तेरे गुलाबी गालों सा लगता है मेरा शहर

Dedicate to Delicious Kashmiri Cuisine…

तेरे शहर की नून चाय सा दिखता है मेरा शहर
सुन तेरे गुलाबी गालों सा लगता है मेरा शहर

मिलने आओ न कभी तुम पहाड़ों से मैदान में
वादियों के जहान से मेरे दिल के रेगिस्तान में

दिल ने बनाया जिसे मोहब्बत के उस मक़ान में
शिद्दत से सजाया जिसे उस दावत-ए-वाज़वान में

शुरूआत में तुमको लज़ीज़ तबाक माज परोसूंगा
साथ में जिसके बीते लम्हों की बाकरखानी होगी

और फिर मैं तुमको इश्क़ का वो क़हवा पेश करूंगा
तन्हाई में जिसे मैंने चाँद के नूर से तैयार किया था

हालांकि यादों का यख़नी पुलाव भी बनकर कब से तैयार है
मगर ग़मों की गुश्ताबा करी एक अर्से से ज़ेहन पर सवार है

यक़ीनन कुछ जज़्बात अब भी सहमे हुए और ख़ामोेश हैं
पर कोई बात नहीं अभी हमारे पास रूहानी रोग़न जोश है

तो बताओ फिर कब आ रही हो मेरे शहर
अब तो मेरी नून चाय भी खत्म हो गई है

अब तो इस इंतज़ार को और इंतज़ार न बनाओ
अब तो बस आ ही जाओ सुनो तुम आ ही जाओ

वरना मैं तो फिर आ ही रहा हूँ इस बार तेरे उन पहाड़ों पे यार
देख ही लूंगा इस बार आख़िर ऐसा क्या है उन पहाड़ों के पार।

नून चाय – कश्मीरी चाय जो गुलाबी रंग की होती है
वाज़वान – कश्मीरी व्यंजनों में एक बहु-पाठ्यक्रम भोजन है
लज़ीज़ – स्वादिष्ट
तबाक माज – तले हुए मटन चॉप्स
बाकरखानी – एक मोटी मसालेदार रोटी
क़हवा – कश्मीरी कॉफ़ी
यख़नी – कश्मीरी पुलाव का एक अन्य रूप
गुश्ताबा करी – पारंपरिक कश्मीरी करी
रोग़न जोश – कश्मीरी मटन डिश

मुझको आजकल कहीं भी सुकून नहीं मिलता

मुझको आजकल कहीं भी सुकून नहीं मिलता
लिखना तो चाहूँ लेकिन मज़्मून नहीं मिलता।

अभी कुछ और तड़पना होगा, कुछ और बरस
इतनी जल्दी तो किसी को जुनून नहीं मिलता।

गर जुड़ाव हो तो ज़मीन-ओ-आसमां के जैसा
दरमियाँ जिनके कहीं कोई सुतून नहीं मिलता।

आधी उम्र गुज़र गई, तब जाकर ये पता चला
के मेरे अपनों से मेरा ज़रा भी ख़ून नहीं मिलता।

तोड़ने पर मिले सज़ा, दिल जोड़ने पर मिले जज़ा
इस जहां में ऐसा तो कोई क़ानून नहीं मिलता।।

@RockShayar.com

मज़्मून – विषय, Subject
सुतून – खंभा, Pillar
जज़ा – अच्छे काम का बदला, Reward

“उसकी कहानी उसका हर इक अश्क़ कहता है”

कोई कमबख़्त कहता है कोई बदबख़्त कहता है
फ़क़त इक यार ही तो मुझ को दरख़्त कहता है।

उसने देखा है मुझ को शजर से पत्थर होते हुए
वो मेरे दर्द को छूकर उसे फिर नज़्म कहता है।

क़ैद हैं क़िस्से कई उसकी पथराई आँखों में
उसकी कहानी उसका हर इक अश्क़ कहता है।

छुपाएं थे मैंने कभी ज़ख़्म किसी जमाने में
ज़माना जिसे के गुज़रा हुआ वक़्त कहता है।

बिन बताएं वो बिन जताएं दर्द से राहत दिलाएं
इसीलिए तो हर शख़्स उसे हमदर्द कहता है।

फ़र्क़ नहीं पड़ता मुझे अब ज़माने के किसी ताने का
ज़माना तो हर ख़ुद्दार को ख़ुदग़र्ज़ कहता है।।

कमबख़्त/बदबख़्त – अभागा/Unfortunate

फ़क़त – केवल/Only

दरख़्त – पेड़/Tree

शजर – एक पेड़/ a tree

नज़्म – उर्दू में कविता का एक रूप/Poetry

अश्क़ – आँसू/Tears

ख़ुद्दार – स्वाभिमानी/self-respecting

ख़ुदग़र्ज़ – स्वार्थी/Selfish

“माशा अल्लाह ! आपने क्या ख़ूब इंसाफ़ किया”

बे-क़ुसूर को सज़ा सुनाई, गुनहगार को माफ़ किया
माशा अल्लाह ! आपने क्या ख़ूब इंसाफ़ किया।

मुंसिफ़ भी आपका, वकील भी आपका
हमने तो मानो अदालत आके ही गुनाह किया।

मिजाजपुर्सी को आने लगे हैं लोग आजकल
ग़मों ने हमको कुछ इस क़दर बीमार किया।

मुनाज़िर नहीं है वो, जो हर बात पर जीत जाएं
वो जीता इसलिए, क्योंकि उसने पीठ पर वार किया।

घबरा रहा है दिल ये, पिछले कुछ दिनों से बहुत
लगता है इसने फिर किसी पर ऐतबार किया।।

मुंसिफ़ – न्यायाधीश, Judge
मुनाज़िर – शास्त्रार्थ करने में दक्ष, तर्क-वितर्क में माहिर
मिजाजपुर्सी – बीमार का हालचाल पूछना
ऐतबार – भरोसा, विश्वास

“मोहब्बत करना किसी की मज़बूरी नहीं होती”

ये कैसी तलाश है जो कभी पूरी नहीं होती
हरचीज़ को पाने की ज़िद ज़रूरी नहीं होती

बहुत कुछ सिखा देती है ज़िन्दगी
मोहब्बत करना किसी की मज़बूरी नहीं होती

भले ही दूर आसमानों में रहता है वो
गर दिल से मांगों दुआएं कैसे पूरी नहीं होती

कुछ तो कमी रही होगी दर्द के एहसास में
वरना ये कहानी अब तक अधूरी नहीं होती

उसने मुड़के देखना भी ज़रूरी ना समझा
जो देख पाती तो दरमियां आज ये दूरी नहीं होती।

“क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद तुम तुम ना रहोगी”

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मेरे अंदा़ज़ को अपना अंदाज़ बना लोगी
नज़रें मिलते ही अपना सब कुछ गंवा दोगी

एक ही मुलाक़ात काफ़ी है इस तज़ु्र्बे के लिए
क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद तुम तुम ना रहोगी

“लंबे सफ़र में धीरे चलो वरना थक जाओगे”

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हमें पिघलाने की ज़िद में खुद जल जाओगे
जलके हमारी तरह तुम भी राख बन जाओगे

यही सवाल हरबार क़दमों को रोक देता है
बिना तैयारी के बताओ तुम कहां तक जाओगे

जिस रोज़ ज़िंदगी से समझौता किया तुमने
खुद को भुलाके शख़्स कोई और बन जाओगे

बचपन की उस कहानी ने यही सबक सिखाया
लंबे सफ़र में धीरे चलो वरना थक जाओगे

किस बात का गुरूर है, जब बात ही इतनी है
के इस मिट्टी से बने हो इसी में मिल जाओगे

सुनो ऐ नादान परिंदों, हर उड़ान की यही दास्तान
लौटकर तुम शाम को अपने ही घर जाओगे।

“मेरी मौत का पुख़्ता कोई सुबूत नहीं है”

क़िस्सा ये मेरा अभी मशहूर नहीं है
दिल ये पहले सा मज़बूर नहीं है
 
इतनी भी क्या जल्दी है क़ाज़ी साहब आपको
नशे में हूँ, निकाह अभी क़ुबूल नहीं है
 
जांच ज़ारी है, मगर क्या फायदा
मेरी मौत का पुख़्ता कोई सुबूत नहीं है
 
चेहरे पे इतने चेहरे लगाए और हटाए
के चेहरे पे अब वो पहले सा नूर नहीं है
 
हररोज़ मुझसे यही कहती हैं कोशिशें मेरी
के मंज़िल तेरी तुझसे अब दूर नहीं है
 
दिल के नाम पे दग़ा देना बहुत बुरी बात है
बस एक यही बात दिल को मंज़ूर नहीं है।

“Radio Jockey/आरजे/रेडियो जॉकी”

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चाँदनी रातों में अक्सर इक मख़मली आवाज़ गूँजती है
हाँ वही दिलकश आवाज़, जो सितारों तक जा पहुँचती है
 
अपनी अलहदा आवाज़ के ज़रिए, वो जो अल्फ़ाज़ में एहसास भरते हैं
नज़र ना आने वाले ऐसे Hidden Heroes को ही हम आरजे कहते हैं
 
मुख़्तसर में अक्सर बहुत कुछ कह जाते हैं
ना होके भी ये सारा दिन हमारे साथ होते हैं
 
वैसे देखा जाएं तो रेडियो जॉकी पब्लिकली नज़र नहीं आते हैं
मगर फिर भी ये रोज़ाना हमारी ज़िंदगी में मिश्री घोल जाते हैं
 
इनके Good Morning Shows किसी का सारा दिन शानदार बना देते हैं
तो इनके Late Night Shows किसी का टूटा हुआ दिल दोबारा जोड़ देते हैं
खुद को अलग-अलग अंदाज़ में पेश करते हैं
ये ज़िंदगी को ज़ाफ़रानी आवाज़ में पेश करते हैं
 
सुनकर जिसे हम हम नहीं रहते हैं
साथ इनके इक नदी बनके बहते हैं
 
पर्दे के पीछे रहने वाले ऐसे नायाब फ़नकारों के लिए, Standing Ovation तो बनता हैं
बेशक दिल जीत लेने वाले ऐसे On AIR क़िरदारों के लिए, Appreciation तो बनता हैं
 
इन छुपे रुस्तमों को मेरा सलाम, इन छुपे रुस्तमों पर मेरा क़लाम
कभी न कभी तो होगा, इन छुपे रुस्तमों की दुनिया में अपना भी नाम।

#RockShayar

#RadioJockey #आरजे #रेडियोजॉकी

“ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है”

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अपनी ही आहट पे चौंक जाता है
ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है?
 
जो होना है वो तो होकर रहेगा
तू क्यों बार-बार खुद को आज़्माता है?
 
ऐसी भी क्या ज़िद है तेरी, क्या नादानी?
जो शीशे का सर लिए तू पत्थर से टकराता है
 
चंद जज़्बातों की खातिर शहीद हो जाता है
किसी से दूर तो किसी के क़रीब हो जाता है
 
पलभर में चाहे जिसे अपना बना लेता है
बाद में मगर सदियों तक भुला नहीं पाता है
 
धड़कन के ज़रिए तू सबको अपने दिल की बात सुनाता है
दिल जो ठहरा आखिर, मोहब्बत में अपना आप गंवाता है
 
कुछ लोग तुझ पर संगदिल होने का इल्ज़ाम लगाते हैं
तो कुछ लोग तेरे रहमदिल होने का एहसास कराते हैं
 
जुड़ने से पहले ही टूटने के डर से घबराता है
ऐ दिल, तू क्यों हरबार खुद से ही हार जाता है?

“थोड़ा पाने के लिए बहुत तड़पना ज़रूरी है”

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जाने से पहले आखिरी बार मिलना ज़रूरी है
जाते-जाते उसका पलटकर देखना ज़रूरी है

वादा करने वाले, एक वादा तू खुद से ये कर
वादा करने से ज्यादा वादा निभाना ज़रूरी है

जब सारे आंसू खत्म हो गए तो पता ये चला
के थोड़ा पाने के लिए बहुत तड़पना ज़रूरी है

कीमत चुकानी पड़ती है हरएक चीज़ की यहां
मरहूम होने के लिए आपका मरना ज़रूरी है

ये दिल जब टूटा तब बस यही सदा सुनाई दी
के ग़ैरों के बजाय इस दिल पे यक़ीं करना ज़रूरी है

गर्दिश में हो गर सितारे, बस इतना याद रख प्यारे
सुबह की खातिर सूरज का ढलना ज़रूरी है।

“Elasticity/लोच/प्रत्यास्थता”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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इस दुनिया में हर चीज़ बलपूर्वक बदलाव का विरोध करती हैं
लेकिन बहुत कम चीज़ें ऐसी होती हैं, जो बल हटते ही पहले जैसी होती हैं

पदार्थ का यही गुण तो Elasticity है
रबर को देखकर हमें कला ये सीखनी है

मगर Elasticity की भी अपनी एक Limit होती है
क्योंकि हर किसी में इतनी सहनशक्ति नहीं होती है

एक यंगमैन ने सबसे पहले इस बात का पता लगाया
Stress और Strain का Ratio Young Modulus कहलाया

Unit Area पर लगाएं गए Force को ही Stress कहते है
जो कि आजकल हम लोग बहुत ज्यादा ही लेते हैं

वही लंबाई में बदलाव को Strain कहते है
और हिंदी में बोले तो इसे विकृति कहते है

जो कि आजकल हम इंसानों की सोच में आई हुई हैं
देखकर जिसे खुद हैवानियत भी घबराई हुई है

हुक बाबू की माने तो Stress व Strain एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं
Elasticity Constant है अनुपात तथा मात्रक को पास्कल कहते है

हालात कैसे भी हो, अगर हम Elastic बन जाएं
तो बबुआ साड्डी लाइफ भी Very Very Fantastic हो जाएं

वादा है जी, अगला Topic More Than लाजवाब होगा
मलाई की तरह लगेगी पढ़ाई, और मज़ा भी बेहिसाब होगा।

“चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं”

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Woman writing in her diary at sunset

चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं
रह रहकर बाद में बहुत याद आते हैं

साथ चलती है सदा परछाई वक़्त की
बीच-बीच में धूप के साये मुस्कुराते हैं

बिना जिनके हर खुशी अधूरी हैं, साथ जिनका कि बेहद ज़रूरी हैं
अँधेरे में यार सितारों से जगमगाते हैं

ना कोई फ़िकर रहती है, ना कोई परेशानी वहां
ज़ुनून के पौधे जिस जगह लहलहाते हैं

खुशबू आती हैं, हरवक़्त अपने अंदर से 
रूहानियत के फूल सारा आलम महकाते हैं

चाहे जितनी हवा भरो, चाहे जितनी दवा करो
मन के ये गुब्बारे फटाक से फूट जाते हैं

मज़बूरी में साथ निभाते हैं, मज़दूरी में कुछ नहीं पाते हैं
दूर जाने के बाद दोस्त बहुत याद आते हैं।

“आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं”

आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं
शायद! वो और कहीं आबाद होना चाहते हैं।

हमें तो उनकी हरइक साँस, है अब तक याद
और वो है के बीती हुई बात होना चाहते हैं।

बहुत वक़्त गुज़रा, फिर भी ज़ख्म नहीं भरे
लगता है अधूरा इक एहसास होना चाहते हैं।

तरबतर कर दे जो, रूह और रूहदार दोनों को
बंजर के लिए हम वो बरसात होना चाहते हैं।

रोते हुए इस बार भी, आंसू नहीं छलके उसके
किसी और की अब वो फ़र्याद होना चाहते हैं।

वो गलती से भी हमें, याद नहीं करते कभी
हम है के उनके लिए बर्बाद होना चाहते हैं।।

“इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है”

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होश गंवाने को तैयार हुए बैठे है
खानाबदोश मन का शिकार हुए बैठे है

चादर चढ़ाने ही सही, पर आओ कभी
इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है

ये हुनर सीखना इतना आसां नहीं हुज़ूर
बिन बादल देखो मल्हार हुए बैठे है

एक आप ही हो, जो क़रार के तलबगार हो
वरना हम तो कब से यूं बेक़रार हुए बैठे है

वज़ह थी इसकी भी, वज़ह बहुत बड़ी
बेवज़ह तो नहीं हम ख़ुद्दार हुए बैठे है

तुमने शायद ग़ौर नहीं किया इस बारे में कभी
मुद्दत से मेरे यार इंतज़ार हुए बैठे है।

हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

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हमने अपने वज़ूद को कुछ यूं बचा रक्खा है
जैसे बरसती हुई बारिश में चराग़ जला रक्खा है

गज़ब हो जाएगा, जिस दिन अश्क़ों का सागर सूख जाएगा
बस इसीलिए तो सीने में एक दरिया दबा रक्खा है

पथराई आँखों को पढ़ने की गुस्ताख़ी ना कर बैठना
हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

कई सिलसिले बाक़ी हैं, अभी कई जलजले बाक़ी हैं
तभी तो हज़ार रातोंं से हमने नींद को जगा रक्खा है

तुमने अभी हमारी मेहमाननवाज़ी देखी ही कहां है?
आओ कभी हवेली पे हमने मौत को दावत पे बुला रक्खा है।