“प्यास लगती तो है मगर कभी बुझती नहीं”

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प्यास लगती तो है मगर कभी बुझती नहीं
बूँदें बनती तो हैं मगर कभी टपकती नहीं।

ये कैसा मुक़द्दर है ज़िंदगी के मौसम का
बारिश होती तो है मगर कभी भिगोती नहीं।।

“मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया”

दिल में उठता है हर रोज़ एक तूफान नया
मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया।

रातभर आँखें जागकर काम करती रहती हैं
तब तामीर होता है ख़्वाबों का एक जहान नया।।

“दिल में क्या है, ज़िंदगी कभी बताती नहीं”

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जहां जताना हो, वहां प्यार जताती नहीं
दिल में क्या है, ज़िंदगी कभी बताती नहीं

एक अर्से तक दिल ने बहुत अंधेरा देखा है
रौशनी से दूरी ज्यादा देर अब सुहाती नहीं

छीलकर रख देती है, दर्द की बेदर्द बयार
रूह को वक़्त की यही फ़ितरत भाती नहीं

हर सफ़र की हमसफ़र हैं, और गवाह भी
मेरी नज़रें मुझसे कभी कुछ छुपाती नहीं

तू क्या गई, सावन भी संग अपने ले गई 
बारिश में भी बारिश आजकल आती नहीं

कई दहलीज़ें लांघ चुका हैं, मन मेरा ये बंजारा
डर की दहलीज़, दरमियान अब आती नहीं

आईना देखा, तो मालूम चला तिलिस्म यह
तेरे बिना तो मुस्कुराहट भी मुस्कुराती नहीं।

“तेरा ख़याल जब भी आता है, मायूस दिल मेरा मुस्कुराता है”

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तेरा ख़याल जब भी आता है, मायूस दिल मेरा मुस्कुराता है
दिल के बिखरे हुए टुकड़ें फिर से जोड़ने को दिल चाहता है

ज़ेहन का ज़ेहन भी, ख़ालीपन से कुछ इस क़दर बेचैन हो चला है
के जिस राह पे काँटें बिछे हो उसी राह पे चलने को दिल चाहता है

ग़ज़ाला की तरह हैं आँखें तेरी, इन पे ग़ज़ल लिखने को दिल चाहता है
क्या जादू हैं इनमें क्या तिलिस्म, इन्हें दिल से पढ़ने को दिल चाहता है

दिल-ए-नादान का हर एक भरम, टूट गया सफ़र के दौरान 
जो ना किया दिल ने अब तक वही करने को दिल चाहता है

रुख़्सत के वक़्त मुझ पर तेरी, कशिश हावी होने लगती है
जाते हुये तुझे बार-बार पलटकर देखने को दिल चाहता है

और कोई हसरत बाक़ी नहीं हैं, और कोई चाहत बाक़ी नहीं हैं 
बस एक ज़िंदगी की ख़ातिर दोबारा जीने को दिल चाहता है

गर्दिशे दौराँ का असर है, या फिर कोई और बात है इरफ़ान 
अपने लिये बनाया हर एक उसूल अब तोड़ने को दिल चाहता है।

“एक सफ़र से मुलाक़ात हुई”

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कई दिनों के बाद आख़िर एक सफ़र से मुलाक़ात हुई
सफ़र नया था, मगर मंज़िल वही थी
जहां कई बरस पहले वक़्त गुज़ार चुका हूँ मैं
आँखों ने कई बदलाव फौरन पहचान लिए
लेकिन ये आँखें अंदर चल रहे बदलाव को लेकर 
अनजान बनने का नाटक करती हैं
आजकल ये आँखें आईने देखते हुये 
किसी और का अक्स दिखाने लग गई हैं

सफ़र में संग नया एक दोस्त भी था 
जिसे देखकर ऐसा लगा मानो ये मैं ही हूँ
बस उम्र का एक फ़ासला दरमियाँ आ गया है

उस दोस्त ने मेरी कई तस्वीरें भी ली
जिन्हें देखकर मुझे अपने अंदर का खालीपन साफ़ नज़र आने लगा
वो पुराना क़िला और इमारतें 
जिन्हें रंग रोगन से नया दिखाने की कोशिश की गई है
मेरी ये तस्वीरें भी कुछ वैसी ही लग रही हैं

दस साल हो चुके हैं, मगर वक़्त अब भी वहीं ठहरा हुआ है
क़िले के चारों ओर बने ऊँचे परकोटे की तरह 
मैंने भी अपने चारों ओर एक परकोटा बना लिया है
जिस पर चढ़कर खुद को महफूज़ रखने का दावा 
आजकल बड़ा ही खोखला सा लगता है

किसी वज़ह से क़िले का दरवाज़ा बंद था
शायद इसीलिये हम वो जगह देख पाये
जहां आमतौर पर कोई नहीं आता जाता है
ठीक वैसे ही अपने दिल का दरवाज़ा बंद करके 
मैंने कई अनजान सफ़र तय किये हैं
अक्सर इस तरह के सफ़र मंज़िल से आज़ाद होते हैं
कई दिनों के बाद आख़िर एक सफ़र की सौगात हुई।

“मैं खुद से ज्यादा आईने में किसी और को निहारता हूँ”

मक़सद को पाने की ख़ातिर, ग़ुर्बत में दिन गुज़ारता हूँ
आग किसने लगाई घर किसने जलाया, सब जानता हूँ।

न जाने किसका तिलिस्म है, जो अब तक नहीं उतरा
मैं खुद से ज्यादा आईने में किसी और को निहारता हूँ।।

 

“बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा”

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बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, भिगोकर जाती हो

सीने में समा जाती हैं बौछार तुम्हारी
नज़रों में बसी है तस्वीर यार तुम्हारी

ज़ुल्फ़ की घनेरी घटाएं धूप से बचाती हैं
आँखों की सुनहरी अदाएं आईना बन जाती है

हवा की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, छूकर जाती हो

तूफ़ान अपने अंदर छुपाकर प्यार से सहलाती हो
कभी उफनता सागर तो कभी लहर बन जाती हो

दिल के बेचैन बवंडर को पलभर में थाम लेती हो
गगन की नीली बाहों में यूँ पवन बनकर बहती हो

बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, तर करके जाती हो

साँसों में समा जाती है फुहार तुम्हारी
पलकों पे सजी है तस्वीर यार तुम्हारी

टपकती बूँदें फिर से ज़िंदा कर देती हैं
आँखें मूँदें मुझको ये जीना सिखाती हैं

बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, भिगोकर जाती हो।

“इन आँखों ने कई मंज़र देखे हैं, ज़रा संभलकर पढ़ना इन्हें”

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इन आँखों ने कई मंज़र देखे हैं
ज़रा संभलकर पढ़ना इन्हें

अश्क़ों की ओट में, अनगिनत अधूरे अरमान छुपे हैं
पलकों के पर्दों के पीछे, बीते लम्हों के बयान छुपे हैं

कहीं पे बंजर मैदान हैं, तो कहीं पे खंजर के निशान हैं
नज़रों का नज़ाक़ती नूर, दरअसल एक हूर का एहसान हैं

वो जिसकी तस्वीर, तसव्वुर की निगाहों में हैं
वो जिसकी एक झलक, पलकों की पनाहों में हैं

वो जिसका एहसास, हर साँस में समाया है
वो जिसका अंदाज़, मेरे वज़ूद में नुमायां है

वो जिसका चेहरा, आँखों में है ठहरा
वो जिसका रिश्ता, यादों से है गहरा

वो जिसको भुलाने में, ये ज़िन्दगी गुज़र गयी
वो जिसकी तलाश में, ये ज़िन्दगी ठहर गयी

वो जिसका मुझे अब भी इंतज़ार है
वो जिस पर मुझे अब भी ऐतबार है

वो जिसका ख़्वाब हर शब देखती हैं निगाहें
वो जिसका हिजाब हरदम ढूँढती हैं ये बाहें

वो जिसके अलावा, और कोई नहीं है इनमें
वो जिसके अलावा, और कोई नहीं है दिल में

इन आँखों ने कई समंदर बहाये हैं
ज़रा संभलकर दाख़िल होना इनमें।

“मुझको दीदार तेरा, दर्द की रिहाई लगती है”

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धूप में चलता हूँ तो तेरी परछाई बनती है
सूरज की किरणें तेरी अंगड़ाई लगती है

कुदरती है एहसास तेरा, ज़िंदगी है अंदाज़ तेरा
सर्दियों में सुबह की धुंध, तेरी जम्हाई लगती है

हर तरफ ठिठुरता हुआ समा, जाड़ों में काँप रहा है जहां 
गुनगुनी धूप की दस्तक, तेरी रजाई लगती है

ज़ुल्फ़ों के झुरमुट से, झांकता हुआ चेहरा कुछ कहता है
मुझको दीदार तेरा, दर्द की रिहाई लगती है

मर्ज़-ए-मोहब्बत का इलाज है तू, मेरे दिल की आवाज़ है तू
जब भी देखता हूँ, आँखें तेरी दवाई लगती है

बेनज़ीर सी वो बातें, हर जगह ढूंढता है दिल ये
ग़म की ग़मज़दा बातें, दिल को अब परायी लगती है

वक़्त के क़दम फिसल जाते हैं, ज्योंही आगे बढ़ते हैं
ज़हन की झील में यादें तेरी, जमी हुयी काई लगती है

धूप में निकलता हूँ तो तेरी परछाई बनती है
रौशनी अब चुभती नहीं, तेरी अंगड़ाई लगती है

 

“तुम्हारे जाने के बाद वहीं ठहर गया मैं”

 

तुम्हारे जाने के बाद वहीं ठहर गया मैं
उस एक पल को अलविदा ना कह पाया मैं

बहुत मेहनत करनी पड़ी इस दिल को
अपने आप को यह यक़ीन दिलाने में

के तुम तो जा चुकी हो, उस एक पल में मीलों दूर 
मगर दिल का क्या है, दिल तो ठहरा दिल आख़िर

यह उस एक पल की ख़ातिर, कई कल क़ुर्बान कर दे
और अगर ज़िद पर आ जाये, तो हर मुश्किल आसान कर दे

जाते वक़्त तुम्हारी खुशबू ने बहुत बेचैन किया मुझे
तुम तो चली गयी, मगर यह वहीँ पर ठहर गयी

मैंने तुम्हारी खुशबू का एक हिस्सा, यादों में सहेजकर रख लिया
डर था मुझको बस यही, तुम्हारी तरह यह भी ना खो जाये कहीं
 
तुम्हारे साये का पीछा करते हुए, राह में कई साये मिले
कुछ ऐसे साये, रास्तों से ज्यादा जिन्हें मंज़िल प्यारी थी

तुम्हारे जाने के बाद वहीँ थम गया मैं
ना लबों से ना दिल से अलविदा कह पाया मैं।

“तेरी भीगी हुई ज़ुल्फ़ों की लट”

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तेरी भीगी हुई ज़ुल्फ़ों की लट
जब भी मेरे चेहरे पर गिरती है

माथे की शिकन, आँखों की थकन 
पलभर में गायब हो जाती है

इस राज़ को समझने को कोशिश करना
ज़हन की नासमझी की एक निशानी है

इस एहसास को अपनी बाँहों में भरना
दिल की तिश्नगी की बेनज़ीर बयानी है

तेरी घनी ज़ुल्फ़ें तसव्वुर का साया बन जाती हैं
धूप से महफूज़ रखती हैं, ये छाया बन जाती हैं

इस अंदाज़ को सीखने की कोशिश करना 
दिमाग़ की नादानी की एक निशानी है

इस एहसास को महसूस करना
दिल की दिलकश खुशनुमा ज़िंदगानी है

तेरे गीले-गीले गेसुओं की घटा,
जब भी मेरे चेहरे पर बरसती है

माथे की शिकन, पलकों की थकन
पलभर में छू मंतर हो जाती है।

“गैरों के लिए अपना और अपने लिए पराया बन गया”

साये का पीछा करते-करते खुद एक साया बन गया
अपनी छाया पीछे छोड़कर किसी और की छाया बन गया

सफ़र की दर बदर दास्तान, हमसे ना पूछो इरफ़ान
गैरों के लिए अपना और अपने लिए पराया बन गया।


 

“तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे संभालकर रखे हैं मैंने”

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
संभालकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
गिर ना जाये वो कहीं
संग उन ख़्वाबों को लेकर
जो देखे हैं हमने साथ में
जो महकते हैं मुलाक़ात में
जो बरसते हैं बरसात में
जो रहते हैं जज़्बात में
जो बसते हैं हर साँस में

इन क़तरों में रुख़्सत के वो पल नज़र आते हैं
जिन पलों में कुछ भी नज़र नहीं आता है
सिवाय फिर मिलने की आस के
अधूरी एक प्यास के
अलविदा एहसास के
आँखों की अरदास के

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
सहेजकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
बह ना जाये वो कहीं
संग उन लम्हों को लेकर
जिनमें हरघड़ी तू मेरे साथ है
जिनमें हरपल तू मेरे पास है।

“सोच को अमल में लाने की कोशिश करता हूँ”

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सोच को अमल में लाने की कोशिश करता हूँ
मैं खुद को खोकर खुद को पाने की कोशिश करता हूँ

दुनिया तो तोहमते लगाती आयी हैं, लगाती रहेगी
मैं टूटने से पहले हर रिश्ते को निभाने की कोशिश करता हूँ

मुद्दत से सफ़र में हूँ, थकने लगे हैं पैर आजकल
मैं थके हुए पैरों को फिर से चलाने की कोशिश करता हूँ

जब तक परवाह करता हूँ, बेपरवाह होकर करता हूँ
मैं नाराज़ होकर अक्सर हक़ जताने की कोशिश करता हूँ

वक़्त का तूफ़ान आकर, बिखेरता है जब भी मुझे
मैं धीरे-धीरे फिर से अपने क़दम जमाने की कोशिश करता हूँ

वज़ूद को चट्टान बनाकर, रहना उसमें बहुत मुश्किल है
मैं बेदर्द बन चुके दर्द को पिघलाने की कोशिश करता हूँ

लफ़्ज़ों से मेरा रिश्ता, लफ़्ज़ों में बयां नहीं हो सकता
मैं क्या सोचता हूँ बस यही बताने की कोशिश करता हूँ।

“मैं ठहरा लफ़्फ़ाज़ी लौहार, वज़्नी हर्फ़ के हथौड़े चलाता हूँ”

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काग़ज़ के कोरे-कोरे मैदान पर, अक़्ल के घोड़े दौड़ाता हूँ
मैं ठहरा लफ़्फ़ाज़ी लौहार, वज़्नी हर्फ़ के हथौड़े चलाता हूँ

साँसों की धौंकनी अंदर की आग को भड़काती है
एहसास की रौशनी अनदेखा सा कुछ दिखाती है

आहों से निकलता धुआँ नज़र नहीं आता है
यादों का पिघलता लोहा पल में जम जाता है

ना जाने कौनसी शक़्ल इख़्तियार करेगा, इसे भी नहीं पता
यह किस औज़ार की नस्ल तैयार करेगा, इसे भी नहीं पता

तपिश और वर्ज़िश के चलते, ज़हन भी थक जाता है
ख़लिश और गर्दिश के चलते, धूल से ये ढक जाता है

मेहनतकश मन के लिये ख़ुराक़ हैं ख़याल
सेहतमंद सोच के लिये क़िताब हैं ख़याल

दर्द की भट्टी में आँच तेज़ करते वक़्त, ये हाथ जल जाते हैं
क़लम की धार को तेज़ करते वक़्त, नर्म जज़्बात छिल जाते हैं

तसव्वुर के तारीक़ तहखाने में, हक़ीक़त के शोले भड़काता हूँ
मैं ठहरा लफ़्फ़ाज़ी लौहार, वज़्नी हर्फ़ के हथौड़े चलाता हूँ।

“रात को जब भी हवायें चलती हैं”

रात को जब भी हवायें चलती हैं
तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है

ये हवायें मुझको अपने साथ ले जाती हैं
बादलों के पार आसमान की सैर कराती हैं

मैं किसी परिंदे सा उड़ने लगता हूँ
मन के गगन की ऊँचाई छूने लगता हूँ

ये बादल रूई के ढेर जैसे लगते हैं
तुझको छूते ही बरसने लगते हैं

मैं प्यासी ज़मीन सा टपकते लम्हों की राह देखता हूँ
बस एक क़तरे की आस में पल-पल तरसता हूँ

क़तरा भी वो जो रूह को तर कर दे
लम्हा भी वो जो शाम को सहर कर दे

रात को जब भी हवायें चलती हैं
तुम्हारे मन की मुस्कुराहट दिखाई देती है

ये हवायें मुझको अपने साथ ले जाती हैं
बादलों के पार ख़्वाबों का इक नया जहां दिखाती हैं

रातभर यादों का वास्ता देकर नींद को जगाती हैं
ख़ामोशी में रूपोश है जो, वो आवाज़ देकर तुम्हें बुलाती हैं।