तुम्हारे पश्मीना पहलु की छांव

तुम्हारे पश्मीना पहलु की छांव मुझे ज़िंदगी की धूप से बचाती है
निगाहों की चादर बेचैनियां दूर करके अपने आगोश में सुलाती है

बहुत दिन हो गए हैं, बर्फ की उस ठिठुरती हुई बारिश में भीगे हुए
वादियों की सदा ख़्वाबों के ज़रिए आजकल अपने पास बुलाती है
हालाँकि तुम्हारे घर का पता, अब भी मेरे लिए है लापता
जब भी याद करने की कोशिश करता हूँ आँखें सब कुछ बहा देती है

तुम्हारा ज़िक़्र जब भी करता हूँ, ख़यालों से खुशबू आती है
रूह मेरी वो तुमसे जुड़कर मोहब्बत के तराने गुनगुनाती है

कई बार बहुत ज्यादा याद आती हो, रात भर पलकें भिगाती हो
लेकिन जब सुबह होती है, ओस की बूंदों की तरह गुम हो जाती हो

गर इत्तेफ़ाक़न ही मुलाक़ात हो जाएं तो उसे कुदरत का इशारा समझ लेना
इस दफ़ा अलविदा को अलविदा कहके दूर-दूर नहीं, हमें पास-पास है रहना

आज भी सोने से पहले तकिये के नीचे तुम्हारी तस्वीर रखता हूँ
क्या मालूम फिर से वही सुनहरे तुम्हारे ख़्वाब आने शुरू हो जाये

बेनज़ीर सी वो बातें ना सही मगर कभी तो हालचाल पूछने ही चली आओ
इंतज़ार को भी इंतज़ार करते हुए एक अर्सा हो गया है अब तो चली आओ...

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