बचके रहना ज़रा, मेैं दिल चुरा लेता हूँ

बातें ही नहीं, आँखें भी घुमा लेता हूँ
बचके रहना ज़रा, मेैं दिल चुरा लेता हूँ

नज़र न आ जाए कहीं, अश्क़ों में छुपा वो दर्द कभी
दिल की बेचैनी अक्सर, लफ़्ज़ों में छुपा देता हूँ

इससे बेहतर ख़ैरात, और कहाँ मिलेगी यहाँ
मुसीबत के मारे हुए, लोगों की दुआ लेता हूँ

और कुछ तो आता नहीं, इस दिल को कोई भाता नहीं
कच्ची पक्की सच्ची, जैसी भी हो यारी निभा लेता हूँ

जिस शख़्स से एहसास का अक्स जुड़ जाएं
उस शख़्स की पलकों पे अपनी पलकें सजा लेता हूँ

जुनून कहो हालात कहो, या कहो ज़िद कोई
बेदर्द ज़िंदगी से अपने हर दर्द की दवा लेता हूँ

मेरी ग़रीबी का मज़ाक उड़ाने वाले, बस इतना समझ ले 
पैसे तो नहीं, पर आजकल इंसान कमा लेता हूँ।

#RockShayar

 

“पड़ोस में रहने की बात कर के दूर चली जाती हो”

पड़ोस में रहने की बात कर के दूर चली जाती हो
लगता है तुम भी मेरी तरह खुद को आज़्माती हो

नज़रों के ख़त पढ़ना तुम्हें भी तो आता है
नादान ये दिल मेरा, इक़रार करने से घबराता है

सब जानकर भी, यूं अनजान बनती हो
तुम्हें पता है, तुम मेरे दिल में रहती हो

जब भी मुझसे बात करती हो, ये साफ़ पता चलता है
के मेरी तरह तुम्हारा भी दिल ये, जोरो से धड़कता है

मोहब्बत हो गयी है, इस बात को छुपाना क्यों
जज़्बात गर छुपा भी लो, तो आँखों में नज़र आ जाते हैं

जिस दिन तुम नहीं दिखती हो, आँखें बंद कर लेता हूँ
बंद आँखों से हर बार सामने तुमको ही पाता हूँ

बार-बार खुद को बस यही यक़ीन दिलाता हूँ
के इस बार तो यह ख़्वाब सुबह का ख़्वाब निकले

नींद खुलने से पहले जी भर के देखता हूँ तुम्हें
क्या पता फिर यह ख़्वाब ख़्वाब ही ना रह जाए

पलकों पे रहने की बात कह के गुम हो जाती हो
लगता है तुम भी मेरी तरह खुद को सताती हो।

सुन कभी तो तू मेरे दिल की आवाज़ भी…

21.jpgसुर भी हैं साज़ भी, अजनबी एहसास भी
सुन कभी तो तू मेरे दिल की आवाज़ भी

तुम्हें देखते ही दिल, सफ़र पर निकल पड़ता है
तुम्हारी नज़रों के क़दमों का, ये पीछा करता है

और तब तक वापस नहीं लौटता है
जब तक ये खुद तसल्ली न कर ले
के वो खुशबू लौटकर फिर आ चुकी है
ख़्वाबों के महकते आशियाँ में
पलकों के पहरे देते कारवाँ में

तुम साथ नहीं हो तो क्या हुआ
तुम्हारी परछाई तो अब भी मेरे साथ है
जब भी दिल करता है
धूप में निकल पड़ता हूँ
कभी वो मुझे कुछ किस्से सुनाती है
कभी मैं उसे अपना हिस्सा बनाता हूँ

बस इसी तरह कट रहा है ज़िंदगी का सफ़र
बस इसी तरह महक रहा है यादों का शहर
बस इसी तरह एक दिन राहों में मिल जाओ कहीं
बस इसी तरह एक दिन निगाहों में रहने आओ कभी

बस एक खुशबू…

बस एक खुशबू की तलाश में क़दम चलते-चलते इतनी दूर चले आए

वरना ज़िंदगी ने तो चंद क़दमों के बाद ही रुकने की ज़िद पकड़ ली थी

 

“गर तुम साथ हो”

तुम्हें देखते ही दिल का शहर आबाद हो जाता है

गर तुम साथ हो तो हर पल मेरे लिए ख़ास हो जाता है

नज़रों के DSLR से मैंने बिन बताये तुम्हारी कई तस्वीरें ली हैं

आँखों से फिसलती नमी की तस्वीरें

गालों पे मचलती ज़िंदगी की तस्वीरें

बातों से झलकती ख़ुशी की तस्वीरें

होंठो से छलकती हँसी की तस्वीरें

वो सारी तस्वीरें, हैं मेरी साँसों की तक़दीरें

तुम्हें देखते ही सीने की ख़लिश खुद बखुद ख़त्म हो जाती है

गर तुम पास हो तो ज़िंदगी मेरे लिए उम्दा नज़्म हो जाती है

लम्हों के Lens से मैंने बिन बताये तुम्हारे कई हसीं पल Zoom किये हैं

आईने के सामने खुद को निहारने का पल

लहराती हुई ज़ुल्फ़ों को संवारने का पल

सुबह-सुबह अंगड़ाई लेने का पल

मुलाक़ात के वक़्त शर्माने का पल

वो सारे पल, हैं मेरी मुश्किलों के हल

तुम्हें देखते ही दुबारा जीने की ख़्वाहिश होती है

गर तुम साथ हो तो हर जगह बारिश होती है

पलकों के Panorama से मैंने बिन बताये तुम्हारे कई Shots लिए हैं

बारिश में बेफ़िक्र होकर झूमने का Shot

मोहब्बत से माथे को चूमने का Shot

आँखों से अक्सर बात करने का Shot

चेहरे को हिज़ाब से ढकने का Shot

वो सारे शॉट, हैं मेरी Thought की Boat

तुम्हें देखते ही हर सफ़र सुनहरी एक याद हो जाता है

गर तुम साथ हो तो हर पल मेरे लिए ख़ास हो जाता है।

#RockShayar

ख़लिश – सूनापन
उम्दा नज़्म – बेहतरीन कविता
हिज़ाब – आवरण

“तुमसे दूर होते ही खुद से दूर हो जाता हूँ”

तुमसे दूर होते ही खुद से दूर हो जाता हूँ
हर शब तुम्हारी यादें तकिये के नीचे पाता हूँ
 
कुछ यादें नींद को सुलाती हैं, कुछ यादें बहुत रुलाती हैं
कुछ यादें अपना बनाती हैं, कुछ यादें सपना दिखाती हैं
 
ख़्वाब में अक्सर वही हक़ीक़त देखता हूँ
हक़ीक़त में जो बस एक ख़्वाब लगती है
 
तुमसे नज़रें मिलाते ही खुद को भूल जाता हूँ
हर बार तुम को खुद में, और ज्यादा पाता हूँ
 
तन्हाई में आजकल तुम्हारा ख़याल बुनता हूँ
दबे पांव चली आती दिल की आहट सुनता हूँ
 
वही आहट, जिसे सुनने को कई बरस से कान तरस रहे हैं
वही चाहत, जिसके सदक़े में बिन मौसम बादल बरस रहे हैं
 
तुमसे दूर होते ही खुद से दूर हो जाता हूँ
हर शब तुम्हारी आँखें पलकों के नीचे पाता हूँ

“राजस्थान के लोक गीत”

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राजस्थान का दिल यहाँ के, लोक गीतों में बसता हैं
अवसर हो चाहे कोई भी, माहौल तो इन्हीं से बनता हैं

केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस
राज्य गीत ये गाये वही, पिया जिनके गये परदेस

पानी भरने वाली स्त्रियां, पनघट पर गाती हैं कई गीत
इंडोणी और पणिहारी के ज़रिए, पूछे कहाँ मेरा मनमीत

मेवाड़ का हमसीढ़ो तो जी, स्त्री-पुरुष का सामूहिक लोक गीत है
कैलादेवी के मेले में गूँजने वाला, लांगुरिया एक भक्तिगीत है

गणगौर के अवसर पे, गोल घेरे में घूमर गीत गाते हैं
विवाह में समधिनों के गाली गीत, सीठणे कहलाते हैं

गोरबंद नखराळो गीत में ऊँट का श्रृंगार बताया गया है
मोरिया अच्छा बोल्यो रे में सगाईशुदा की व्यथा बयां है

पीहर की याद में अक्सर बालिका वधू, चिरमी गीत गाती हैं
सूंवटिया में तोते द्वारा भीलनी, पति को संदेसा भिजवाती है

सिरोही क्षेत्र का ढोला-मारु, प्रेमकथा पर आधारित है 
उपवन में मिलन का पपीहा गीत, पक्षी को संबोधित है

काजळियो गीत गाते हुए, होली पर चंग बजाया जाता है
हाड़ौती और ढूँढाड़ के मेलों में पंछीड़ा गीत गाया जाता है

रातीजगे में रातभर जगती हैं, ब्याह में बना-बनी गाती हैं 
बारात का डेरा देखकर, औरतें जलो और जलाल गाती हैं

हिण्डोला सुणके, सावण झूला झूलने आता है
लाडो राणी की विदाई पे, ओल्यूँ गाया जाता है

बिछुड़ो गीत में एक पतिव्रता स्त्री की आत्मा रहती है
मरते वक़्त पति को वह दूसरी शादी करने को कहती है

होली के बाद मारवाड़ में कन्याएं, घुड़ला गीत गाती हैं
लावणी गीत गाकर ही नायिका, नायक को बुलाती है

अपने प्रियतम की याद में, विरहणी आँसू बहाती है 
कुरजाँ, कागा, और हिचकी जैसे कई गीत वो गाती हैं

एक बार आओ जी जवाई जी पावणा, दामाद के लिए है
कामण गीत वर-वधू को बुरी नज़र से बचाने के लिए है

खेतों में काम करते हुए, किसान भाई गाते हैं तेजा गीत
रामलीला और रासलीला, दोनों का मिलन है हरजस गीत

लोद्रवा की राजकुमारी पर आधारित, प्रेम गीत है मूमल
सुनकर जिसे रेतीले मन में, फूटने लगती है नव कोपल

कांगसियो जीरो सुपणा, रसिया पीपळी बधावा और जच्चा
माटी से जुड़े इन गीतों को सुनकर, होता है एहसास सच्चा

सुख-दुःख, विरह, बैर, भक्ति, श्रृंगार, वीर और प्रीत
अमर रहेंगे यूँही सदा, राजपूताना के सब लोक गीत

जितना जान पाया उसे, कविता में समेटने की कोशिश की है
बरसों पुरानी धरोहर को, काग़ज़ पे सहेजने की कोशिश की है।

“जताया नहीं जा सकता जिसे”

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बरसती हुई बारिश में, जैसे एक कप चाय मिल जाये
कई दिनों के बाद, जैसे कोई बिन बताये मिल जाये
सालों सूखे के बाद, जैसे सहरा में फूल खिल जाये
अलविदा कह चुका, बिछुड़ा कोई यार मिल जाये
तब कैसा लगता है? बताया नहीं जा सकता उसे
तब जैसा लगता है, छुपाया नहीं जा सकता उसे
तब वैसा लगता है, जताया नहीं जा सकता जिसे।

सफ़र में चलते-चलते, जैसे कोई पेड़ मिल जाये
छुपाकर रखा हुआ, यादों का कोई ढेर मिल जाये
दर्द से बिखरा हुआ, दोबारा कोई दिल जुड़ जाये
पिंजरे की बंदिश तोड़के, जैसे कोई परिंदा उड़ जाये
तब कैसा लगता है? बताया नहीं जा सकता उसे
तब जैसा लगता है, छुपाया नहीं जा सकता उसे
तब वैसा लगता है, जताया नहीं जा सकता जिसे।

लावारिस इस ज़िन्दगी में, जैसे कोई अपना मिल जाये
दर बदर भटकते हुए, घर जाने का रस्ता मिल जाये 
अँधेरों के आँगन में, नूर का कोई क़तरा मिल जाये 
दुआओं के दामन में, दिल का खोया टुकड़ा मिल जाये
तब कैसा लगता है? बताया नहीं जा सकता उसे
तब जैसा लगता है, छुपाया नहीं जा सकता उसे
तब वैसा लगता है, जताया नहीं जा सकता जिसे।।

#रॉकशायर

 

“ऐ अजनबी, तेरी बातें भी वही हैं”

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चेहरा भी वही है, आँखें भी वही हैं
ऐ अजनबी, तेरी बातें भी वही हैं

वही बातें वही मुलाक़ातें, सब कुछ वैसा ही है
जैसा मेरी सोच के सागर में, कोई मोती तैर रहा हो

कशिश ही कुछ ऐसी है, के कुछ पता ही नहीं चलता है
बस एक डोर है, जिसके सहारे मन ये मेरा खिंचा चला जाता है

तुम जब मुस्कुराती हो, ग़म कोसो दूर हो जाते हैं
दिल के सुर्ख़ दरिया में, चमकते नूर को पाते हैं

तुम्हारी खुशबू का हर इक क़तरा, मेरी साँसों में बहता है
संग तुम्हारे वक़्त बिताने का सपना, मेरी आँखों में रहता है

वही आँखें, जो कई बरसों से सोई नहीं हैं 
वही आँखें, जो एक अर्से से रोई नहीं हैं

वक़्त हो गर तुम्हारे पास, थोड़ा देना मुझे
मेरा वक़्त तो कब से, रूठा हुआ है मुझसे

तभी तो गुज़रता ही नहीं, ये बस गुज़र जाता है
मगर जब तुम्हें देखता हूँ, ये वहीँ ठहर जाता है

जहाँ बिछुड़ते वक़्त हमने, कुछ वादे किये थे खुद से
लगता है उन्हीं वादों को पूरा करने आयी हो फिर से

अंदाज़ भी वही है, आवाज़ भी वही है
ऐ अजनबी, तेरा एहसास भी वही है…

 

“बणी-ठणी” (भारतीय चित्रकला की किशनगढ़ शैली)

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ह केवल एक चित्र नहीं, संपूर्ण जीवन शैली है
बणी-ठणी की बात निराली, सौंदर्य की सहेली है

किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह के काल में इसका उद्भव हुआ
राजपूताना की राधा कहलायी, और अजयमेरु का गौरव बढ़ा

प्रेयसी के प्रेम में मग्न होकर, महाराज नागरीदास कहलाये
मुसव्विर निहालचंद की कूची से, उसके कई पोट्रैट बनवाये

विख्यात आर्टिस्ट एरिक डिक्सन की, जब इस पर नज़र पड़ी
ऐसी नायाब पेंटिंग को उन्होंने, भारत की मोनालिसा संज्ञा दी

1755 ईस्वी में, इस चित्रशैली का विकास हुआ
देखने वालों को हर बार, नया एक एहसास हुआ

चेहरा और क़द लंबा, तथा नाक नुकीली रहती है
टकटकी बाँधे देखो इसे, यह तस्वीर बात करती है

बैकग्राउंड में इसके तालाब और, तैरती हुई नौकाएं हैं
थोड़ी मासूमियत थोड़ी नज़ाक़त, थोड़ी शोख अदाएं हैं

एक बार जो शख़्स इस बेनज़ीर तस्वीर को देख लेता है
दिल-ओ-दिमाग़ पे उसके, गज़ब का ख़ुमार छा जाता है

पलक झपकते ही, सुनहरे दौर में ले जाती है
यह वो तस्वीर है, जो आँखों से मुस्कुराती है

प्रेम की परिभाषा, सरल शब्दों में बताती है
रूप की मधुशाला, यह नैनों से छलकाती है

ऐसा अद्भुत आकर्षण है, के बताया ना जा सके
दिव्य आभा वो दर्पण है, जो छुपाया ना जा सके

किशनगढ़ का नाम, सारे जग में मशहूर किया
कलाप्रेमियों ने इसे, हाँ नाम हुस्न की हूर दिया

1973 में भारत सरकार ने, एक डाक टिकट जारी किया
बणी-ठणी कलाकृति को, जगत के ज़हन पर तारी किया

यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, मुकम्मल इतिहास है
दीदार करते ही जिसका, होता मखमली एहसास है।

#RockShayar
#ObjectOrientedPoems(OOPs)

 

“ख़ूबसूरत ही नहीं ख़ूबसीरत हो तुम”

ख़ूबसूरत ही नहीं ख़ूबसीरत हो तुम
दिल से की गई नेक नीयत हो तुम

हज़ार बार देखकर भी जिसे जी नहीं भरता हेै, 
पलकें झुकाने को कभी ये दिल नहीं करता है
नज़रों की नज़ाक़त भरी फ़िरदौस सी फ़ज़ीलत हो तुम

तारीफ़ नहीं हक़ीक़त है ये, चाहे मानो या ना मानो
फ़ुर्सत से की गई खुशनुमा वक़्त की वसीयत हो तुम

बेमिसाल कहूं के बेहिसाब, या बेपनाह या बेनज़ीर
अदा ना कर पाऊं जिसे, हाँ वही क़ीमत हो तुम

तुम्हारी बात करना अच्छा लगता है, 
तुम्हें याद करना सच्चा लगता है
निगाहों ने दिल को दी है जो, नेकदिल वो नसीहत हो तुम

सोचकर ही जिसे खुशी को भी खुशी मिलती है 
सुनो ना जानाँ, इस बेरंग ज़िंदगी की ज़ीनत हो तुम

मोहब्बत हो गई है तुमसे, अब और क्या कहूं मेैं खुद से
मासूमियत की मूरत हो जैसे सादगी की सीरत हो तुम।

 

“हर जगह तुम्हारी मौज़ूदगी का एहसास होता है”

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हर जगह तुम्हारी मौज़ूदगी का एहसास होता है
हर बार यह एहसास पहले से बहुत ही ख़ास होता है

इसी एहसास के दम पर तो इतना खुश रह पाता हूँ
हालाँकि हाल-ए-दिल तुमसे कभी नहीं कह पाता हूँ

कभी-कभी तो तुम मेरे ख़यालों में इतने क़रीब आ जाती हो
के तुम्हें देखने के लिए नज़रों का नया ताना बुनना पड़ता है

उसी दरमियाँ तुम कुछ ऐसा कर जाती हो
के बाद उसके मुझको बहुत याद आती हो

याद का भी ये कैसा अजब दस्तूर है
कम नहीं होता कभी, इश्क़ वो फ़ितूर है

फ़ितूर ने ही तो दर्द सहने की सलाहियत पैदा की है 
वरना हम तो दिल की तरह कब के टूट चुके होते

वैसे टूटा तो बहुत कुछ हैं अंदर
बस बताने और जताने को लफ़्ज़ नहीं हैं अंदर

गर लफ़्ज़ मिल भी जाये कोई
तो साथ अब वो शख़्स नहीं है

हर घड़ी जिसके आस-पास होने का एहसास होता है
हर बार यह एहसास पहले से बहुत ही ख़ास होता है।

 

“खुद अपनी ही मौत की अफ़वाह फैलाई हमने”

खुद अपनी ही मौत की अफ़वाह फैलाई हमने
दुश्मनों से भी दोस्ती निभाई हमने

पता ना चल जाएं कहीं तुम सबको
इसीलिए तो पहचान छुपाई हमने

सुना है के मोहब्बत और जंग में सब ज़ायज़ है
सही सुना है, तभी तो फ़तह पाई हमने

दर्द की सर्द हवाओं से राहत पाने की ख़ातिर
खुद अपने ही घर को आग लगाई हमने

एक रोज़ जब साये ने भी साथ छोड़ दिया
खुद से यारी निभाने की क़सम खाई हमने

पढ़ सको तो पढ़ो कभी इन पथराई आँखों के पन्ने
सब कुछ खोकर दुबारा ज़िंदगी पाई हमने

साज़िश बारिश रंज़िश ख़्वाहिश, क्या क्या नहीं देखा इरफ़ान
काग़ज़ को अपनी हर इक दास्तान सुनाई हमने।

 

“आज भी जब तुम्हारी याद आती है”

आज भी जब तुम्हारी याद आती है
आँखों से नींदें कोसो दूर चली जाती हैं
सपनो की दुनिया खुद एक सपना बन जाती है
बावरे मन को सांवरे की हर इक अदा लुभाती है
आज भी जब तुम्हारी याद आती है 
नैनों से यादें खुदबखुद बाहर आ जाती हैं…

तुम्हारे जाने के बाद बहुत दिनों तक मैं रोता ही रहा
तुम्हें खोने के बाद महीनों तक खुद को खोता ही रहा
तुम्हारे संग बिताये लम्हों की खुशबू पास बुलाती हैं
न देखे जो दिल ने कभी, ऐसे हसीं नज़ारे दिखाती हैं
आज भी जब तुम्हारी याद आती है
सीने से सब साँसें उफनकर बाहर आ जाती हैं…

तुमने कभी ग़ौर फ़रमाया हम क्यों मिले थे
धीमी-धीमी आंच में अंदर तक क्यों जले थे
क्यों ज़िंदगी तुम पे अपना हक़ जताती है
बंजर में बारिश का वो मंज़र दिखाती हैं
आज भी जब तुम्हारी याद आती है 
लबों पे ख़ामोशी क़ायम हो जाती हैं
आज भी जब तुम्हारी याद आती है
आँखों से नींदें कोसो दूर चली जाती हैं…

 

“बरसों बाद बंजर में जैसे, बरसती हुई बारिश लगती हो”

बरसों बाद बंजर में जैसे, बरसती हुई बारिश लगती हो
रोशनी की चादर ओढ़े, तुम तो कोई महविश लगती हो

सालों इबादत करते रहे, ख़ूब दुआएं मांगते रहे
रब ने पूरी की है जो, हाँ वही फ़र्माइश लगती हो

ना पूरा होना चाहती हो, ना अधूरा रहना चाहती हो 
सदियों से दिल में पल रही, तुम तो कोई ख़्वाहिश लगती हो

बेनज़ीर ओ मेरे माशूक मीर, चलाती हो तुम तो नज़रों के तीर 
पहली ही नज़र में हूर जैसे, हुस्न की पैमाइश लगती हो

पास रहती हो जानाँ जब तक, चलती रहती हैं साँसें तब तक
दूर जाते ही तुम तो जैसे, दर्द की आज़्माइश लगती हो

एक एक करके जगाती हो, दिल के सोये अरमां सभी
सालों से सीने में दबे हुए, एहसास की आराइश लगती हो

लापता जब से पता तुम्हारा, इतना ही पता चला ‘इरफ़ान’
अधूरा रहना क़िस्मत है जिसकी, हाँ वही गुज़ारिश लगती हो।

महविश – चाँद सा चेहरा 
पैमाइश – मापना
आराइश – सजावट

 

“दरमियाँ हमारे कुछ तो था”

ना तुमने कुछ कहा, ना मैने कुछ कहा
फिर भी न जाने क्यों, दरमियाँ हमारे कुछ तो था

यह अलग बात है कि तुम्हें अनजान बनने की अदा आती है
लेकिन मेरा क्या? मुझे तो तुम्हारे बिन साँसें भी नहीं सुहाती हैं

इतना आसां नहीं होता है, आसानी से किसी को भूल जाना
बहुत मुश्किल होता है, मिटती हुई उन यादों को रोक पाना

वक़्त की आँधी को भला क्या ख़बर, मेरे हाल-ए-दिल की
उसे तो संग जो भी मिले, संग अपने बस उड़ा ले जाना है

काश…वक़्त के पहियों में भी जंग लग पाता
कभी तो वो भी दो पल के लिए कहीं थम जाते

बस….उन्ही दो पलों में हम वो सारी अधूरी बातें कर लेते
जो उस आख़िरी मुलाक़ात में अधूरी रह गयी थी

जिस रोज़ ना तुमने कुछ कहा था, ना मैंने कुछ कहा था
फिर भी न जाने क्यों उस रोज़, काफी कुछ ऐसा हुआ था

जिसे बयां करने को एक अर्से से लफ़्ज़ तलाश रहा हूँ
क्योंकि जज़्बात तो मेरे लिए अब वो ख़्वाब बन चुके हैं

जो ख़्वाब में भी भूले भटके नज़र नहीं आते
गर नज़र आ भी जाये तो महसूस नहीं होते

बस इतनी इल्तिज़ा है तुमसे
एक बार आकर मुझे मेरा वो हिस्सा लौटा दो

जिसके बिन जीना मेरा अब वो जीना नहीं रहा
जिसके बिन मैं अब वो पहले वाला मैं नहीं रहा।

 

“सब याद है मुझे”

वो तेरा काँधे पे ज़ुल्फ़ें बिखेरना
वो तेरा सीने में साँसें समेटना
वो तेरा झुकी नज़रों से देखना
कुछ भी तो नहीं भूला मैं अब तक
सब याद है मुझे, सब याद है मुझे।

वो तेरा लबों पर लब रख देना
वो तेरा आँखों से सब कह देना
वो तेरा पलकों पे ख़्वाब सहेजना
कुछ भी तो नहीं भूला मैं अब तक
सब याद है मुझे, सब याद है मुझे।

वो तेरे नाम का असर
वो तेरे साथ का सफ़र
वो तेरे साये का शज़र
कुछ भी तो नहीं भूला मैं अब तक
सब याद है मुझे, सब याद है मुझे।

वो तेरा दूर चले जाना
वो तेरा नज़र न आना
वो तेरा मुझे भूल जाना
कुछ भी तो नहीं भूला मैं अब तक
सब याद है मुझे, सब याद है मुझे।

“तुम्हारा दूर चले जाना दिल को बहुत अखरता है”

तुम्हारा दूर चले जाना दिल को बहुत अखरता है
तुम्हारी याद में यह दिल मेरा तड़पता है

पिछली दफ़ा कहना भूल गया था तुमसे
के हद से ज्यादा मोहब्बत करता हूँ तुमसे
 
तुम चाहे बेख़बर रहो इस बात से
कितना याद करता हूँ तुम्हें? पूछो कभी बरसात से

बाहें खोलकर बारिश को आगोश में भर लेता हूँ
जिस रोज़ बेचैनी हद से ज्यादा सताने लगती है

तुम्हारी तस्वीर का ताना बुन रखा है
निगाहों के भीतर छुपे उस फ़नकार ने

जो अश्क़ों की गीली ज़मीं पर फिसल जाता है
और हर बार उठकर फिर चलने लग जाता है

तुम्हारा नज़र न आना नज़रों को बहुत अखरता है
दोबारा मिलने की आस में दिल यह मेरा धड़कता है

पिछली बार कहना भूल गया था तुमसे
के रूह बनकर तुम समायी हो मुझमें
हाँ रूह बनकर तुम समायी हो मुझमें।

“प्याज की तरह है क़िरदार मेरा”

प्याज की तरह है क़िरदार मेरा
परत दर परत खुलता ही जाता है
और आखिर में सब ख़त्म हो जाता है

याद रखना, मुझे काटते वक़्त तुम भी बहुत रोओगे
किश्तों में हुई मेरी बर्बादी पर तुम भी आंसू बहाओगे

ना सस्ता है, ना महंगा है
वज़ूद मेरा उड़ता पतंगा है

प्याज की तरह है क़िरदार मेरा
परत दर परत जिसमें कई राज़ दफ़्न हैं
जिन्हें जानने के लिए खुद से नाराज़ होना पड़ता है

ज़रा संभलकर छूना मुझे, मैं हर जगह अपनी गंध छोड़ देता हूँ
हो तक़दीर का तूफ़ान या लम्हों की लू, मैं सबका तिलिस्म तोड़ देता हूँ

प्याज की तरह है क़िरदार मेरा
परत दर परत खुलता ही जाता है
और आखिर में कुछ भी नहीं बचता है

बाक़ी रह जाती है तो बस वही खुशबू
जो ज़िन्दगी के मुँह से हर वक़्त आती रहती है।

#RockShayar

***तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो***

तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो
पल भर में उसी ज़माने में ले जाती हो
ज़ुल्फ़ों को उसी तरह काँधे पर गिराती हो 
पलकों को उसी तरह आँखों पर सजाती हो
लबों से उसी तरह मोती बरसाती हो
साँसों से उसी तरह फ़िज़ाएं महकाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो
पल भर में उसी ज़माने में ले जाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो।

मानो या न मानो, हूबहू उसी तरह मुस्कुराती हो
जानो या न जानो, रूबरू उसी तरह शर्माती हो 
मिलो या न मिलो, खुशबू उसी तरह फैलाती हो
दिखो या न दिखो, आरज़ू उसी तरह बन जाती हो
आँखें बंद करते ही यूं नज़र आती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो
पल भर में बीते ज़माने में ले जाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो।

हर मुलाक़ात में ठीक उसी तरह सताती हो
हर बरसात में ठीक उसी तरह भिगाती हो
हर लम्हात में ठीक उसी तरह ठहर जाती हो
हर जज़्बात में ठीक उसी तरह नज़र आती हो
दफ़्न हो चुके दिल के वो सब अरमां जगाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो
पल भर में गुज़रे ज़माने में ले जाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो।

अक्सर उसी तरह, हिज़ाब से अपना चेहरा छुपाती हो 
अक्सर उसी तरह, तसव्वुर पे तुम बंदिश लगाती हो
अक्सर उसी तरह, बेनज़ीर सी वो बातें बताती हो 
अक्सर उसी तरह ,तन्हाई भरी रातें दे जाती हो
पल भर के लिए ही सही, ज़िंदा कर जाती हो 
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो
पल भर में उसी ज़माने में ले जाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो
तुम मुझे किसी की याद दिलाती हो।।