भी हंसने लगे हैं अब तो यहाँ बहते-बहते

कुछ तो तक़्दीर के तिलिस्म,
और कुछ ख़ाहिश-ए-जिस्म
क्या से क्या बन जाता है इंसान यहाँ देखते-देखते

ग़ैरों से शिकवा भला, करना ही क्या इरफ़ान यहाँ
एक उम्र गुज़र जाती हैं यहाँ अपना पता पूछते-पूछते।

आईने से बातें

आईने से आख़िर क्या बातें करते हो
बताओ कभी
तुम दोनों के बीच हुई वो अनकही बातें
जो न बता सको तो जताओ कभी
तुम दोनों के दरमियां वो अधूरी मुलाक़ातें
जो न जता सको तो सुनाओ कभी
तुम दोनों के भीतर दबी वो अनसुनी आहें
जो न सुना सको तो दिखाओ कभी
तुम दोनों की आँखों में ठहरी वो गीली यादें

आईने से आख़िर क्या बातें करते हो
बताओ कभी
यूं देर तलक आलम-ए-तन्हाई में
आईने के भीतर किसे निहारते रहते हो
अनगिनत अक्स के बीच
आख़िर किसे तलाशते रहते हो
बताओ कभी
चलो अब बता भी दो

Raj Mandir Cinema Jaipur

लोग यहाँ सिर्फ फ़िल्म देखने नहीं आते हैं

वो यहाँ आते हैं

ज़िन्दगी को पर्दे पर साकार होते देखने

Salute to Real Heroes

बेशक़ीमती है ये किसी मुआवज़े की मोहताज नहीं
बयान कर सकू मैं शान ऐसे तो कोई अल्फ़ाज़ नहीं

इसकी क़ीमत लगाने की ज़ुर्रत न कर बैठना सियासतदारों
ये शहादत है तुम्हारा कोई सियासी तख़्त-ओ-ताज नहीं

Zindagi ka yeh offer hai limited

ज़िन्दगी का ये ऑफर है लिमिटेड
समटाइम शाइनी समटाइम ग्रे शेड

ऐवरीडे खुलते जाये जित्ते न्यू पिटारे
खुली आईज से देखो उत्ते व्यू नज़ारे

सरप्राइज है जित्ते साइज भी उत्ते
एज पर किस्मत है प्राइज भी उत्ते

जाॅय दी राइड विद ग़मग़ीन टाइड
फुल ऑन फील रखो टेंशन साइड

अप एन डाउन डे नाइट लाइफ डेथ
बुलशिट है सब रखो गर खुद पे फ़ेथ

साॅ ऑवरआल फंडा है बस यही
प्रजेंट में जियो है अर्जेंट बस यही

ज़िन्दगी का ये ऑफर है लिमिटेड
समटाइम शाइनी समटाइम ग्रे शेड ।।

#RockShayar

#Pray4MyPaPa

After successful completion of the Whole Brain Radio Therapy, now the Chemotherapy will be started on 11th February 2K19@BMCHRC, Jaipur under the supervision of renowned Medical Oncologist Dr. Naresh Somani.

It is the 3rd clinical process followed by the Surgical and Radiation Oncology. It is also known as Medical Oncology.

PAPA you must have to defeat CANCER again and again at every single stage.

अल्लाह आपको शिफ़ा-ए-क़ामिला अता करे…आमीन…Aameen

“ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है”

कभी गिरती है कभी संभलती है
ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है

बाहें खोले बेबाक बहती है
न जाने कौनसी गली में रहती है
पता मिल जाये तो बताना मुझे
इसे कैसे जीते है सिखाना मुझे

कभी हँसती है कभी रोती है
ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है

तरह-तरह के दौर दिखाती है
न जाने किसकी याद दिलाती है
याद करके जिसे आँखें भर आती हैं
अश्क़ों में उसी की बातें नज़र आती हैं

कभी गिरती है कभी संभलती है
ये ज़िंदगी तो बस यूँही चलती है।

@RockShayar.com

“वतन-वतन”

साल में दो दिन वतन-वतन करने वालों
तुमको साड्डे वतन दा प्यार भरा सलाम

ज़रा ग़ौर से सुनना तुम देशप्रेमी लोग आज
वतन ने ख़ास तुम्हारे लिए भेजा है ये पैग़ाम

सुबह-सुबह जो तिरंगे वाली तीव्र लहर शुरू होती है
दोपहर आते-आते तो वो पूरी तरह दम तोड़ देती है

देशभक्ति वाले धांसू गीत गाकर और चंद लटके-झटके दिखाकर
बताओ तो तुम ये वतनपरस्ती का कौनसा नमूना पेश कर रहे हो?

ये जो मज़हब के नाम पर तुम लोग एक दूसरे को मार डालते हो
सच कहूं तो तुम मुझे नित नये कभी नहीं भरने वाले घाव देते हो

साल में दो दिन वतन-वतन करने वालों
तुमको साड्डे वतन दा है बस इत्ता ही कहणा

चाहे कुछ भी हो जाए
पर अपने अंदर इंसानियत को मरने ना देणा

चाहे कुछ भी हो जाए
पर अपने अंदर थोड़ी इंसानियत बचा के रखणा

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए जश्न मनाओ तुम
फिर चाहे मेरी शान में ख़ूब जोशीले नग़मे सुनाओ तुम

अगर मेरी कोई बात बुरी लगी तो बहुत अच्छी बात है
आख़िर वतन हूँ मैं तुम सबका नाम मेरा हिंदोस्तान है।

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