“ना पाने की ख़्वाहिश है, ना खोने का डर”

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ना पाने की ख़्वाहिश है, ना खोने का डर
ख़त्म हो जायेगा जो, है ज़िंदगी वो सफ़र
 
सफ़र में अक्सर, हवाओं से बात करता हूँ
तन्हा राहों पर, ख़ुद से मुलाक़ात करता हूँ
 
एक मुलाक़ात में सौ मुलाक़ातें छुपी होती हैं
कुछ रेशमी तो कुछ खुरदुरी सी बातें होती हैं
 
बातों का क्या हैं, बातें तो बस लफ़्ज़ों का लहज़ा है
असल तो उन बातों में बसा यादों का हसीं हिस्सा है
 
वही हिस्सा, जिसे याद करके ख़ुद याद भी मुस्कुरा उठती है
वही लहज़ा, जिसे पहनके सहमी हुई रूह भी जगमगा उठती है
 
सहमी हुई इस रूह को, जगमगाये हुए एक अर्सा गुज़र चुका है
जुड़े तो आख़िर कैसे जुड़े? ये दिल कई क़तरों में बिखर चुका है
 
हर एक क़तरे में, वक़्त का गुमशुदा अक़्स नज़र आता है
नज़रों का सफ़र, हर बार उसी जगह आकर ठहर जाता है
 
जिस जगह से सफ़र शुरू किया था, दोबारा वही आना हुआ
ख़ुद को खोया जब पूरी तरह, तब जाकर ख़ुद को पाना हुआ
 
ना हासिल करने की आरज़ू है, ना खोने का कोई ख़ौफ़
भर जायेगा एक रोज़ दिल जिससे, है ज़िंदगी वो शौक।
 
#RockShayar

“तब तुम्हें देखता हूँ मैं”

तुम जब कहीं और देखती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं
यूं जब अपनी ज़ुल्फ़ें झटकती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं

उस एक पल में खो जाता हूँ
उस एक पल में तुम्हारा हो जाता हूँ
तुम जब मुझको ऐसे पल देती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं

तुम्हारे चेहरे का नेकदिल नूर
आँखों में साफ़ झलकता है
तुम जब हिज़ाब में चेहरा छुपाती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं

मेरी नींदें उड़ाकर तुमने अपनी पलकों पर सजा ली
तभी तो जानाँ
तुम जब नींद में अपनी पलकें बंद करती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं

बहुत कोशिश करता हूँ
धुंधली हो चुकी उन यादों को फिर से ज़िंदा करने की
मगर तुम जब यादों में नज़र नहीं आती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं

मोहब्बत तुम्हें भी है मुझे भी है
ये छुपाये कहाँ छुपती है?
तुम जब धीरे से शरमाकर अपना मुंह छुपाती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं

वैसे तो तुम्हारा पता 
अब लापता हो चुका है
पर फिर भी जब तुम भूले भटके मेरे ख़्वाबों में आती हो
तब तुम्हें देखता हूँ मैं।

 
 
 

“पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गयी”

 

पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गयी
जब एक लम्हें ने दिल पर दस्तक दी
बहुत देर तक मैं उस लम्हें को यूँही देखता रहा
यक़ीन को भी यक़ीन होने में बहुत वक़्त लगा

उस लम्हें ने वक़्त की पोटली से कुछ किस्से निकाले
और रख दिए सब के सब यूं मेरे सामने 
न मुझे सोचने का मौका मिला, न समझने का वक़्त
एक बार तो मैं भी हैरान रह गया
वक़्त की इस बेवक़्त मेहरबानी से

हालाँकि यादों के एक बवंडर ने मुझे अपने साथ उड़ाने की बहुत कोशिश की
मगर मैंने भी दिल की ज़मीन पर फैली चट्टानों को कसकर पकड़ रखा था

इसी कशमकश में न जाने कब वक़्त गुज़र गया, पता ही नहीं चला
पता तो तब चला, जब उस वक़्त का नाम गुज़रा हुआ वक़्त निकला

बेशक इस बार भी मैंने उस लम्हें को पकड़ने की बहुत कोशिश की
मगर हर बार की तरह इस बार भी हाथों पर अश्क़ों की नमी जमी थी
तभी तो इस बार भी वो लम्हा मुट्ठी से फिसल गया
जिस लम्हें को पकड़ने की कोशिश में मैं वहीँ थम गया 
और बाक़ी तो बस इन आँखों में यादों का मंज़र रह गया।

 
 
 
 


			

When a writer losing his cell phone, it’s happens….

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दोस्तों, यह कहानी है भूत काल बन चुके मेरे उस mobile की
life के memory card से delete हो चुकी एक फाइल की

सफ़र में उसका साथ बस इतना ही लिखा था
हाथों में उसका हाथ बस इतना ही लिखा था

हुआ यूँ, के पानी में गिरकर mobile मेरा मरहूम हो गया
गुज़रे चार सालों का flashback suddenly ज़ूम हो गया

इस story की शुरुआत, मुश्किल वाले दौर में उसकी grand entry से हुई थी
मोहब्बत वाले महीने में मेरी मुलाक़ात, एक रोज़ samsung S3 से हुई थी

उसके करिश्माई Cymera की मदद से मैंने कई हसीन लम्हें संजोये थे
उसकी stylish सेल्फियों से नज़रे चुराकर पलकों के परदे भिगोये थे

चलते-चलते music player ठिठक जाता था
बीच-बीच में अक्सर गाना अटक जाता था

पीठ पर मुहाज़िर बन चुके माज़ी की तस्वीर बनी हुई थी
color note में ज़िन्दगी की तमाम तहरीर लिखी हुई थी

अभी के लिए बस इतना ही, और ज्यादा कुछ नहीं कहना है
फ़िलहाल तो बस कुछ दिनों तक बिना सेलफोन ही रहना है

देखते हैं, इस बार कौनसा नया स्वचालित दूरभाष यंत्र आता है 
जो मनमौजी microwaves के ज़रिये, साड्डा मन बहलाता है।

 
 
 

“घर जाने की सूरत बदल गई”

पहले खुश होकर जाता था
अब नाखुश होकर जाता हूँ

कहने को घर अब भी वही है मेरा
बस घर जाने की सूरत बदल गई

घर के आंगन से साज़िशों की बू आती हैं
घर की दीवारें रंज़िशों का पता बताती हैं

घर का हर दर अपनों के सितम का गवाह है
घर में रहने वाले घर की बर्बादी की वज़ह है

पहले घर जाने के बहाने ढूंढता था
अब घर न जाने के बहाने ढूंढता हूँ

कहने को घर अब भी वही है मेरा
बस घर जाने की नीयत बदल गई

घर के बंद कमरों में ज़िंदगी सिसकती है
घर के तंग कोनों में दग़ाबाज़ी झलकती है

घर की बुनियाद में सदियों से धोखा पल रहा है
उसी ज़हर का असर है जो यह दिल जल रहा है

पहले घर से दूर जाने से डरता था
अब घर के पास आने से डरता हूँ

कहने को घर अब भी वही है मेरा
बस घर जाने की हसरत बदल गई।

“बेरोज़गार यादें”

काम की तलाश में बेरोज़गार यादें भटक रही हैं
ज़ेहन के दफ्तर में कहीं कोई वेकेंसी नहीं हैं
 
सोच का पुराना सिस्टम आजकल अपग्रेड हो चुका है
एहसास का एप भी तो कब का ऑउटडेटैड हो चुका है
 
अब तो बस फ्लैशबैक फ़ितूर का ही सहारा है
अरमानों का एम्प्लीफायर कब से शोर मचा रहा है
 
जाॅब की तलाश में बेरोज़गार यादें भटक रही हैं
ब्रेन को दिल की बदतमीज़ बातें खटक रही हैं
 
इश्क़ करने का अंदाज़ आजकल मोनोलिथिक हो चुका है
ज़िंदगी जीने का अंदाज़ भी तो अब रोबोटिक हो चुका है
 
ख़्वाहिशों को सप्रेस करना पड़ता है
और खुद ही को इंप्रेस करना पड़ता है
 
यादों का कम्युनिकेशन स्किल सही नहीं है
तभी तो लफ़्ज़ों में इमोशंस एन थ्रिल नहीं है
 
पर कोई बात नहीं नादान नाॅस्टेलजिक जज़्बात ही सही
थाॅट की बाॅट पर सवार होकर पहुंच जाएंगे कहीं न कहीं।
 
 
 
 
 
 
 

“लगता है जैसे धूप की परछाई है”

कौन है वो, कहाँ से आई है
लगता है जैसे धूप की परछाई है
 
उम्र का असर ज़रा भी नहीं झलकता है
बातों में उसकी एक अल्हड़पन छलकता है
 
कई तज़ुर्बे हासिल किये, फिर भी खुद को नादान समझती है
ना जाने क्यूँ वो हर शख़्स को अपनी तरह इंसान समझती है
 
दग़ाबाज़ दुनिया ने उसे बेतहाशा लूटा है
तभी तो किरदार उसका खुद से ही रूठा है
 
नीर की तरह बेसबब बस बहती रहती है
औरों का ख्याल करके खुद प्यासी रहती है
 
बंदिशों में बंधी हुयी है, फिर भी खुद में आज़ाद घूमती है
दिल की दबी दुनिया को यह काग़ज़ पर आबाद करती है
 
पलकों पर अपनों के सपनों का बोझा लिए चल रही है
बाहर खुश लगती है पर अंदर कहीं न कहीं जल रही है
 
कौन है वो, कहाँ से आई है
लगता है जैसे आँखों की अंगड़ाई है।

“तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की लहराती लट जब भी चेहरे पे गिरती है”

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की लहराती लट जब भी चेहरे पे गिरती है
सीने में छुपे मेरे मासूम दिल पे ये ज़िंदगी मेहरबां होती है
 
कानों के चमकते हुए झुमके तुम्हारी हँसी की तरह यूँ खनकते हैं
गालों के गुलाबी गुलाब एहसास की ओंस में भीगे हुए से लगते हैं
 
तुम्हारे सुर्ख़ लबों से होते हुए लफ़्ज़ सीधे दिल में उतर जाते हैं
तुम्हारे चेहरे को देखते ही बादल बेमौसम बारिश बन जाते हैं
 
तुम्हारी नज़ाकत भरी नज़रों का नज़राना जब पेश होता है
ठीक उसी वक्त यह दिल अपना चैन-ओ-सुकूं सब खोता है
 
तुम्हारी तस्वीर जब देखता हूँ आँखों में कई तस्वीरें क़ैद हो जाती हैं
वही तस्वीरें जिनके तकिये का सहारा लेकर ये तन्हाई सो पाती हैं
 
तुम्हारी दिलकश आवाज़ में अलहदा अंदाज़ समाया है
ख़ामोशी को बोलना भी तो आखिर इसी ने सिखाया है
 
तुम्हें याद करते ही चेहरे पर रौनक आ जाती है
रंजिशों से परेशान रूह को राहत मिल जाती है
 
इस गुलपोश गुफ़्तगू में कुछ बातें अनकही रह गई
जिन्हें समझने के लिये जज़्बात की ज़बान ज़रूरी है।