“चलते रहना ही ज़िंदगी है”

 

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हर तरफ घना कोहरा है
कुछ भी नज़र नहीं आ रहा है

ऐसे वक़्त में आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है
लेकिन मुश्किल के ठीक आगे खड़ी मंज़िल है

धीरे-धीरे क़दमों को आगे बढ़ाना है
धुंध में चलने का एक यही सलीक़ा है

जब कुछ भी नज़र ना आये
तब चलते रहना ही बेहतर है

कई बार वक़्त को भी वक़्त लगता है
नूर का दरख़्त बनने में, धुंध छटने में

जब सोचने-समझने की आदत काम ना आये
तब क़दमों के चलने की आदत ही काम आती है

कोहरे का असर ज्यादा देर नहीं रहता है
रौशनी के आते ही यह गायब हो जाता है

धुंध में एक बात सीखी है
चलते रहना ही ज़िंदगी है।

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