“एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा”

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ज़ेहन की जिस वादी में तेरा ख़याल पनपता है
सुना है आजकल वहां रोज़ाना कर्फ्यू लगता है
 
महज कुछ पत्थरबाज सवालों ने ये बखेड़ा खड़ा किया हैं
वरना आम ख़याल तो अब भी तेरे तसव्वुर के तलबगार हैं
 
ऐसे माहौल में अक्सर दिल के अरमान कुचले जाते हैं
मोहब्बत वाले मुल्क़ के ख़िलाफ़ ख़ूब नारे लगाए जाते हैं
 
मगर महबूब मेरे, हमें मिलना हैं चिनार के उन बगीचों में
दिमाग़ी फौज से बचके, दीदार करना हैं चुपके से दरीचों से
 
हमें बैठना हैं दिल की डल झील में, सजे हुए उन शिकारों में
हमें जाना हैं दहशत से दूर, हाँ बर्फ़ से लदे हुए उन पहाड़ों पे
 
मन की सुनसान गलियों में, भले ही सख्त पहरा हो
संग चलना हैं हमें, चाहे हर तरफ धुंध और कोहरा हो
 
खेलना हैं हमें बर्फ़ से, गुलमर्ग की उस घाटी में
फेंकने हैं गोले बर्फ़ के, तसव्वुर की तंगहाली पे
 
इंतज़ार है मुझे ऐतबार भी, इस कर्फ्यू के हट जाने का
एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा।

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