“चट्टानों की तरह है वुज़ूद मेरा, लहरों की तरह है वुज़ूद तेरा”

चट्टानों की तरह है वुज़ूद मेरा
लहरों की तरह है वुज़ूद तेरा।

खुश्क़ सहराओं से कोसों दूर
समंदर किनारे अपना बसेरा।

चट्टानों पर खड़ी होकर खुद को निहारती हो
पानी को आईना बनाकर जुल्फ़ें संवारती हो।

चट्टानों की फ़ितरत हैं पथरीला बन जाना
लहरों की तो आदत हैं सब बहा ले जाना।

चट्टानों पर खड़ी होकर दरिया-ए-दिल देखती हो
पानी को स्याही समझकर हाल-ए-दिल लिखती हो।

चट्टानों की किस्मत हैं लहरों के मुस्लसल थपेड़ें सहना
लहरों की तो हसरत हैं चट्टानों के माथे पर बोसा लेना।

चट्टानों के पास आती हो और फिर दूर निकल जाती हो
पानी को हथेलियों में भरकर खुद को महसूस करती हो।

चट्टानों की चाहत हैं लहरों को ठहरना सिखाना
लहरों की तो आदत हैं चट्टानों से रोज टकराना।

चट्टानों पर खड़ी होकर जाने क्या सोचती हो
पानी को ख़त समझकर गीले पन्ने पलटती हो।

चट्टानों की फ़ितरत हैं लहरों को साहिल पर ही रोक देना
लहरों की तो आदत हैं चट्टानों को छूकर फिर लौट जाना।

चट्टानों की मोहब्बत हैं लहरें
लहरों की तो चाहत हैं चट्टानें।

एक दूसरे के बिना, किसी समंदर को न जाने ये दोनों
एक दूसरे से मिलकर, लगे हैं समंदर को पाने ये दोनों।

चट्टानों की तरह है वज़ूद मेरा
लहरों की तरह है वज़ूद तेरा।

इस बार जब मुलाक़ात होगी
दिल के साहिल पर होगा सवेरा।।

-राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

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