“तारों की दुनिया”

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तारों की दुनिया देखी है कभी !
तारों की दुनिया देखना चाहोगे !

तो चलो फिर आज हम, तारों की उस दुनिया में चले
हैं जहाँ पे तारें ही तारें, अपनी अलग एक दुनिया लिये।

तारों का अपना एक वज़ूद होता हैं
इन्हें सूरज की ज़रूरत नहीं
सूरज तो खुद इनकी बिरादरी का
एक छोटा सा हिस्सा है।

सूरज की ज़रूरत तो चाँद को है
सूरज से मोहब्बत तो चाँद को है।

सूरज दिनभर खुद को ऐसे जलाता है
जैसे कोई आशिक इश्क़ में खुद को मिटाता है।

और फिर ये रश्क़-ए-क़मर
जिसे चाँद कहो या माहताब
रातभर सूरज की दिनभर की तपिश को
ठंडक में कुछ इस तरह तब्दील करता है
जैसे कोई महबूबा अपने थकेहारे महबूब को
नर्म बाहों के दरमियाँ सुकून और राहत देती है।

सुना है कि तारें ज़मीन से बहुत दूर होते हैं
इतनी दूर
के खुद दूरी को भी अपने पास होने का एहसास होता है।

तारों का अपना कोई घर नहीं
इसलिये तो आँखों में बसते हैं।

चाँद को तो ज़रूर इनसे जलन होती होगी ना!
तभी तो अंदर ही अंदर बस कुढ़ता रहता है
सोच सोचकर देखो !
पेशानी पर कितने गड्ढे पड़ गये हैं।

तारों में मद्धम रौशनी की सरसराहट होती है
कभी टिमटिमाहट तो कभी जगमगाहट होती है।

लोग कहते हैं कि लोग मरकर एक तारा बन जाते हैं
यानी फिर कभी नहीं मरने लोग ही तारा कहलाते हैं।

तारें वो हैं जो खुद रौशनी बिखेरते हैं
तारें वो हैं जो तन्हा स्पेस में तैरते हैं।

तारों का अपना एक वज़ूद होता हैं
इन्हें सूरज की ज़रूरत नहीं
सूरज तो खुद इनकी फैमिली का
एक छोटा सा हिस्सा है।

हालाँकि सूरज ने बहुत कोशिश की
खुद को जलाने की
लेकिन आखिर में वो भी बस एक तारा ही निकला
खुद से दूर, सबसे दूर
इस जहां से मीलों दूर
पूरी कायनात की आँखों का तारा।

तो बताओ फिर
कैसी लगी तारों की दुनिया
अपने जैसी
या कोई और ही दुनिया।।

@राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान⁠⁠⁠⁠

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