“मनचाहा सफ़र”

अपनी ही धुन पर नाच रहा है ये मन
मनचाही डगर पर चल पड़ा है ये मन

रास्ते का नाश्ता ले लिया है
नाश्ते में रास्ता खा लिया है

तभी तो पैरों को थकान महसूस नहीं हो रही
उल्टा ये तो अब पहले से तेज़ चलने लगे हैं

चल भी रहे हैं या उड़ रहे हैं
रास्तों से रिश्ते दिल के जुड़ रहे हैं

मंज़िल दूर से ही इन्हें तक रही है
इंतज़ार में खड़ी-खड़ी थक रही है

मंज़िल को जिन रास्तों से रश्क़ है
दिल को उन्हीं रास्तों से इश्क़ है

देखते है ये बाज़ी कौन जीतता है
सबसे पहले वहाँ कौन पहुँचता है

जहाँ से फिर एक नया सफ़र शुरू हो जायेगा
पिछले सफ़र के किस्से ये वाला सफ़र सुनायेगा।