“कल तुम्हारे चेहरे से मिलता हुआ एक चेहरा देखा”

 

कल तुम्हारे चेहरे से मिलता हुआ एक चेहरा देखा
जिसने आँखों से सीधे दिल में उतरने की कोशिश की
ऐसा लगा जैसे उस कोशिश को कामयाब बनाने के लिये 
सारी कायनात ने कोशिश की
कोशिशों की इस कड़ी में, यादों का नाम भी जुड़ गया
यादों में छुपा था जो, वो नाम आँखों से ज़ाहिर हो गया
वक़्त ने इस बार बेवक़्त कैसे मेहरबानी कर दी?
पलकों की छाव तले दिल के आँगन में, मेहमान की मेज़बानी कर दी
जिसे मेहमान समझ रहा है ये दिल, वो कौन है आख़िर?
इसी कशमकश में ज़ेहन तसव्वुर के ताले खोल रहा हैं
बरसों पहले जो शख़्स, संग अपने इनकी चाबियां ले गया था
शायद आज उसी का अक्स, वो चाबियां लौटाने आया है दोबारा
और दिल को ये वहम है कि वो शख़्स यहाँ रहने आ गया है दोबारा 
वहम की यह बेरहम बयानी नज़रों में साफ़ दिख रही हैं
जो अब भी एक अजनबी अक्स में वो शख़्स ढूँढ रही हैं
जिसे देखते ही इन्हें अपने होने का यक़ीन होता था
कल तुम्हारे चेहरे से मिलता एक चेहरा देखा
जिसने आँखों से सीधे दिल में उतरने की कोशिश की
ऐसा लगा जैसे उस कोशिश को अंज़ाम देने के लिये 
सारी कायनात ने कोशिश की

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