“Elasticity/लोच/प्रत्यास्थता”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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इस दुनिया में हर चीज़ बलपूर्वक बदलाव का विरोध करती हैं
लेकिन बहुत कम चीज़ें ऐसी होती हैं, जो बल हटते ही पहले जैसी होती हैं

पदार्थ का यही गुण तो Elasticity है
रबर को देखकर हमें कला ये सीखनी है

मगर Elasticity की भी अपनी एक Limit होती है
क्योंकि हर किसी में इतनी सहनशक्ति नहीं होती है

एक यंगमैन ने सबसे पहले इस बात का पता लगाया
Stress और Strain का Ratio Young Modulus कहलाया

Unit Area पर लगाएं गए Force को ही Stress कहते है
जो कि आजकल हम लोग बहुत ज्यादा ही लेते हैं

वही लंबाई में बदलाव को Strain कहते है
और हिंदी में बोले तो इसे विकृति कहते है

जो कि आजकल हम इंसानों की सोच में आई हुई हैं
देखकर जिसे खुद हैवानियत भी घबराई हुई है

हुक बाबू की माने तो Stress व Strain एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं
Elasticity Constant है अनुपात तथा मात्रक को पास्कल कहते है

हालात कैसे भी हो, अगर हम Elastic बन जाएं
तो बबुआ साड्डी लाइफ भी Very Very Fantastic हो जाएं

वादा है जी, अगला Topic More Than लाजवाब होगा
मलाई की तरह लगेगी पढ़ाई, और मज़ा भी बेहिसाब होगा।

“चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं”

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Woman writing in her diary at sunset

चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं
रह रहकर बाद में बहुत याद आते हैं

साथ चलती है सदा परछाई वक़्त की
बीच-बीच में धूप के साये मुस्कुराते हैं

बिना जिनके हर खुशी अधूरी हैं, साथ जिनका कि बेहद ज़रूरी हैं
अँधेरे में यार सितारों से जगमगाते हैं

ना कोई फ़िकर रहती है, ना कोई परेशानी वहां
ज़ुनून के पौधे जिस जगह लहलहाते हैं

खुशबू आती हैं, हरवक़्त अपने अंदर से 
रूहानियत के फूल सारा आलम महकाते हैं

चाहे जितनी हवा भरो, चाहे जितनी दवा करो
मन के ये गुब्बारे फटाक से फूट जाते हैं

मज़बूरी में साथ निभाते हैं, मज़दूरी में कुछ नहीं पाते हैं
दूर जाने के बाद दोस्त बहुत याद आते हैं।

“आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं”

आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं
शायद! वो और कहीं आबाद होना चाहते हैं।

हमें तो उनकी हरइक साँस, है अब तक याद
और वो है के बीती हुई बात होना चाहते हैं।

बहुत वक़्त गुज़रा, फिर भी ज़ख्म नहीं भरे
लगता है अधूरा इक एहसास होना चाहते हैं।

तरबतर कर दे जो, रूह और रूहदार दोनों को
बंजर के लिए हम वो बरसात होना चाहते हैं।

रोते हुए इस बार भी, आंसू नहीं छलके उसके
किसी और की अब वो फ़र्याद होना चाहते हैं।

वो गलती से भी हमें, याद नहीं करते कभी
हम है के उनके लिए बर्बाद होना चाहते हैं।।

“इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है”

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होश गंवाने को तैयार हुए बैठे है
खानाबदोश मन का शिकार हुए बैठे है

चादर चढ़ाने ही सही, पर आओ कभी
इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है

ये हुनर सीखना इतना आसां नहीं हुज़ूर
बिन बादल देखो मल्हार हुए बैठे है

एक आप ही हो, जो क़रार के तलबगार हो
वरना हम तो कब से यूं बेक़रार हुए बैठे है

वज़ह थी इसकी भी, वज़ह बहुत बड़ी
बेवज़ह तो नहीं हम ख़ुद्दार हुए बैठे है

तुमने शायद ग़ौर नहीं किया इस बारे में कभी
मुद्दत से मेरे यार इंतज़ार हुए बैठे है।

हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

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हमने अपने वज़ूद को कुछ यूं बचा रक्खा है
जैसे बरसती हुई बारिश में चराग़ जला रक्खा है

गज़ब हो जाएगा, जिस दिन अश्क़ों का सागर सूख जाएगा
बस इसीलिए तो सीने में एक दरिया दबा रक्खा है

पथराई आँखों को पढ़ने की गुस्ताख़ी ना कर बैठना
हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

कई सिलसिले बाक़ी हैं, अभी कई जलजले बाक़ी हैं
तभी तो हज़ार रातोंं से हमने नींद को जगा रक्खा है

तुमने अभी हमारी मेहमाननवाज़ी देखी ही कहां है?
आओ कभी हवेली पे हमने मौत को दावत पे बुला रक्खा है।