तुम बस एक ख़याल नहीं हो…

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तुम बस एक ख़याल नहीं हो, जो ज़ेहन की तश्तरी से भाप बनकर उड़ जाएं

तुम तो दरअसल एक ऐसा सवाल हो, जो कई सदियों से मन में उठ रहा है
 
कई बार मैंने अपने बावरे मन की प्याजनुमा परतों को खोलने की कोशिश की हैं
लेकिन हर बार खुद को उन्ही परतों के दरमियाँ बेसाख़्ता सा लिपटा हुआ पाता हूँ
 
खुद को पाने की मेरी वो कोशिशें आखिर तक दम नहीं तोड़ती हैं
मंज़िल की तलब नहीं हैं इन्हें, ये तो बस बरसों से यूँही बेख़बर हैं
 
जब भी ख़्वाबों का जहान हक़ीक़त के बेहद क़रीब पहुंचता है
फिर से वही एक नया सपनों का शहर बसना शुरू हो जाता है
 
तुम कोई शबनम की बूँद नहीं हो, जो सूरज निकलते ही गुम हो जाएं
तुम तो दरअसल एक ऐसा खुमार हो जो कई सालों से दिल पे छा रहा है
 
कई बार मैंने अपने नादान दिल की सहमी हुई आंखें टटोलने की कोशिश की हैं
लेकिन हर बार खुद को उन्ही नज़रों के दरमियाँ नाबीना सा ठहरा हुआ पाता हूँ
 
वज़ूद को बचाने की मेरी वो कोशिशें आखिर तक दम नहीं तोड़ती हैं
मंज़िल की तलब नहीं हैं रूह को, यह तो बस बरसों से यूँही बेसबर हैं
 
जब भी ख़्वाबों का जहान हक़ीक़त के बेहद क़रीब पहुंचता है
फिर से वही एक एक करके ख़्वाबों का टूटना शुरू हो जाता है
और यह सिलसिला कभी रुकता नहीं है,
बस चलता रहता है

बिना रुके बस चलता रहता है…

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