नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर

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नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर
पर बाक़ी है उसके कुछ निशान मेरे अंदर
 
रफ़्ता रफ़्ता जो राहत मिली थी, ज्यादा देर न रुक पाई
आबाद हर गली है वो सुनसान मेरे अंदर
 
एक ज़लज़ले ने सब कुछ तबाह किया, फ़ना किया
नज़र आते हैं उजड़े वो मक़ान मेरे अंदर
 
बहुत कुछ कर सकता हूँ, बिना कुछ किए ही
बाक़ी है अब भी इतनी तो जान मेरे अंदर
 
पलकों के घर में, सपनों के टुकड़े चुभने लगेेे हैं
बिखर चुका है ख़्वाबों का जहान मेरे अंदर
 
परछाई बोलती है जिसकी, बिना अल्फ़ाज़ के आवाज़ के
रहता है कहीं साया एक बेज़ुबान मेरे अंदर
 
बहुत बुलाने पर थोड़ा आता है, शायद वो शख़्स शर्माता है
ऐसा लगता है जैसे है वो मेहमान मेरे अंदर
 
इक रोज़ घर में बहुत कुछ हुआ, हर तरफ बस धुआं ही धुआं
बाद उसके नहीं दिखा वो इरफ़ान मेरे अंदर।

2 thoughts on “नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर

  1. पलकों के घर में, सपनों के टुकड़े चुभने लगेेे हैं

    बिखर चुका है ख़्वाबों का जहान मेरे अंदर

    बेहतरीन बहुत बहुत अच्छी

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