“बहती हुयी हवाएँ, बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं”

दिल से निकली दुआएँ,
बारिश की बूँदें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं
सुबह की उजली सदाएँ,
सूरज की किरनें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

बहती हुयी हवाएँ,
बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं
काली घनी घटाएँ,
सावन में सीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

एहसास की निगाहें,
अश्क़ों की आरामगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं
दिल में दबी वो आहें,
रंजो-ग़म की पनाहगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बादल की खुली बाहें,
आसमान की पेशानी चूमने ज़मीं पर उतर आती हैं
शायर की सभी आहें,
क़लम से रोज कहानी सुनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

फ़ुर्कत भरी फ़िज़ाएँ,
अल्हड़ सी अंगड़ाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं
चाँद की रौशन अदाएँ,
संग रात की तन्हाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

आँसुओं से नम निगाहें,
पलकों के गीले पर्दे को छूने ज़मीं पर उतर आती हैं
राह चलती वो राहें,
खुद से किये वादे पूरे करने ज़मीं पर उतर आती हैं।

दर्द-ए-दिल की सज़ाएँ,
अपने रब की बंदगी करने ज़मीं पर उतर आती हैं
और बदले में नेक वफ़ाएँ,
ज़िंदगी की तस्वीर बदलने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बेज़ुबान सी बेनज़ीर ये निगाहें,
जब किसी को याद करे तो इनमें नमी उतर आती हैं
ठीक उसी वक़्त, वक़्त की हवाएँ,
ओस की बूँदें बनकर दिल की ज़मीं पर उतर जाती हैं।।

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