“जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर”

जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर
ख़ानाबदोश का कहीं कोई, नहीं होता है घर।
 
जिस्म के जाली लिबास में, यह रूह छटपटाती है
उड़ने के लिए डर की ऊँची, छत पर फड़फड़ाती है।
 
इंतक़ाम की दहकती आग में, झुलस रही है ये ज़िंदगी
अपनी आँखों से देखी है इसने, अपने साथ हुई दरिंदगी।
 
खेल कौन शुरू करता है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है
बाज़ीगर तो बस आपकी, कमज़ोर चाल को पकड़ता है।
 
क़ायदे-क़ानून सिर्फ, कहने सुनने में अच्छे लगते हैं
जो आपके अपने हैं, सबसे पहले आपको वही ठगते हैं।
 
अपने अनोखे तरकश में, कई तीर छुपा रखे हैं उसने
जख़्मी सीने पर, दुश्मन के नाम खुदा रखे हैं उसने।
 
मक़सद मिल जाए जिसे, फिर उसके लिए क्या आराम
जुनूनी के लिए तो कभी भी, नामुमकिन नहीं कोई काम।
 
वक़्त की क़द्र करना सीख गया, वो शख़्स आख़िर
जीने से पहले मरना सीख गया, वो शख़्स आख़िर।।
 
 

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