लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सफेदपोश उड़ा रहे इक दूजे का मखौल है
लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सियासती इस दौर में बहुत कुछ बदलने वाला है
आज है जो गली का गुंडा कल वो वज़ीर बनने वाला है

पंचवर्षीय ये योजना फिर से दोहराई जाएगी
बेचारे कर्मचारियों की इलेक्शन ड्यूटी लगाई जाएगी

ऐसी ड्यूटी से तो हर कर्मचारी को मुक्ति चाहिए
और जनता को तो बस भ्रष्टाचारी से मुक्ति चाहिए

ऐसे में मतदान के रूप में उम्मीद की नई किरण नज़र आती है
मगर नई सरकार बनते ही खुद अपने भरण-पोषण में जुट जाती है

हालांकि इलेक्शन कमीशन लगातार अपनी रेप्यूटेशन बनाए हुए है
मुद्दत से इस महान डेमोक्रेसी का डेकोरम मेंटेन किए हुए है

मगर अफसोस के पॉलिटिक्स को कुछ नेताओं ने गंदा किया
सत्ता को सट्टा समझकर उसे अपना पुश्तैनी धंधा बना लिया

पहले बैलट होता था अब ईवीएम का जमाना है
हर पार्टी का मूलमंत्र यही के बस पब्लिक को रिझाना है

अब देखना ये है कि जनता किसे चुनती है
शायद जो कमचोर है जनता उसे चुनती है

अपना अच्छा-बुरा जनता को खुद समझना चाहिए
इस बार तो ईवीम पर केवल नोटा ही दबना चाहिए

हो सकता है ये पंचवर्षीय फुटबॉल मैच यही खत्म हो जाएं
और शासन चलाने का कोई नया फॉर्मूला हाथ लग जाएं।

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