“अगर मैं तुमसे ये कहूँ”

अगर मैं तुमसे ये कहूँ
के तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो
तो इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है
मुझे तो सनम संग तुम्हारे ही रहना है।

रहने को या कहने को तो हम दोनों तन्हा हैं
फिर भी साथ-साथ हर जगह हर लम्हा हैं
मेरा हर लफ़्ज़ तुम्हारी खुशबू से वाकिफ़ हैं
तुम्हारा हर लम्स मेरी आरज़ू के काबिल हैं।

अगर मैं तुमसे ये कहूँ
के तुम मुझे बहुत सच्ची लगती हो
तो इस बात पर तुम्हारा क्या कहना है
मुझे तो रोज़ आता तुम्हारा ही सपना है।

सपने में तुम और भी हसीन लगती हो
चाँदनी में नहाई हुई नाज़नीन लगती हो
ख़ामोशी की चादर ओढ़े हुये हैं लब तुम्हारे
नैनों के वो ढ़ेरों ख़त पढ़े हुये हैं सब तुम्हारे।

अगर मैं तुमसे ये कहूँ
के तुम मुझे बहुत प्यारी लगती हो
तो इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है
मुझे तो सनम साथ तुम्हारा ही देना है।

साथ देने और साथ रहने में बहुत फर्क़ है
ज़िंदगी का क्या है, ये ज़िंदगी तो बेदर्द है
एहसास को तलाश के तराजू में ना तोलो
गर महसूस करो तो एहसास ही हमदर्द है।

अगर मैं तुमसे ये कहूँ
के तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो
तो इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है
मुझे तो बेबाक संग तुम्हारे ही बहना है।

बहते-बहते जाने जहां, कहाँ आ गये हैं हम
नील समंदर फैला जहाँ, वहाँ आ गये हैं हम
एक आहट है जो सुकून-ओ-राहत देती है
दिल ने दस्तक देकर सब मिटा दिये हैं ग़म।

अगर मैं तुमसे ये कहूँ
के तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो
तो इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है
मुझे तो सनम संग तुम्हारे ही रहना है
मेरे दिल का फ़क़त तुमसे यह कहना है
मुझे तो सनम संग तुम्हारे ही जीना है।।

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