कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है

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कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है
अपने दिल की ना सुनना, अपने ही आगे झुकने जैसा लगता है
 
अपनी बेहतरी केे लिए बेहतर को छोड़ देना इतना आसान नहीं
हर बार बार-बार हज़ार बार डर के आगे दम तोड़ देती है ज़िंदगी
 
एक दोस्त ने लिखा था कभी, के ना चलना तो मौत की निशानी है
मगर बेवज़ह मुसलसल चलते रहना भी तो वक़्त की मनमानी है
 
मन करता है मेरा भी कभी, किसी शज़र के साये में थोड़ा सुस्ता लूं
अपनी सारी बेचैनियों को पलकों के गीले पर्दों के पीछे कहीं छुपा दूं
 
मगर फिर डर लगता है कि कहीं यह ठहराव मुझे चलना ना भुला दे
जमकर जगने से पहले कहीं यह छाव मुझे गहरी नींद में ना सुला दे
 
पहले भी अपने लिए कई जुनूनी फैसले ले चुका हूँ
उन्हीं फैसलों के दम पर आज बाहें फैलाएं खड़ा हूँ
 
अपनी ज्यादा गलतियां करने की आदत से परेशान नहीं हूँ
दिल खोलकर दिलवाली मनमर्ज़ियां करने से हैरान नहीं हूँ
 
देखते है इस बार किस अजनबी राह को हमराह बनाती है ज़िंदगी
देखते है इस बार किस तरह से क्या-क्या गुर सिखाती है ज़िंदगी
 
कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना अच्छा नहीं
अपने दिल की ना सुनना, हाँ रत्ती भर भी सच्चा नहीं…

4 thoughts on “कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है

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