थोड़ा पाया है बहुत खोया है

थोड़ा पाया है बहुत खोया है
ये कैसा बीज ज़िंदगी ने बोया है

लबों तक आते-आते हर बार, दम तोड़ देते हैं जज़्बात
क्यूं वो अब तक नहीं रोया है

ना ख़्वाब आते हैं, ना सुकून मिलता हैं
जाने कैसी गहरी नींद में सोया है

सब्र भी अब तो जवाब देने लगा है
दिल ने इतना बोझ ढ़ोया है

मन का मोती खो चुका है कहीं
जाने किस धागे में पिरोया है

दिल ने क्या हसीं सितम किया है
थोड़ा हंसा है बहुत रोया है

कभी रौशन होके तो दिखा

इससे पहले कि ज़िंदगी का बल्ब फ्यूज हो जाएं
इससे पहले कि तू किसी दोराहे पे कंफ्यूज हो जाएं
 
एलईडी की तरह एक बार फुल टू जगमगाके तो दिखा
है तेरे भीतर कितनी ऊर्जा, कभी रौशन होके तो दिखा
 
इस तरह ज़ीरो वाट की रौशनी में जीने का क्या मतलब है
बिल की चिंता में तिल-तिल मरना बेवकूफी भरा करतब है
 
तेरे भीतर का वो रूहानी टंगस्टन तू कब जलाएगा
कब तू खुद जलके औरों को रौशन जहां दिखाएगा
 
बिजली की टेंशन है मगर ज़िंदगी की नहीं
बिल की टेंशन है मगर अपने दिल की नहीं
 
वहम तो विद्युत विभाग की तरह गलत रीडिंग ही देगा
मीटर सदैव चालू रखेगा ये बत्ती रोज़ाना गुल ही करेगा
 
इससे पहले कि ज़िंदगी की ट्यूबलाइट फ्यूज हो जाएं
इससे पहले कि तू किसी के हाथों मिसयूज हो जाएं
 
सूरज की तरह एक बार खुद को चमकाके तो दिखा
है तेरे भीतर अभी बहुत आग, जमके शोले तो बरसा
 
इस तरह ज़ीरो वाट वाली ज़िंदगी जीने का कोई मतलब नहीं
एसी की टेंशन में अपनी ऐसी तैसी कराने का कोई मतलब नहीं…

Aravali Range (अरावली पर्वतश्रृंखला)

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दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वतमाला है अरावली
प्री क्रैम्बियन काल के पहाड़ों की महागाथा है अरावली

भूगोल के अनुसार यह प्राचीन गोंडवाना लैंड का हिस्सा है
राजपूताना से लेकर दिल्ली तक मशहूर इसका किस्सा है

थार के रेतीले टीलों को आगे बढ़ने से सिर्फ यही रोकती है
मगर मानसून के पैरेलल है, सो बादलों को नहीं रोकती है

राजस्थान के 17 जिलों में इसका व्यापक विस्तार है
कुदरत का करिश्मा यह सदियों पुराना कोहसार है

राजस्थानी भाषा में इसे आडावाळा डूंगर कहते हैं
इसकी सबसे ऊंची चोटी को गुरू शिखर कहते हैं

झीलों की नगरी से इसका गहरा लगाव है
अजमेर जिले में सबसे कम फैलाव है

समंदर के तल से औसत ऊंचाई है 930 मीटर
अरावली की कुल लंबाई है 692 किलोमीटर

उत्तर, मध्य और दक्षिण, बेसिकली तीन हिस्सों में बंटी हुई हैं
गुजरात के पालनपुर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक फैली हुई है

पांच प्रमुख दर्रे इसके नाल कहलाते हैं
मेवाड़ के पठार ऊपरमाल कहलाते हैं

बाड़मेर में छप्पन की पहाड़ियां, तो अजमेर में मेरवाड़ा की पहाड़ियां
गर सीकर में है हर्ष पर्वत मालखेत, तो जालौर में सुंधा की पहाड़ियां

उदयपुर का उत्तर-पश्चिमी भाग मगरा कहलाता है
तश्तरीनुमा पहाड़ियों को जहां गिरवा कहा जाता हैं

लूनी और बनास नदी इसका विभाजन करती हैं
सिरोही की बेतरतीब पहाड़ियां भाकर कहलाती हैं

जोधपुर का मेहरानगढ़ हो या अजमेर का तारागढ़
अरावली के सीने पर सुशोभित हैं ऐसे अनेकों गढ़

भले ही मानसून को रोक पाने में असफल है अरावली
मगर थार को रोक पाने में यक़ीनन सफल है अरावली

बस इतनी सी इस महान पर्वतश्रृंखला की कहानी है
प्राचीन इतिहास की ये अद्भुत अद्वितीय निशानी है।

ज़िन्दगी का समोसा

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ज़िन्दगी का समोसा बड़ा ही करारा है
जल्दी से खालो इसे, ये मिलता नहीं दोबारा है
 
चाहत की चटनी नहीं है, तो क्या ग़म है
तन्हाई का तेल, तर रखता इसे हरदम है
 
सुबह-सुबह नाश्ते में अच्छा लगता है
ये अजनबी रास्ते में अच्छा लगता है
 
अहमियत न हो तो बहुत ही सस्ता है
कुरकुरापन लिए ये बहुत ही ख़स्ता है
 
दबे कुचले अरमानों के आलू इसमें दम भरते हैं
खुशबू और लज़्ज़त में कई गुना इज़ाफ़ा करते हैं
 
पेट भले ही भर जाएं, मगर दिल है कि भरता नहीं
पाकर इसे डाइटिंग करने को दिल कभी करता नहीं
 
बेशक इसे तैयार करने वाला, बड़ा ही बेनज़ीर कारीगर है
तारीफ उसकी मुमकिन नहीं, वो कायनात का क्रिएटर है
 
ज़िन्दगी का समोसा बड़ा ही चटपटा है
जी भरके खालो इसे, ये वन पीस ही मिलता है।

बोले तो आज अपुन का हैप्पी बर्थडे है

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बोले तो आज अपुन का हैप्पी बर्थडे है
कोई केक मुंह पे नी लगाएगा, शर्त यही है

पार्टी का टेंशन नहीं लेने का
सैटरडे सैटरडे करते रहने का

विदाउट एनी ब्लूटूथ, लाइफ के टफ़ एग्जाम में पासिंग मार्क्स आए हैं
मेहनत से बुरे वक़्त को मामू बनाकर, किस्मत के स्टार्स जगमगाए हैं

शिद्दत वाले सर्किट ने भी हर क़दम खूब साथ निभाया
टेंशन नहीं लेने का भाई कहके अपुन का हौसला बढ़ाया

ये केक काटने की फॉर्मेलिटी अपुन को नहीं जचती है
अपुन को तो अक्खी लाइफ ही अपना बर्थडे लगती है

साला ये अंग्रेज लोग भी पता नहीं क्या-क्या सिखा गए
आज ये दिन कल वो दिन, नित नए ठपले बतला गए

बोले तो हर दिन मस्त रहने का, खुलकर जीने का
शानदार शौक पालने का, मगर नशा नहीं करने का

अपने अंदर की आग को सुलगते गैस कटर में बदल दो यारों
फिर कोई सामाजिक डीन तु्म्हें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता

बोले तो आज अपुन का हैप्पी बर्थडे है
बिंदास जीने का झक्कास रहने का, यही अर्ज़ है

 

राह चलते अजनबियों की मदद कर देता हूँ

राह चलते अजनबियों की मदद कर देता हूँ
कुछ इस तरह अपने गुनाह कम कर देता हूँ
 
बहुत तलाशने के बाद भी, जब कोई ख़बर ना मिले
मैं उस सिलसिले को वहीं खत्म कर देता हूँ
 
इल्ज़ाम लगाने वाले, अपने गिरेबां में झांकते नहीं
दोगली दलीलें बिन सुने ही रद्द कर देता हूँ
 
उसकी याद तो अब भी आती है, बहुत आती है
नहीं आती तो वो, ऐसे में जीना कम कर देता हूँ
 
जब दिल का नाम लेकर कोई दिल तोड़ देता है
दिल के दरवाज़े सबके लिए बंद कर देता हूँ
 
खुद को पाने चला था, ख़ुद ही से हार गया
कभी-कभी तो ख़ुदगर्ज़ी की भी हद कर देता हूँ
 
ज़िंदगी की कश्ती, जब कभी डूबने लगती है
अश्क़ों का सैलाब बहाकर खुद उसे गर्क़ कर देता हूँ।

ईद मुबारक

ना वो इब्राहिम सा ईमान बचा है
ना वो आदम सा इंसान बचा है

फिर भी सब कह रहे हैं ईद मुबारक
अब तो बस दिल में यही गुमान बचा है

ये दिल है जनाब इस दिल का यही फ़साना है।

दिल के बारे में मैंने तो बस इतना ही जाना है
न जाना हो जिधर इसे तो बस उधर ही जाना है
 
कई साल हो चुके हैं, न बूढ़ा होता है न मरता है
ऐसा लगता है दिल तो फिल्मी कोई दीवाना है
 
एक बार जो इसे तोड़ दे, जुड़कर भी जुड़ता नहीं
ग़ैरों से नहीं दिल तो अपने आप से बेगाना है
 
चाहतों के पीछे-पीछे, ज़िंदगीभर भागता रहता है
किसी को बताता नहीं क्या इसको पाना है
 
हर बार नया लालच देकर फांस लेता है,
गुंडों का कबीला खुद को समाज कहता है
जमाना आज से नहीं इसका दुश्मन पुराना है
 
तन्हाई अक्सर डराती है इसे,
हज़ारों बार आज़्माती है इसे
जानता है इसे तो बस अपना साथ निभाना है
 
अंगारे बिछे हो जिधर, नंगे पाव उधर ही जाना है
ये दिल है जनाब इस दिल का यही फ़साना है।

नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर

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नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर
पर बाक़ी है उसके कुछ निशान मेरे अंदर
 
रफ़्ता रफ़्ता जो राहत मिली थी, ज्यादा देर न रुक पाई
आबाद हर गली है वो सुनसान मेरे अंदर
 
एक ज़लज़ले ने सब कुछ तबाह किया, फ़ना किया
नज़र आते हैं उजड़े वो मक़ान मेरे अंदर
 
बहुत कुछ कर सकता हूँ, बिना कुछ किए ही
बाक़ी है अब भी इतनी तो जान मेरे अंदर
 
पलकों के घर में, सपनों के टुकड़े चुभने लगेेे हैं
बिखर चुका है ख़्वाबों का जहान मेरे अंदर
 
परछाई बोलती है जिसकी, बिना अल्फ़ाज़ के आवाज़ के
रहता है कहीं साया एक बेज़ुबान मेरे अंदर
 
बहुत बुलाने पर थोड़ा आता है, शायद वो शख़्स शर्माता है
ऐसा लगता है जैसे है वो मेहमान मेरे अंदर
 
इक रोज़ घर में बहुत कुछ हुआ, हर तरफ बस धुआं ही धुआं
बाद उसके नहीं दिखा वो इरफ़ान मेरे अंदर।

महसूस करो नमी मेरी, अश्क़ हूँ मैं पलकों से बहता हूँ

तुम्हें शायद मालूम नहीं मैं तुम्हारी आँखों में रहता हूँ
महसूस करो नमी मेरी, अश्क़ हूँ मैं पलकों से बहता हूँ

कई रोज़ गुज़र जाते हैं, मगर गुज़रती नहीं वो इक रात
उस इक रात की हर बात अपने आँसुओं से लिखता हूँ

मुसाफ़िर कई मिलते हैं रोज़, मिलकर वो बिछुड़ते हैं रोज़
मील के पत्थर सा टकटकी बाँधें उन्हें बस देखता हूँ

उसने तो बड़ी आसानी से एक रोज़ अलविदा कह दिया
और मैं हूँ के अब तलक अलविदा कहने से डरता हूँ

जब इंतज़ार दम तोड़ देता है, और साया भी साथ छोड़ देता है
उस वक़्त एक बदलाव अपने अंदर महसूस करता हूँ

मज़ाक भी उड़ाया गया, और मज़ार भी बनाया गया
ज़िंदगी के ज़ुल्मो सितम बड़ी ही ख़ामोशी से सहता हूँ

भूले भटके से ही आना कभी, पता है मेरा अब भी वहीं
सच कहता हूँ दिल के बेघर घर में मैं अब भी रहता हूँ।

बड़ी ख़ामोशी से लब लफ़्ज़ तलाशते हैं

हर शख़्स में अपना अक्स तलाशते हैं
बड़ी ख़ामोशी से लब लफ़्ज़ तलाशते हैं

मिलके भी मिलता नहीं, शिकायत यही रहती है क्यों
ग़ैरों में हम अपने जैसा शख़्स तलाशते हैं

कुसूर सारा नज़रों का हैं, सब जानते हैं सब मानते हैं
फिर भी जाने क्यों वही नक़्श तलाशते हैं

सीने में शीशे सा दिल लेकर, ज़िंदगी भर
न टूटे कभी जो वो तिलिस्म तलाशते हैं

आखिर में कुछ बचता नहीं, कहीं कोई रस्ता नहीं
रूह को ठुकराकर बस जिस्म तलाशते हैं

इसे तन्हाई का तकाज़ा कहे, या शायर का वहम
ग़ज़ल में लोग आजकल नज़्म तलाशते हैं

ये दुनिया वाले हैं, इन्हें क्या फर्क़ पड़ता हैं
ये तो मौत में भी एक रस्म तलाशते हैं।

आज़ादी हो गई इतनी सस्ती

बूंदी का एक लड्डू और दिन भर की देशभक्ति
यक़ीन नहीं होता आज़ादी हो गई इतनी सस्ती

महज झंडा फहरा लेने से फर्ज़ अदा नहीं हो जाता
जोशीले गानों से मिट्टी का क़र्ज़ अदा नहीं हो जाता

सही मायने में इस आज़ादी का मतलब क्या है?
किसी को इससे कोई मतलब नहीं, यही समस्या है

मैं ये नहीं कहता कि जश्न मनाना गलत है
मगर इस आज़ादी की बहुत बड़ी कीमत है

जिसे चुकाने से पहले हर बंदा हज़ार बार सोचता है
सिर्फ मैं ही क्यों, बस यही ख़याल मुल्क़ को तोड़ता है

साल में एक दिन वतनपरस्ती दिखाने वालों, सुन लो ये
इस दिखावे के बजाए देश के लिए सच में कुछ करे दिल से

खूब खुशियां मनाएं, चाहे घी के दिये जलाएं
पर उन शहीदों की क़ुर्बानी, हम भूल ना जाएं

सिर्फ दो दिन नहीं, पूरे साल ये जश्न चलता रहे
दिन दूनी रात चौगुनी, तरक्की वतन करता रहे।

परियों की तरह रौशन है किरदार तु्म्हारा

परियों की तरह रौशन है किरदार तु्म्हारा
सदियों से न सोई आँखों में है इंतज़ार तुम्हारा

बंजर में गुलशन लगती हो, बहार सी मल्हार सी
बारिश की बूँदें छूकर होता है एहसास तु्म्हारा

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ख़ूब जचता है, चमेली का वो फूल
फूलों की तरह महकता है हर अंदाज़ तुम्हारा

वैसे तो ख़्वाहिशों की कोई इंतहा नहीं, कोई दवा नहीं
फिर भी ज्यादा कुछ नहीं मांगू मैं साथ तु्म्हारा

तु्म्हारे कुर्ते पे जितने फूल बने हैं, उतने ही मैंने सपने बुने हैं
बेसबब हर शब अब देखता हूँ मैं ख़्वाब तु्म्हारा

गर कर सको तो करो यक़ीं, एक वादा करता हूँ अभी
न तोड़ा है न तोडूंगा जानाँ कभी ऐतबार तु्म्हारा

मेरी ग़ज़ल भी तुम हो, शायरी का दिल भी तुम हो

दोस्तों के दरमियां हिसाब नहीं होते हैं

कुछ सवालों के जवाब नहीं होते हैं
दिल के चेहरों पे नक़ाब नहीं होते हैं

बहुत कुछ बह जाता है, फिर भी बाक़ी रह जाता है
आँखों में हर वक़्त ख़्वाब नहीं होते हैं

बस एक रिश्ते ने ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा दिया
दोस्तों के दरमियां हिसाब नहीं होते हैं

वक़्त की आंधी से भला, कौन बच पाया है यहां
बेवज़ह तो रिश्ते ख़राब नहीं होते हैं

भीतर से निखार देता है, बुरा वक़्त सुधार देता है
बिना काँटों के फूल गुलाब नहीं होते हैं

गर मोहब्बत गुनाह है, तो गुनाह ये क़ुबूल है
ऐसे गुनाहों के अज़ाब नहीं होते हैं

धोखा खाकर हमने तो यही सीखा है इरफ़ान
सब इंसान यहाँ खुली किताब नहीं होते हैं।

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक
उसकी इक मुस्कान साथ है अब तक

उसने तो पलभर में दूूरियों का दामन थाम लिया
दूर होकर भी मेरे वो पास है अब तक

उसका चेहरा किसी की याद दिलाता है मुझे
वो चेहरा मेरे लिए ख़ास है अब तक

क़िस्मत ने मिलवाया, ज़रूरत उसे बनाया
उसका मिलना एक राज़ है अब तक

सागर भी सारा पी लिया, नदियां भी समेट ली
फिर भी लबों पे इक प्यास है अब तक

जिस रोज़ उसे देखा था, देखता ही रह गया
उसकी आँखों का नूर याद है अब तक

कई बरस हो गए हैं, मनाते हुए रोते हुए
न जाने क्यों ज़िंदगी नाराज़ है अब तक।

जो अलविदा कह दे कोई तो ज़िंदगी इंतज़ार हो जाती है

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आंसुओं को छुपाने की हर कोशिश बेकार हो जाती हैं
बेचैनियां जिस वक्त मेरे सिर पे सवार हो जाती हैं

लाख मनाओ इस दिल को, दिल है ये माने कहां
दिल को मनाने की ज़िद में ज़िंदगी मज़ार हो जाती है

बहुत वक़्त दिया मैंने, खुद को भी और उसको भी
फिर भी हर बार मेरी तन्हाई से तकरार हो जाती है

कोई क़लम से वार करता है, तो कोई सितम बेशुमार करता है
एक ख़बर में सिमटकर ये ज़िंदगी अख़बार हो जाती है

वैसे तो वैसा कोई मिला नहीं, जैसा मुझको मिला कभी
दिख जाए गर कोई वैसा तो ये आँखें बेक़रार हो जाती हैं

किसी से दिल मिलता नहीं, किसी से दिल भरता नहीं
पता नहीं क्यों मुझसे यही ख़़ता हर बार हो जाती है

एक अलविदा कहने में ये ज़ुबान बेज़ुबान हो जाती है
जो अलविदा कह दे कोई तो ज़िंदगी इंतज़ार हो जाती है।

दर्द महसूस भी होता है, दिल आज भी तड़पता है

दर्द महसूस भी होता है, दिल आज भी तड़पता है
तेरी एक झलक के लिए दिल आज भी तरसता है

बहुत ढ़ूंढा मैंने तुझको, ना मिली तू मुझको
तेरे इंतज़ार में बेक़रार दिल आज भी धड़कता है

कभी खुशबू तो कभी साये के पीछे भागता हूँ

बारिश में भीगकर भी मैं प्यासा रह जाता हूँ
कभी खुशबू तो कभी साये के पीछे भागता हूँ

मेरी नींद का फ़लसफ़ा बस इतना समझ लीजिए
पलकों के ऊपर सोता हूँ पलकों के नीचे जागता हूँ