“तुमसे ज्यादा तुम्हारे क़रीब हूँ देखो ज़रा”

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अँधेरे मेरे लेकर मुझको उजाले देती हो
सीने के दरमियाँ धड़कन बनके बहती हो।
 
तुमसे ज्यादा तुम्हारे क़रीब हूँ देखो ज़रा
और तुम हो के दूरियों के हवाले देती हो।।

“कल मैंने तुम्हे फिर से याद किया”

कल मैंने तुम्हे फिर से याद किया
चंद हसीं लम्हों को खुद में आबाद किया
वक़्त के एक पुराने हिस्से को सोच से आज़ाद किया
हिजाब से ढकी उन आँखों को हज़ार बार याद किया
कल मैंने तुम्हें फिर से याद किया...

तुम नहीं थी, सो तुम्हारी तस्वीर पर ही हाथ फेर लिया
यक़ीन मानो ! यह एहसास तुमको छूने की तरह ही था

कुछ बीती बातें, बहुत ही ज्यादा याद आयी
कुछ गीली यादें, पलकों के रस्ते बाहर आयी

कल मैंने तुम्हे फिर से याद किया
चंद हसीं लम्हों को खुद में आबाद किया
वक़्त के एक पुराने हिस्से को सोच से आज़ाद किया
हिजाब से ढकी उन आँखों को हज़ार बार याद किया
कल मैंने तुम्हें फिर से याद किया

तुम्हारी आवाज़ में क़ैद उसी एक गाने के बोल सुनता रहता हूँ
जिसे अक्सर तुम बहती हुयी नदी की तरह गुनगुनाया करती थी

उसी धुन पर मैंने भी एक गाना लिखा है
लेकिन उसे गुनगुना नहीं पाता हूँ
क्योंकि उसे गाते हुए तुम्हारी याद बहुत आती है

कल मैंने तुम्हे फिर से याद किया
चंद हसीं लम्हों को खुद में आबाद किया
वक़्त के एक पुराने हिस्से को सोच से आज़ाद किया
हिजाब से ढकी उन आँखों को हज़ार बार याद किया
कल मैंने तुम्हें फिर से याद किया
कल मैंने तुम्हें दिल से याद किया।

 

“कुछ यादें बस याद की जाती हैं”

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हमारा मिलना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, वक़्त का लंबा इंतज़ार था 
एक ऐसा इंतज़ार, मुक़द्दर में जिसके बस इंतज़ार था

तुम समझने की कोशिश करती रही, हर दफ़ा इस बात को
मैं मिटाने की कोशिश करता रहा, अपने अंदर जज़्बात को

मगर पलकों पर जमी कुछ बूंदों ने, सब कुछ बता दिया 
दिल की गहराई में छुपा दिल का राज़, आँखों ने जता दिया

हमारे मिलने पर बारिश का होना, एक इशारा था 
इशारा उस आसमान का, ज़मीं को जिसने संवारा था

कायनात की वो ख़ुशी भी, बादल बनके बरसती थी
घटाओं के संग-संग हवाओं की चूड़ियाँ खनकती थी

याद है तुम्हें! दर्द का वो ठिठुरता हुआ सर्द मौसम
जिसे हमने सुलगती हुई साँसों के सहारे गुज़ारा था

हमारा बिछुड़ना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, वक़्त की गहरी साज़िश थी
एक ऐसी साज़िश, जिसका मक़सद हम दोनों की आज़माइश थी

तुम भुलाने की कोशिश करती रही, हर एक याद को
मैं लिखने की कोशिश करता रहा, हर एक जज़्बात को

मगर..कुछ यादें ना भुलाई जाती हैं, ना लिखी जाती हैं
कुछ यादें बस याद की जाती हैं, कुछ यादें बस याद की जाती हैं।

 

“तुझे याद करना ज़ख़्मों पर मरहम की तरह लगता है”

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तुझे याद करना ज़ख़्मों पर मरहम की तरह लगता है
मुझको तेरा चेहरा दिल की क़लम की तरह लगता है

सब कुछ बयां कर देता है, फिर भी कुछ रह जाता है
नज़रों का नज़राना ज़ेहन को वहम की तरह लगता है

बहुत चलना है अभी तो, मुसाफ़िर है तू बहुत दूर का
तभी तुझे तेरा सफ़र किसी हमदम की तरह लगता है

न जाने किस बात पर, नाराज़ बैठी है ज़िंदगी हमसे
खुशियोंभरा हरइक लम्हा इसे किसी ग़म की तरह लगता है

कानों में जब भी पड़ती है, सदाएं गूँजती हैं हर तरफ़
तेरी आवाज़ में हर अल्फ़ाज़ किसी सरगम की तरह लगता है

कौन था मैं, कौन हूँ मैं, और कौन बनने जा रहा हूँ मैं?
तक़दीर का यह तमाशा वक़्त के हसीं सितम की तरह लगता है

सब कुछ भीग जाता हैं, ख़यालों की बेनज़ीर बारिश में
मुझको तेरा एहसास सावन के मौसम की तरह लगता है।

“कल तुम्हारे चेहरे से मिलता हुआ एक चेहरा देखा”

 

कल तुम्हारे चेहरे से मिलता हुआ एक चेहरा देखा
जिसने आँखों से सीधे दिल में उतरने की कोशिश की
ऐसा लगा जैसे उस कोशिश को कामयाब बनाने के लिये 
सारी कायनात ने कोशिश की
कोशिशों की इस कड़ी में, यादों का नाम भी जुड़ गया
यादों में छुपा था जो, वो नाम आँखों से ज़ाहिर हो गया
वक़्त ने इस बार बेवक़्त कैसे मेहरबानी कर दी?
पलकों की छाव तले दिल के आँगन में, मेहमान की मेज़बानी कर दी
जिसे मेहमान समझ रहा है ये दिल, वो कौन है आख़िर?
इसी कशमकश में ज़ेहन तसव्वुर के ताले खोल रहा हैं
बरसों पहले जो शख़्स, संग अपने इनकी चाबियां ले गया था
शायद आज उसी का अक्स, वो चाबियां लौटाने आया है दोबारा
और दिल को ये वहम है कि वो शख़्स यहाँ रहने आ गया है दोबारा 
वहम की यह बेरहम बयानी नज़रों में साफ़ दिख रही हैं
जो अब भी एक अजनबी अक्स में वो शख़्स ढूँढ रही हैं
जिसे देखते ही इन्हें अपने होने का यक़ीन होता था
कल तुम्हारे चेहरे से मिलता एक चेहरा देखा
जिसने आँखों से सीधे दिल में उतरने की कोशिश की
ऐसा लगा जैसे उस कोशिश को अंज़ाम देने के लिये 
सारी कायनात ने कोशिश की