वो जब डूबने लगते है

वो जब डूबने लगते है मदद के लिए हमेशा हमको ही पुकारते है
और अगले ही पल बदले में एक बड़ा सा खंजर पीठ में उतारते है

न जाने कैसा दस्तूर है ये उनका जो अब तक समझ नहीं आया
के वक़्त रहते तो क़द्र करते नहीं और बाद में वक़्त-वक़्त पुकारते है

उसने हमदर्द बनके हर बार हज़ारों दर्द दिए

उसने हमदर्द बनके हर बार हज़ारों दर्द दिए
पुराने हो चले थे सो फिर से नए ज़ख़्म दिए

वो जानता था के मैं चुका नहीं पाउंगा कभी
उसने फिर भी मुझ को कर्ज़ पे कर्ज़ दिए

शिकवा भी क्या करे किसी और से हम यहां
जब ख़ुद अपने ही हकीम ने हम को मर्ज़ दिए

हम मरीज़-ए-इश्क़ दिलबर-दिलबर करते रहे
और दिलबर ने दिल खोलकर ख़ूब दर्द दिए

दर्द सहते-सहते जब मौत लाज़िम हो गई
तब जाकर ज़िंदगी ने आँखों में कुछ अश्क़ दिए।

डायरी बोल उठी

काफी देर तक जब मैं अपनी डायरी में कुछ भी नहीं लिख पाया
तब मेरी वो डायरी खुद ही बोल उठी
आखिर किस ख़याल में डूबे हुए हो शायर
जिसने तुम्हें इतना परेशान कर रखा है
कि आज तुमसे एक अल्फ़ाज़ तक नहीं लिखा जा रहा है

अरे तुम तो वो हो जो कुछ ही देर में मेरा पूरा पन्ना भर दिया करते थे
तो फिर आज ऐसा क्या हो गया
जो तुम चाहकर भी मुझ पर कुछ नहीं लिख पा रहे हो

क्या तुम्हें याद हैं वो सारी नज़्में
जो तुमने लिखी थी किसी दौर में मुझमें
पाकर जिन्हें मैं अपने पन्नों पर
खुद को खुशनसीब समझने लग गई थी

तुम भले ही खुद को भूल गए हो आज
मगर मुझे याद है अब भी वो चेहरा तुम्हारा
जिस पर नज़्म लिखते वक़्त एक अलग ही शिद्दत नज़र आती थी
भले ही वो कुछ देर को आती थी, मगर अपना काम कर जाती थी
और फिर मैं उस नज़्म को कई दिनों तक
अपने दामन में समेटकर खुशियां मनाती थी

सुनो ना शायर, चाहे कोई समझे या न समझे
पर मैं तुम्हारे जज़्बात बख़ूबी समझती हूँ
तो ज्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है
मैंने तुम्हारे वो सब अनलिखे अल्फ़ाज़
आज भी ठीक उसी तरह समझ लिए हैं
जैसे पहले समझ जाया करती थी
मुझे यक़ीन है कि तुम मुझे फिर से खुशनसीब ज़रूर बनाओगे
तब तक के लिए तुम बस मुझे अपने सिरहाने रखकर सो जाओ
और मेरे साथ मेरी दुनिया में चले आओ
सुनो मेरे साथ मेरी दुनिया में चले आओ…

पता कोई पूछे तो कहना वक़्त के सताये हैं

कुछ राज़ हमने सिर्फ ख़ुद को ही बताये हैं
पता कोई पूछे तो कहना वक़्त के सताये हैं

तक़दीर का तिलिस्म भी देखो कितना अजीब है
वो आज खुद चलकर हमारे दर पे आये हैं

हमने भी कोई कसर नहीं छोड़ी ख़ातिर में
आख़िर में लफ़्ज़ शातिर के मानी उन्हीं ने तो सिखाये हैं

वो अब रोज़ माफ़ी मांगते है, खुद से भी और मुझसे भी
ज़िन्दगी ने भी क्या-क्या मंज़र दिखलाये हैं

हमने तो उन्हें कब का माफ़ कर दिया
ये तो वक़्त की लौटकर आने वाली सदाये हैं

उस दौर को जब याद करते है तब यही याद आता है
के कुछ रिश्ते हमने बेवज़ह ही निभाये हैं

बड़ी मुश्किल से इस टूटे दिल को सहेज पाये हैं
पता कोई पूछे तो कहना वक़्त के सताये हैं…

@RockShayar.com

दिल ने जब आदाब कहा तेरी यादों से

नींद गायब हो गई मेरी इन आँखों से
दिल ने जब आदाब कहा तेरी यादों से

बहुत दिन हो गए तेरा ख़्वाब नहीं आया
मुझको सुकून मिलता है तेरे ख़्वाबों से

तूने मुड़कर देखना भी गंवारा न समझा
मुझको शिकायत है तेरे उन वादों से

चलो इतना तो बता दो मुझे तुम
क्या मिटा पाई हो अपनी यादों से

जवाब देना न देना तुम्हारी मर्ज़ी है
मेरा तो सवाल है सिर्फ तेरी आँखों से।

सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं

सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं
चोर को हराके डाकू को जिताते हैं
सत्ता की कुर्सी पांच साल की लीज पर दे देते हैं
हालांकि पहले ही साल अपनी गलती मान लेते हैं
द्रुतगति से सिस्टम को कोसना शुरु कर देते हैं
और अगले चुनाव में फिर किसी मौसेरे को चुन लेते हैं
पब्लिक हैं भई आखिर पूरा लोकतंत्र चलाते हैं
सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं…

हमने कई सूरमाओं को धूल चटाई हैं
हमने कई नेताओं को नानी याद दिलाई हैं
मगर अब तक हमारी समझ में ये बात ना आई हैं
के इन नेताओं को चुनाव के वक़्त ही हमारी याद क्यों आई हैं

सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं
चोर को हराके डाकू को जिताते हैं
प्रदेश का फ्यूचर पांच साल के अनुबंध पर दे देते हैं
हालांकि पहले ही साल अपनी गलती मान लेते हैं
द्रुतगति से दूसरा विकल्प खोजना शुरु कर देते हैं
और अगले इलेक्शन में फिर किसी मौसेरे को चुन लेते हैं
सुना है कि हम ही नई सरकार बनाते हैं
चोर को हराके डाकू को जिताते हैं।

“Suno Ae Taj” (सुनो ऐ ताज)

देखिए एक शायर की ताजमहल से की गई अब तक की सबसे अनोखी और तल्ख़ गुफ़्तगू जिसने आखिर में खुद मुमताज की रूह को क़ब्र में छटपटाने और शायर में समाने पर मज़बूर कर दिया…

Emotional Love Poetry by RockShayar Irfan Ali Khan at Nojoto Open Mic Agra which was held on 30th September, 2018. Watch Heart Touching Hindi Poetry. 

पश्मीना वो यादें तेरी

दर्द के सर्द मौसम में जब ज़िंदगी बग़ावत करती है
पश्मीना वो यादें तेरी मेरी रूह की हिफ़ाज़त करती है।

तू तो न जाने वादी के किस हिस्से में रहती है
ये ज़िंदगी तो अब तेरी तलाश से मोहब्बत करती है।

मिलेगी जो किसी मोड़ पर तो पूछूंगा ऐ ज़िंदगी
तू क्यूँ हर बात पर इतनी शिकायत करती है।

बहुत पसंद था न तुझे मेरे मोहब्बत करने का अंदाज़ वो
और मुझे ये बात के तू उस अंदाज़ से मोहब्बत करती है।

इत्तेफ़ाक़न ही सही पर इक मुलाक़ात तो हो कभी
बस इसीलिए तो आँखें तेरे ख़्वाब की हसरत करती है।

मालूम नहीं था मुझे दस्तूर तेरे फ़िरदौस का
के हूर जहां केवल फ़रिश्तों से मोहब्बत करती है।।

लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सफेदपोश उड़ा रहे इक दूजे का मखौल है
लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सियासती इस दौर में बहुत कुछ बदलने वाला है
आज है जो गली का गुंडा कल वो वज़ीर बनने वाला है

पंचवर्षीय ये योजना फिर से दोहराई जाएगी
बेचारे कर्मचारियों की इलेक्शन ड्यूटी लगाई जाएगी

ऐसी ड्यूटी से तो हर कर्मचारी को मुक्ति चाहिए
और जनता को तो बस भ्रष्टाचारी से मुक्ति चाहिए

ऐसे में मतदान के रूप में उम्मीद की नई किरण नज़र आती है
मगर नई सरकार बनते ही खुद अपने भरण-पोषण में जुट जाती है

हालांकि इलेक्शन कमीशन लगातार अपनी रेप्यूटेशन बनाए हुए है
मुद्दत से इस महान डेमोक्रेसी का डेकोरम मेंटेन किए हुए है

मगर अफसोस के पॉलिटिक्स को कुछ नेताओं ने गंदा किया
सत्ता को सट्टा समझकर उसे अपना पुश्तैनी धंधा बना लिया

पहले बैलट होता था अब ईवीएम का जमाना है
हर पार्टी का मूलमंत्र यही के बस पब्लिक को रिझाना है

अब देखना ये है कि जनता किसे चुनती है
शायद जो कमचोर है जनता उसे चुनती है

अपना अच्छा-बुरा जनता को खुद समझना चाहिए
इस बार तो ईवीम पर केवल नोटा ही दबना चाहिए

हो सकता है ये पंचवर्षीय फुटबॉल मैच यही खत्म हो जाएं
और शासन चलाने का कोई नया फॉर्मूला हाथ लग जाएं।

परिन्दा

कोई तो अंदर है जो बाहर आने को छटपटा रहा है
शायद कोई परिन्दा है जो उड़ने को फड़फड़ा रहा है

पर कट चुके हैं सभी, पर सोच के पर बाक़ी हैं अभी
सोचकर यही वो परिन्दा गिरकर भी मुस्कुरा रहा है

एक दिन तो छूना ही है उसे, ये सारा नीला आसमां
फिलहाल तो वो ज़मीं पे अपने क़दम आज़्मा रहा है

क़ैद किया था जिसने उसे, अँधेरे इक कमरे में कभी
सुना है इन दिनों खुद को वो उसी कमरे में पा रहा है

किसी हादसे ने नहीं, उसे उसके घर ने बेघर किया 
तभी वो परिन्दा साँझ ढले अब अपने घर नहीं जा रहा है…

#RockShayar