“बरसों बाद बंजर में जैसे, बरसती हुई बारिश लगती हो”

बरसों बाद बंजर में जैसे, बरसती हुई बारिश लगती हो
रोशनी की चादर ओढ़े, तुम तो कोई महविश लगती हो

सालों इबादत करते रहे, ख़ूब दुआएं मांगते रहे
रब ने पूरी की है जो, हाँ वही फ़र्माइश लगती हो

ना पूरा होना चाहती हो, ना अधूरा रहना चाहती हो 
सदियों से दिल में पल रही, तुम तो कोई ख़्वाहिश लगती हो

बेनज़ीर ओ मेरे माशूक मीर, चलाती हो तुम तो नज़रों के तीर 
पहली ही नज़र में हूर जैसे, हुस्न की पैमाइश लगती हो

पास रहती हो जानाँ जब तक, चलती रहती हैं साँसें तब तक
दूर जाते ही तुम तो जैसे, दर्द की आज़्माइश लगती हो

एक एक करके जगाती हो, दिल के सोये अरमां सभी
सालों से सीने में दबे हुए, एहसास की आराइश लगती हो

लापता जब से पता तुम्हारा, इतना ही पता चला ‘इरफ़ान’
अधूरा रहना क़िस्मत है जिसकी, हाँ वही गुज़ारिश लगती हो।

महविश – चाँद सा चेहरा 
पैमाइश – मापना
आराइश – सजावट

 

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