“तेरी भीगी हुई ज़ुल्फ़ों की लट”

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तेरी भीगी हुई ज़ुल्फ़ों की लट
जब भी मेरे चेहरे पर गिरती है

माथे की शिकन, आँखों की थकन 
पलभर में गायब हो जाती है

इस राज़ को समझने को कोशिश करना
ज़हन की नासमझी की एक निशानी है

इस एहसास को अपनी बाँहों में भरना
दिल की तिश्नगी की बेनज़ीर बयानी है

तेरी घनी ज़ुल्फ़ें तसव्वुर का साया बन जाती हैं
धूप से महफूज़ रखती हैं, ये छाया बन जाती हैं

इस अंदाज़ को सीखने की कोशिश करना 
दिमाग़ की नादानी की एक निशानी है

इस एहसास को महसूस करना
दिल की दिलकश खुशनुमा ज़िंदगानी है

तेरे गीले-गीले गेसुओं की घटा,
जब भी मेरे चेहरे पर बरसती है

माथे की शिकन, पलकों की थकन
पलभर में छू मंतर हो जाती है।

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