“एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा”

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ज़ेहन की जिस वादी में तेरा ख़याल पनपता है
सुना है आजकल वहां रोज़ाना कर्फ्यू लगता है
 
महज कुछ पत्थरबाज सवालों ने ये बखेड़ा खड़ा किया हैं
वरना आम ख़याल तो अब भी तेरे तसव्वुर के तलबगार हैं
 
ऐसे माहौल में अक्सर दिल के अरमान कुचले जाते हैं
मोहब्बत वाले मुल्क़ के ख़िलाफ़ ख़ूब नारे लगाए जाते हैं
 
मगर महबूब मेरे, हमें मिलना हैं चिनार के उन बगीचों में
दिमाग़ी फौज से बचके, दीदार करना हैं चुपके से दरीचों से
 
हमें बैठना हैं दिल की डल झील में, सजे हुए उन शिकारों में
हमें जाना हैं दहशत से दूर, हाँ बर्फ़ से लदे हुए उन पहाड़ों पे
 
मन की सुनसान गलियों में, भले ही सख्त पहरा हो
संग चलना हैं हमें, चाहे हर तरफ धुंध और कोहरा हो
 
खेलना हैं हमें बर्फ़ से, गुलमर्ग की उस घाटी में
फेंकने हैं गोले बर्फ़ के, तसव्वुर की तंगहाली पे
 
इंतज़ार है मुझे ऐतबार भी, इस कर्फ्यू के हट जाने का
एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा।

“दिल की बात, हाँ सबके साथ”

 

है ये गए शनिवार की बात
जमके जिस रोज़ हुई बरसात
की नए दोस्तों से मुलाक़ात
कुछ हसीं बात हुई उस रात
ज़िन्दा हुए फिर से जज़्बात
हुई नए सफ़र की शुरुआत
"हस्ताक्षर" की ये है सौगात
दिल की बात, हाँ सबके साथ
दिल की बात, हाँ सबके साथ

क्या खूब रही वो हसीन शाम
था जिसका बड़ा ही प्यारा नाम
दिया सबने बस यही पैग़ाम
दिल जीतना अब अपना काम

Open Mind से Open Mic का 1st Chapter शुरू हुआ 
हर एक Performer ने जहां Audience के दिल को छुआ

किसी ने Music से Romantic माहौल बनाया
तो किसी ने Stand-up Comedy करके खूब हंसाया

किसी ने Flute और Guitar की जुगलबंदी की
तो किसी ने पंजाबी गानों की Parody बड़ी चंगी की

किसी ने हँसी-ठहाकों की फुलझड़ियां जलाई
तो किसी ने शायरी की रंगीन महफ़िल सजाई

किसी ने बड़े ही Feel के साथ प्यारवाली Poetry सुनाई
तो किसी ने अपनी Practical Life कविताओं में दिखाई

किसी ने सुर लगाके अपने हमसफ़र को आवाज़ लगाई
तो किसी ने अपने हमसफ़र के लिए गीतों की झड़ी लगाई

किसी ने वाह-वाह किया तो किसी ने ताली बजाई
आखिर में फिर मिलने के वादे पर हुई रस्म-ए-विदाई

है ये गए शनिवार की बात
जमके जिस रोज़ हुई बरसात
की नए दोस्तों से मुलाक़ात
कुछ हसीं बात हुई उस रात
ज़िन्दा हुए फिर से जज़्बात
हुई नए सफ़र की शुरुआत
"हस्ताक्षर" की ये है सौगात
दिल की बात, हाँ सबके साथ
दिल की बात, हाँ सबके साथ।

			

उसने पलटकर देखना भी मुनासिब ना समझा

उसने पलटकर देखना भी मुनासिब ना समझा
अपनी ज़िंदगी में हमें कभी शामिल ना समझा

कैसे चलते भला ज़िंदगी की अजनबी राहों पर
जब ज़िंदगी ने ही हमको मुसाफ़िर ना समझा

“मेरी कहानी को कहानी समझके भूल जाना”

मेरी कहानी को कहानी समझके भूल जाना
मज़ाक या फिर कोई नादानी समझके भूल जाना

नहीं चाहता कोई और मुझ जैसा बन जाएं यहां
मेरे अश्क़ों को तुम पानी समझके भूल जाना

पल में आती है, पल-पल भिगा जाती है
बारिश को तुम बेगानी समझके भूल जाना

साथ गुज़रे जो पल, वो पल बड़े हसीन थे
वक़्त की उन्हें मेहरबानी समझके भूल जाना

हो सकता है तुम्हें बुरा लगे, और गुस्सा भी आएं
बीते लम्हों को बेमानी समझके भूल जाना

आहें जितनी भी लिखी हैं, काग़ज़ के पन्नों पर
याद न रखना उन्हें कहानी समझके भूल जाना।

“बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज”

 

बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज
ज़मीन और ज़िंदगी दोनों तर हो गई

बिजली के तार पे बारिश की बूंदें जिस तरह से चलती हैं
कुछ उसी तरह ये ज़िंदगी, ज़िंदगीभर अठखेली करती है

काग़ज़ की कश्ती इन दिनों कोई नहीं बनाता
सब अपनी हस्ती बनाने में जो मसरूफ़ हैं

पानी के छपाके भी इन दिनों सहमे से रहते हैं
बुरा ना मान जाएं दीवारें, ये दीवारों से डरते हैं

कीचड़ की वज़ह से इसे मिलती है रुस्वाई
है अंदर इसके, नील समंदर सी गहराई

बादल से ज्यादा बारिश को कौन जानता है
दोनों की जुदाई में सारा आसमान रोता है

सिर्फ पानी ही नहीं, यादें भी बरसाते हैं बादल
एक अर्से तक इन आँखों को तरसाते हैं बादल

बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज
तिश्नगी और तन्हाई दोनों फुर्र हो गए।

आकाशवाणी (All India Radio)

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ये आकाशवाणी का खुद का अपना स्टेशन है
अब आप अमीन सयानी साहेब से इसकी कहानी सुनिए
 
नमस्ते बहनों और भाईयों, बड़े ही कम शब्दों में आपको बताना चाहता हूँ
के हर दौर का सबसे लोकप्रिय गीत है ये, जो मैं आपको सुनाना चाहता हूँ
 
जैसे किसी प्यासे के लिए बेहद ज़रूरी है पानी
वैसे ही मनोरंजन का मतलब है आकाशवाणी
 
श्रोताओं का शुद्ध देसी साथी है विविध भारती
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भाषा इसे भाती
 
अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह शानदार सफ़र
बंबई और कलकत्ता में लगाए गएं दो ट्रांसमीटर
 
1930 में आखिरकार हुआ जो इसका Nationalization
कहलाई ये सेवा फिर Indian Broadcasting Corporation
 
आज़ादी के दस साल बाद खूब मशहूर हुआ रेडियो
जब नाम मिला इसे आकाशवाणी All India Radio
 
1957 में जब विविध भारती का आग़ाज़ हुआ
फिल्मी गीतों के साथ विज्ञापनों का प्रसारण स्टार्ट हुआ
 
नाच मयूरा नाच, विविध भारती पर प्रसारित पहला गीत था ये
बोल थे पं. नरेंद्र शर्मा के, संगीत अनिल विश्वास का, गायक थे मन्ना डे
 
आवाज़ से दिलों पर राज करते हैं RJ
लबों से लफ़्ज़ों में एहसास भरते हैं RJ
 
अमीन सयानी साहेब की वो दिलकश आवाज़
श्रोताओं को अब तक याद है उनका जादुई अंदाज़
 
बिनाका गीतमाला के वो गीत, आज भी गुनगुनाये जाते हैं
उजालों उनकी यादों के सदैव संगीत सरिता बहाते हैं
 
फौजी भाईयों के लिए जयमाला एक सौगात है
सरहद पे तैनात सिपाही के जुड़े इससे जज़्बात हैं
 
हवामहल प्रोग्राम के जरिए, नाटक व झलकियां पेश की जाती हैं
महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा सखी सहेली पेश की जाती है
 
कई काबिले तारीफ़ कार्यक्रमों का अद्भुत अजायबघर है पिटारा
यूथ एक्सप्रेस में बैठे,
हैलो फरमाईश करते,
सेल्युलाइड के सितारों का सफ़र है पिटारा
 
एआईआर से जुड़े हैं मन के तार
एंटरटेनमेंट का है ये एवरग्रीन स्टार
 
साल 2007 में इसकी गोल्डन जुबली मनाई गई
फिफ्टी पूरी होने पर ऑन एयर खुशी मनाई गई
 
Gold और Rainbow हैं इसके FM Station
Music से करते ये Mind का Meditation
 
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है इसका कर्ता-धर्ता
सौ बार सुन लो फिर भी इससे मन नहीं भरता
 
KHz वाली ख़्वाहिशें, MHz वाला माहौल बनाती हैं
दिल की Waves पे ज़िंदगी, न्यूज नग़्मे सुनाती हैं
 
बदलते जमाने के साथ-साथ बदल रहा है रेडियो
Internet, Smartphone, के साथ ही अब DTH पर है रेडियो
 
Digital Quality के साथ अब Satellite का भी साथ है
मीडिया मुगल को चाहे जितने, प्रसार भारती की अलग ही बात है
 
रेडियो मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, और भी बहुत कुछ है
सृजन के संगीत का मनमीत, ये कला का कवच है
 
आकाशवाणी का जयपुर केंद्र सबसे निराला है
MI Road पर स्थित ये उम्मीदों का उजाला है
 
चाहे मन की बात कहनी हो, या अपना मनपसंद गाना सुनना हो
All India Radio है न, फिर चाहे कोई भी पुराना गाना सुनना हो
 
Digital इस दौर में आकाशवाणी का कोई तोड़ नहीं
ये वो खिलाड़ी है, जिसकी किसी से कोई होड़ नहीं
 
तो दोस्तों ये थी आकाशवाणी की All Time Hit दास्तान
रेडियो पर गूंज रहा है वक़्त का BlockBuster बयान
 
जमाना भले ही बदल गया, पर नहीं बदला इसका अंदाज़
ज़िंदा है ज़िंदा रहेगा, आकाशवाणी का वो उम्दा एहसास।

वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

बंजर में बारिश के फ़साने ढूंढते हैं
वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

दुःखी होते हैं जब लोग अक्सर
नए जमाने में यार पुराने ढूंढते हैं

लापता हो जाता है पता जिनका
ज़िंदगीभर वो बीते जमाने ढूंढते हैं

ख़याल तो बंजारे हैं, बेबाक चले आते हैं
बंजारे भला कब यूं ठिकाने ढूंढते हैं

खो जाते हैं जो किसी दौर के दौरान
खुद को वो लिखने के बहाने ढूंढते हैं

गर इसे तरक्की कहते है तो नहीं चाहिए ऐसी तरक्की
नीची सोच वाले ऊंचे घराने ढूंढते हैं।

बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

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चीख-चीखकर मेरी ख़ामोशियां कह रही हैं मुझसे
बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

अंदर ही अंदर ये कैसा बवंडर उठ रहा है
भीतर-भीतर दिल दा समंदर जल रहा है

क्यों मिटा रहा है तू अपनी हस्ती को
क्यों जला रहा है तू अपनी बस्ती को

चीख-चीखकर सभी सरगोशियां कह रही हैं मुझसे
बता तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

ना बताता है ना जताता है, बस खुद को खुद में छुपाता है
जितना हंसाता है उतना रुलाता है, खुद को क्यों सताता है

बस बहुत हुआ, खत्म कर अब इस सिलसिले को
बढ़ भी जा अब आगे तू, ना याद रख पिछले को

चीख-चीखकर मेरी ख़ामोशियां कह रही हैं मुझसे
बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से।

“नाहरगढ़ किला जयपुर” (Nahargarh Fort Jaipur)

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जो भी जयपुर आता है, वो यहां ज़रूर जाता है
दोस्तों ये नायाब किला, नाहरगढ़ कहलाता है

यहां से मीठी यादें जुड़ी हैं, दिल की दिलकश बातें जुड़ी हैं
यहां आके हर ज़िन्दगी, आज़ाद खुले आसमान में उड़ी हैं

नाहरगढ़ जाने वाले सभी रास्तें एडवेंचर से भरे हैं
मोड़ पे मोड़ ऊपर से संकरी रोड़, ये डेंजर से भरे हैं

सवाई जयसिंह ने इसे सन् 1734 में था बनवाया
सुदर्शन मंदिर की वजह से ये सुदर्शनगढ़ कहलाया

कहते है कि बरसों पहले, यहां एक बाबा का वास था
पहुंची हुई हस्ती, नाहरसिंह भोमिया उनका नाम था

ज्योंही मजदूर दिन में थोड़ा किला बनाते
रात को बाबा आकर उसे ध्वस्त कर जाते

आखिरकार एक सिद्ध तांत्रिक ने उन्हें मना लिया
किसी दूसरी जगह पर स्थापित उन्हें करवा दिया

बस तब से ही ये किला नाहरगढ़ कहलाने लगा
सैलानियों का दिल, दिल खोलके बहलाने लगा

सवाई माधोसिंह ने यहां एक जैसे 9 महल बनवाएँ
अपनी 9 प्रेमिकाओं के नाम पे उनके नाम रखवाएँ

ये सारे महल आपस में एक ही सुरंग से जुड़े हुए हैं
मौसम के मुताबिक यहां, हवा-रौशनी बिखरे हुए हैं

सूरज, खुशहाल, जवाहर, ललित, ये हैं पहले 4 महल
आनंद, लक्ष्मी, चांद, बसंत, फूल, बाक़ी के 5 महल

सारे महलों का सरनेम प्रकाश हैं
नाहरगढ़ से नजदीक ही आकाश है

अय्याश महाराजा जगतसिंह की माशूका को यहीं क़ैद रखा गया था
आलीशान अतिथिगृह में कनीज़ रसकपूर को नज़रबंद किया गया था

पानी बचाने के लिए जो एक बावड़ी बनाई गई थी
छोरे-छोरियां सब आजकल वहीं पर लेते हैं सेल्फी

आमिर ख़ान की फिल्म रंग दे बसंती ने इसे वर्ल्ड फेमस कर दिया
बाद उसके तो हर प्राणी ने यहीं आके अपडेट अपना स्टेटस किया

इस बार दिवाली की रात, जनाब आप नाहरगढ़ ज़रूर जाएं
और अपने पिंकसिटी को, सितारों सा जगमगाता हुआ पाएं

जो भी जयपुर आता है, वो यहां ज़रूर जाता है
ऐत्थे जाते ही दोस्तों, साड्डा दिन बन जाता है।

कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है

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कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है
अपने दिल की ना सुनना, अपने ही आगे झुकने जैसा लगता है
 
अपनी बेहतरी केे लिए बेहतर को छोड़ देना इतना आसान नहीं
हर बार बार-बार हज़ार बार डर के आगे दम तोड़ देती है ज़िंदगी
 
एक दोस्त ने लिखा था कभी, के ना चलना तो मौत की निशानी है
मगर बेवज़ह मुसलसल चलते रहना भी तो वक़्त की मनमानी है
 
मन करता है मेरा भी कभी, किसी शज़र के साये में थोड़ा सुस्ता लूं
अपनी सारी बेचैनियों को पलकों के गीले पर्दों के पीछे कहीं छुपा दूं
 
मगर फिर डर लगता है कि कहीं यह ठहराव मुझे चलना ना भुला दे
जमकर जगने से पहले कहीं यह छाव मुझे गहरी नींद में ना सुला दे
 
पहले भी अपने लिए कई जुनूनी फैसले ले चुका हूँ
उन्हीं फैसलों के दम पर आज बाहें फैलाएं खड़ा हूँ
 
अपनी ज्यादा गलतियां करने की आदत से परेशान नहीं हूँ
दिल खोलकर दिलवाली मनमर्ज़ियां करने से हैरान नहीं हूँ
 
देखते है इस बार किस अजनबी राह को हमराह बनाती है ज़िंदगी
देखते है इस बार किस तरह से क्या-क्या गुर सिखाती है ज़िंदगी
 
कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना अच्छा नहीं
अपने दिल की ना सुनना, हाँ रत्ती भर भी सच्चा नहीं…