“ना पाने की ख़्वाहिश है, ना खोने का डर”

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ना पाने की ख़्वाहिश है, ना खोने का डर
ख़त्म हो जायेगा जो, है ज़िंदगी वो सफ़र
 
सफ़र में अक्सर, हवाओं से बात करता हूँ
तन्हा राहों पर, ख़ुद से मुलाक़ात करता हूँ
 
एक मुलाक़ात में सौ मुलाक़ातें छुपी होती हैं
कुछ रेशमी तो कुछ खुरदुरी सी बातें होती हैं
 
बातों का क्या हैं, बातें तो बस लफ़्ज़ों का लहज़ा है
असल तो उन बातों में बसा यादों का हसीं हिस्सा है
 
वही हिस्सा, जिसे याद करके ख़ुद याद भी मुस्कुरा उठती है
वही लहज़ा, जिसे पहनके सहमी हुई रूह भी जगमगा उठती है
 
सहमी हुई इस रूह को, जगमगाये हुए एक अर्सा गुज़र चुका है
जुड़े तो आख़िर कैसे जुड़े? ये दिल कई क़तरों में बिखर चुका है
 
हर एक क़तरे में, वक़्त का गुमशुदा अक़्स नज़र आता है
नज़रों का सफ़र, हर बार उसी जगह आकर ठहर जाता है
 
जिस जगह से सफ़र शुरू किया था, दोबारा वही आना हुआ
ख़ुद को खोया जब पूरी तरह, तब जाकर ख़ुद को पाना हुआ
 
ना हासिल करने की आरज़ू है, ना खोने का कोई ख़ौफ़
भर जायेगा एक रोज़ दिल जिससे, है ज़िंदगी वो शौक।
 
#RockShayar

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