मैं लिखते वक़्त तड़पा था, तुम पढ़ते वक़्त तड़पना

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मेरी शायरी को समझने की कोशिश ना करना
ये एक समंदर है, इसमें अंदर तक उतरना

और ज्यादा कुछ नहीं बस इतना याद रखना
मैं लिखते वक़्त तड़पा था, तुम पढ़ते वक़्त तड़पना

“मैं अपने दिल को खुला आसमान समझता हूँ”

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बेज़ुबान परिंदों की ज़ुबान समझता हूँ
मैं अपने दिल को खुला आसमान समझता हूँ

जिस राह पर चलने से कतराते हैं सब
मैं उस राह को अपने लिए आसान समझता हूँ

“इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है”

होश गंवाने को यूं बेक़रार हुए बैठे हैं
खानाबदोश मन का शिकार हुए बैठे है

चादर चढ़ाने ही सही, पर आओ कभी
इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है

ये हुनर सीखना इतना आसान नहीं
बिन बादल देखो मल्हार हुए बैठे है

एक आप ही हो, जो क़रार के तलबगार हो
हम तो कब से यूं बेक़रार हुए बैठे है

वज़ह रही थी, इसकी भी बहुत बड़ी वज़ह
बेवज़ह तो नहीं हम ख़ुद्दार हुए बैठे है

तुमने शायद ग़ौर नहीं किया इस बारे में कभी
मुद्दत से मेरे यार इंतज़ार हुए बैठे है