“तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे संभालकर रखे हैं मैंने”

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
संभालकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
गिर ना जाये वो कहीं
संग उन ख़्वाबों को लेकर
जो देखे हैं हमने साथ में
जो महकते हैं मुलाक़ात में
जो बरसते हैं बरसात में
जो रहते हैं जज़्बात में
जो बसते हैं हर साँस में

इन क़तरों में रुख़्सत के वो पल नज़र आते हैं
जिन पलों में कुछ भी नज़र नहीं आता है
सिवाय फिर मिलने की आस के
अधूरी एक प्यास के
अलविदा एहसास के
आँखों की अरदास के

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
सहेजकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
बह ना जाये वो कहीं
संग उन लम्हों को लेकर
जिनमें हरघड़ी तू मेरे साथ है
जिनमें हरपल तू मेरे पास है।

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