तुम्हारी ख़ामोशी

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह लफ़्ज़ों के मोल देती है
अनकहे एहसास की गिरह खोल देती है
अंदरूनी आवाज़ की सतह टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

इसी ख़ामोशी ने तो लबों को लरज़ना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो पलकों को झपकना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो दिल को धड़कना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो खुशबू को महकना सिखाया है

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह सांसें कुछ और देती है
सिले हुए लबों की हर गिरह खोल देती है
ठहरे हुए आंसुओं की नमी टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

इसी ख़ामोशी के इंतज़ार में कुछ अल्फ़ाज़ अब तक अधूरे हैं
पूरा करने के लिए जिन्हें मुझे तु्म्हारे एहसास की ज़रूरत है
इस ख़ामोशी की चादर में, मुझको भी छुपा लो न जानाँ
बहुत दिन हो गए हैं शोर में पलते हुए, दिल ने ये माना

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह लफ़्ज़ों के मोल देती है
अनकहे एहसास की गिरह खोल देती है
अंदरूनी आवाज़ की सतह टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

के दिल आ जाता है दिल के किस्सों पर

उसकी आँखों के पन्नों पर
मुझे ऐतबार है अपने लफ़्ज़ों पर
हर बार ये कुछ ऐसा लिख जाते हैं
के दिल आ जाता है दिल के किस्सों पर
ये दिल आ जाता है दिल के हिस्सों पर…

वो नज़दीकियों का मतलब दूरी समझ बैठी…

मोहब्बत को मेरी मज़बूरी समझ बैठी
होके वो दूर, दूरियों को ज़रूरी समझ बैठी

मैं करता रहा इंतज़ार, हर पल पल-पल उसका
वो नज़दीकियों का मतलब दूरी समझ बैठी…

अब पूछ ही लिया है तो सुन ये, बहुत प्यार करता हूँ तुमसे मैं

अब पूछ ही लिया है तो सुन ये
बहुत प्यार करता हूँ तुमसे मैं
इतना के बता भी नहीं सकता
जज़्बात ये जता भी नहीं सकता
गर महसूस कर पाओ तो करो इसे
बंद आँखों से जी भरके निहारो इसे
ये वो एहसास है जो साँसों में बसता है
ये वो अल्फ़ाज़ है जो आँखों में दिखता है
बस इसे पढ़ने का हुनर आना चाहिए
बाक़ी तो सब दिल के हवाले कर देना चाहिए

अब पूछ ही लिया है तो सुने ये
तुमसे ज्यादा तु्म्हें चाहता हूँ मैं
इतना के सोच भी नहीं सकती तुम
सोचना ये छोड़ भी नहीं सकती तुम
गर मुझ पे यक़ीन है तो यक़ीन करो
आसमान हूँ मैं तुम मेरी ज़मीन बनो
अगली बार मत पूछना के क्यों चाहता हूँ तुम्हें मैं
इस सवाल का जवाब तो खुद पता नहीं है मुझको…

कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से

कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में

बारिश की बूँदें बताएंगी तुम्हें, क्या है अक्स तुम्हारा
आँखें ये मूंदे दिखाएंगी तुम्हें, बेहद दिलकश नज़ारा
इन आँखों को किसी चश्मे की ज़रूरत नहीं
बिन देखे ही अक्सर ये बहुत कुछ देख लेती हैं

अकेली राहों का पता, पूछो कभी तन्हा सफ़र से
बीते लम्हों का पता, ढूंढो कभी यादों के शहर में
कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में

एक शख़्स है जो तुमसे बेपनाह मोहब्बत करता है
बिना निगाहों के भी तुम को अपने अंदर देखता है
इज़हार करने के लिए सही मौका तलाश रहा है
वो जो एक अरसे तक ज़िन्दा एक लाश रहा है

नूरानी रातों का पता, पूछो कभी संदली सहर से
बीती बातों की अदा, ढूंढो कभी साँसों की लहर में
कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में…

बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

बारिश में अक्सर तुम याद आती हो
बूँदों के संग-संग मिलने चली आती हो
हवाओं से पुरानी यारी है मेरी
समझती है सारी बेक़रारी ये मेरी
तभी तो घने बादलों को नचाती है वो
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

अंदर के समंदर की बेचैनी जब भाप बनकर उठती है
घनघोर घटाओं का ताना-बाना ये फौरन बुन लेती है
पहाड़ों की दीवार से जब टकराती है वो
ठंडक मिले जहाँ वहीं बरस जाती है वो
बंजर को गुलशन हरदम बनाती है वो
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

मगर इन दिनों ना घटा है, ना हवा है, ना दुआ है
तभी तो ना बारिश होती है, ना ही तुम नज़र आती हो
और ना ही मुझको वो सुर, राग मल्हार आता है
गाकर जिसे मैं जब चाहूँ बुला लूं तुझे पास अपने
हाँ आता है तो बस बरसती हुई बारिश में भीग जाना
नज़र आता है तो बस बारिश में भीगा हुआ तेरा चेहरा
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो
बूँदों के संग संग मिलने चली आती हो

क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं ?

खुद मुझको भी नहीं पता, क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं
हां जानना भी नहीं चाहता, क्यों सोचता हूं तुम्हें मैं

तुमको सोचने से ज़ेहन को ताज़गी मिलती है
तुम्हारी सादगी देखकर मेरी ज़िंदगी खिलती है

तुमने अपनी हंसी में कई अनमोल मोती छुपा रखे हैं
जब भी हंसती हो, ये दिल की ज़मी पे गिरने लगते हैं

उठाने को जब झुकता हूं, तुम्हारी झुकी हुई नज़रें नज़र आती हैं
हर बार ये सुरमई निगाहें तेरी, पहले से ज्यादा अपना बनाती हैं

कई बार तेरे नाम को अपनी हथेली पे लिखकर मिटा चुका हूं
कई बार तेरे चेहरे को अपनी पलकों पे रखकर सहला चुका हूं

कई बार सपने और दिल टूट चुके हैं, सो आदत हो चली है
घाव वो सारेे भर चुके हैं, दर्द से दिल को राहत हो चली है

ये मोहब्बत नहीं तो और क्या है? क्या है आखिर?
पता चले तो बताने ही सही, पर चली आना कभी

खुद मुझको भी नहीं पता, क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं
हां जानना भी नहीं चाहता, बस चाहता हूं तुम्हें मैं

वो पूछती है, मेरे लिए क्यों लिखते हो तुम?

वो पूछती है, मेरे लिए क्यों लिखते हो तुम?
हर जगह आजकल इतने क्यों दिखते हो तुम

उसे क्या बताऊं, ये मन मेरा उसके मन से जुड़ गया
बैठा था कई दिनों से डाली पे जो, वो परिंदा उड़ गया

गर अब भी ना समझ पाए वो, तो अब और मैं क्या करूं
अब तक किया है जितना, प्यार उससे कहीं ज्यादा करूं

मुझको लगता है शायद, ख़बर है उसे भी मेरे दिल की
वरना यूं कोई क्यों पूछता हैं, राहों से डगर मंज़िल की

वो पूछती है मुझे इतना क्यों सोचते हो तुम
हर पल आजकल साथ मेरे क्यों होते हो तुम

उसे क्या बताऊं, ये दिल मेरा उसकी आस में बेचैन है
ना दिन का पता है इसे, ना होती इन दिनों कोई रैन है

गर अब भी ना समझ पाए वो, तो अब और मैं क्या करूं
अब तक किया है जितना, इश्क़ उससे कहीं ज्यादा करूं

मुझको लगता है शायद, ख़बर है उसे भी मेरे दिल की
वरना यूं कोई क्यों पूछता हैं, तूफ़ा से ख़बर साहिल की

बहुत मन था मेरा तुझसे मिलने का

बहुत मन था मेरा तुझसे मिलने का
जिस रोज़ तूने मिलने से मना कर दिया
मैं तो फिर कहीं नहीं गया उस रोज़ 
मगर ये बावरा मन मेरा मिलने तेरे घर गया

हवाओं के संग-संग आया था, सो पता कैसे चलता
पता पूछते पूछते आखिर इसका भी दिल भर आया
लौट आया फौरन, ना रुक पाया ज़रा भी देर वहां
इसे मालूम था, बेचैनी मेरी सता रही होगी मुझेे
आखिर अकेला छोड़कर मुझे, ये कहां रह पाता है
जहां भी जाता है, थोड़ी देर में लौट आता है

आकर जो इसने तुम्हारा हाल सुनाया
है वो अब तक मेरी सांसों में समाया

सुबह से उस रोज़, की थी तुमसे मिलने की तैयारी
इन आँखों में बस चुकी थी, तुम्हें देखने की बेक़रारी

और तुम हो, कि अपने आशिक को यूं तड़पा रही हो
हर रोज़ बेवज़ह बस इंतज़ार के तोहफ़े दिए जा रही हो

ख़ैर कोई बात नहीं, किसी दिन तो तुम्हें एहसास हो ही जाएगा
के जितनी शिद्दत से मैंने चाहा है तुम्हें, ना कोई और चाहेगा

बस इतना याद रखना, मेहरबानी नहीं मोहब्बत का मुंतज़िर हूं
जो ग़ौर करोगे कभी तो पता चलेगा, मैं भटकता हुआ एक दिल हूं…

 


			

वही पूछ बैठी मुझसे यूं देते हो किसे तुम सदाएं

मैं लिखता रहा जिसके लिए शामों सहर वफ़ाएं
वही पूछ बैठी मुझसे यूं देते हो किसे तुम सदाएं

अब मैं उसे समझाऊं, या अपने नादान दिल को
के तुम दोनों ने ही तो दी है मुझे जीने की अताएं..

तुमसे बात करके दिल को सुकून मिलता है

तुमसे बात करके दिल को सुकून मिलता है
तुम्हें याद करके चेहरा मेरा ख़ूब खिलता है

चोट तुमको लगती है और दर्द मुझको होता है
तेरी आँखें याद करके दिल सपने नए संजोता हैं

मिलने को बेताब हूं, बेचैन बेहिसाब हूं
आहिस्ता पढ़ना मुझेे, मैं एक बंद किताब हूं

पल दो पल की मुलाक़ात भी प्यारी लगती है
तुम्हारे बिन साँसें अब बोझिल सारी लगती हैं

तुमने तो बड़ी आसानी से एक रोज़ अलविदा कह दिया
पर तु्मको क्या ख़बर हमने दिल अपना वहीं रख दिया

वादा है मेरा, तुम्हारे हर दर्द को अपना बना लूंगा
लफ़्ज़ों की ही तरह दिल की बातें तुमको बता दूंगा

अब और दूर रहके, इस तरह तो ना सताओ जानाँ
ख़ातिरदारी करेंगे खूब, दिल के दर पे आओ जानाँ

तो फिर कब मिल रही हो जानाँ, ठीक उसी जगह पे आना
जहां छोड़के गया था मैं वो दिल अपना, हां वो दिल अपना

तेरे तो नाम में ही सुर है…

तेरे तो नाम में ही सुर है
जब भी लेता हूँ, आस-पास कई साज बजने लगते हैं
बेहद दिलकश है तेरी आवाज़, अंदाज़, और एहसास
तेरे बारे में जब लिखता हूँ, शहद से मीठे लगते हैं अल्फ़ाज़
इस बात का ख़ास ख्याल रखता हूँ
के ज़िक्र तेरा तन्हाई में करता हूँ
ताकि पहचान तुम्हारी और एहसास मेरे महफ़ूज़ रह पाएं
तुमने कहा था इक रोज़ मुझसे, के पता ना चले किसी को
बस इसी वादे के चलते मुझे भी अब जाकर ये मालूम हुआ
के कुछ तो है तेरे मेरे दरमियां, एक रूहानी सा राब्ता
जो सुकून देता है मुझे, हर पल हर घड़ी यूं गहरा।

तेरी तो बातों में ही धुन है
जब भी सुनता हूँ, पांव मेरे खुद बखुद थिरकने लगते हैं
तेरी शहनाई पर एहसास मेरे, बाहें खोले यूं नचने लगते हैं
बहुत ख़ास है, ये प्यास, सांस, और एहसास
तेरे बारे में जब सोचता हूँ, हक़ीक़त से ज्यादा अच्छे लगते हैं ख़याल
इस बात का ख़ास ख्याल रखता हूँ
के मोहब्बत तुमसे छुप छुपके करता हूँ
ताकि पहचान तुम्हारी और जज़्बात मेरे महफ़ूज़ रह पाएं
मगर अब और ज्यादा दिनों तक मैं छुपा नहीं पाऊंगा
इतना प्यार करता हूँ तुमसे, के कभी बता नहीं पाऊंगा
अब तो समझ जाओ, पास मेरे आ जाओ
लफ़्ज़ों को पढ़के मेरे, संग मेरे मुस्कुराओ…

Happy birthday Aamir bhai..(Rj Aamir)

31705029_2649534005118281_6013603686469599232_n

है मखमली आवाज़ का जादूगर वो
या कहूं के अंदाज़े बयां का कारीगर वो

गुलों की तरह महकता है, वो सावन की तरह बरसता है
या कहूं के दिलों को जीतने वाला बाज़ीगर वो

रातों को ज़िंदा करता है एहसास के पुर्ज़े वो
आंखों से बयां करता है अल्फ़ाज़ के क़तरे वो

ज़ुबां तो जैसे शहद से लिपटा हुआ एक लिबास है
वो एक शख़्स नहीं यकीनन मुकम्मल एहसास है

है मखमली आवाज़ का जादूगर वो
या कहूं के अंदाज़े बयां का कारीगर वो

है आमिर वो, दिलकश आवाज़ का साहिर वो
नूरानी क़ैफ़ियत से करता सबको मुतासिर वो…

 


			

मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई

12742652_926890504026207_1900929541801852373_n.jpg

एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई
ज़िंदगी जीने की इज़ाज़त हो गई
तन से मन की बग़ावत हो गई
ख़्वाबों में ही सही, ज़ियारत हो गई
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई

लबों पे आके लफ़्ज़ ठहर जाते हैं
आँखों में अधूरे अक्स नज़र आते हैं
काग़ज़ पे इश्क़ के फ़साने उतर आते हैं
पलकों के पुराने आशियाने महक जाते हैं
यूँही तो नहीं, हम दीवाने कहलाते हैं
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई

दर्द से रूह को राहत हो गई
चाहा था जिसे वही चाहत हो गई
ना छूटे कभी जो वो आदत हो गई
ना टूटे कभी जो वो इमारत हो गई
ज़िंदगी आजकल इबादत हो गई
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई…


			

फिर कहने को भले ही वो मुझसे दूर है…

IMG_20180701_141233.jpg

कोई बात तो उसके किरदार में ज़रूर है
लबों पे दुआ, चेहरे पे हया का नूर है

मुझसे ज्यादा मेरे दिल के क़रीब है, हबीब है, ज़ेहनसीब है
फिर कहने को भले ही वो मुझसे दूर है...

			

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम…

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम
पीकर जिसे बारिश में दिल ये खुश हो जाता है
या फिर कहूँ के बंजारे के लिेए वो सराय हो तुम
ठहरकर जिसमें बंजारे को घर का एहसास होता है
कभी कभी तो यूँ लगता है बारिश की वो बौछार हो तुम
भीगकर जिसमें बेसबर इस रूह को राहत मिल जाती है
हाँ अगर कहूँ के धूप में साया देता शजर हो तुम
पाकर जिसकी छाव सुकून वाला सुकून मिलता है

बेरोज़गार दिल को बाद महीने के मिली सैलेरी हो तुम
पाकर जिसे ख़यालों का खाता खुशियां क्रेडिट करता है
या फिर कहूँ के गर्मी की वो छुट्टियां हो तुम
मनाकर जिन्हें स्टूडेंट यह मन फिर से खिल उठता है
कभी कभी तो यूँ लगता है शायर की वो क़लम हो तुम
डूबकर जो हर दिन कुछ नया अनकहा लिख जाती है
हाँ अगर कहूँ के मीर की वो ग़ज़ल हो तुम
पढ़कर जिसे दिल में दबे अरमां जगने लगते हैं

हफ़्ते भर की थकन उतारने वाला वो इतवार हो तुम
पाकर जिसे पूरे वीक की वीकनैस छूमंतर हो जाती है
या फिर कहूँ के सफ़र-ए-हयात में वो विंडो सीट हो तुम
बैठकर जहां पे हर मुश्किल सफ़र आसां लगने लगता है
कभी कभी तो यूँ लगता है राइटर का वो थॉट हो तुम
बोट पे जिसकी सवार होके हर रोज नया वो नोट लिख देता है
हाँ अगर कहूँ के मेरे ख़यालों की मलिका हो तुम
सोचकर तुम्हें हर बार प्यार से प्यार होने लगता है

अब तक तो तुम यह बात बहुत अच्छी तरह समझ चुकी होंगी
के मेरे दिल के साथ साथ मेरे लफ़्जों पर भी हुकूमत चलती है तेरी
जो ना लिखूं तु्म्हारे बारे में ज़रा भी
तो ये सारे अल्फ़ाज़ बाग़ी होकर गीला कर देते हैं हर वो काग़ज़
जिस पर लिखने की खातिर अपने जज़्बात उड़ेला करता हूँ
और फिर इसी नमी के चलते गुम हो जाते हैं वो सारे अल्फ़ाज और एहसास
जिनमें छुपाकर रखता हूँ हर रोज़ मैं एक तस्वीर तुम्हारी

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम
पीकर जिसे बारिश में दिल ये खुश हो जाता है
या फिर कहूँ के बंजारे के लिेए वो सराय हो तुम
ठहरकर जिसमें बंजारे को घर का एहसास होता है….RockShayar

 


			

वो जो हो चुके हैं खुद अपने लिए भी पराये

नज़रों पे चाहतों का चश्मा चढ़ाएं
तक रहे हैं कब से आवारगी के हमसाये

खुदगर्ज़ी की तोहमत क्या लगाएं उन पे
वो जो हो चुके हैं खुद अपने लिए भी पराये

पूरा एक महीना हो गया है तुमको देखे हुए….Miss You…

पूरा एक महीना हो गया है तुमको देखे हुए
अब तो आँखों ने भी यादों से सांठगांठ कर ली हैं
तभी तो इन दिनों ज्यादातर बहती ही रहती हैं
आजकल तो इन्हें केवल ख़्वाबों पर ही यक़ीन रह गया हैं
हक़ीक़त वाला दीदार भी तो महज एक ख़्वाब ही हो चुका है
बस इसी डर से बंद रखता हूँ मैं अपनी आँखेंं
के कहीं चला ना जाए ख़्वाब तेरा बुरा मानके
गर खुली रहेंगी ये आँखें, तो धुंधली हो जाएगी वो फोटू
दिलो दिमाग पे जिसने मेरे, किया है ऐसा खूबसूरत जादू
के अब तो हर जगह तुम ही तुम नज़र आती हो
बंजर में भी बारिश वाला वो एहसास दे जाती हो
पाकर जिसे मैं फिर से वो वाला मैं हो जाता हूँ
जीना जिसे अच्छा लगता है, हाँ बहुत ही अच्छा लगता है
महीने भर से भी ज्यादा हो गया है तुमको देखे हुए
अब तो पलकों ने भी यादों से सांठगांठ कर ली हैं
तभी तो इन दिनों ज्यादातर गीली ही रहती हैं
क्या पता इन्हीं अश्क़ों के सदक़े में तू मिल जाएं कहीं
और मैं जीने लगूं फिर से 
सोहबत में तेरी
मोहब्बत में तेरी
चाहत तू मेरी
आदत तू मेरी...