“मुझको बातें तुम्हारी सच्ची लगती हैं “

 

चुभती तो है मगर अच्छी लगती हैं
मुझको बातें तुम्हारी सच्ची लगती हैं

दर्द की बरसती हुई बारिश में अक्सर
घर जाने की राहें सब कच्ची लगती हैं

ज़िन्दगी जब खुश होती है कभी तो
मासूम जैसे कोई बच्ची लगती है

तुम साथ हो फिर भी ना जाने क्यों
दिल को ये तन्हाई अच्छी लगती है।

“चायनुमा चाहतों के किस्से”

चायनुमा चाहतों के किस्से भी कितने अजीब हैं
चीनी जिनमें के ना कम होनी चाहिए, ना ज्यादा

दिल के बागानों में चाय पत्ती उग आती है
तोड़ने में जिसको, सारी उम्र बीत जाती है

एहसास की अदरक जब अच्छे से कुटती है
मटमैला अर्क़ लिए वो सफेद रूह में घुलती है

यादों के चूल्हे पर, ख़्वाहिशों की केटली में
हसरतें उबलती रहती हैं, मन की पोटली में

इश्क़ की वो इलायची, जब कभी मिल जाए
पीने वालों का तो फिर, चेहरा ही खिल जाए

ख़ामोशी का कप जब लरज़ते लबों को चूमता है
सर्द सुबह में पीकर फिर चाय, ये दिल झूमता है

ज़िन्दगी के सिरदर्द का, पुख़्ता इलाज है चाय
चुटकी में बनाकर मूड, नींद को कर देती है बाय

चायनुमा चाहतों के किस्से भी कितने अजीब हैं
चीनी जिनमें के ना कम होनी चाहिए, ना ज्यादा ।

“कभी कभी सोचता हूँ कि ठहर जाऊं”

कभी कभी सोचता हूँ कि ठहर जाऊं
तुम्हारे एहसास को छूकर संवर जाऊं

मगर ये अब मुमकिन कहाँ है जानाँ
पता नहीं हमें संग कहाँ तक है जाना

मन्ज़िल तो रूठी हुई है कब से
और रास्ते भी छूटे हुए हैं तब से

अपने ही कदमों के निशां, कहीं मिलते नहीं है
नज़रों के चेहरे भी तो, आजकल खिलते नहीं है

सीने में तुमने अपने, कई दर्द छुपाएं हैं
उसी दर्द की, मुझ पर भी कुछ अताएं हैं

आवारा एक झोंका हूँ, रुकना कहाँ नसीब में
छूना चाहो गर मुझे तो, गुज़रो कभी करीब से

समंदर किनारे बैठा करो, कुछ देर बस यूँही
लहरों की शक्ल में, छूकर तुम्हें लौट जाऊंगा

कभी कभी चाहता हूँ कि ठहर जाऊं
तुम्हारे एहसास को पीकर निखर जाऊं ।।

“मय्यत पर इतना प्यार जताने वालों”

मय्यत पर इतना प्यार जताने वालों
कभी जीते जी भी थोड़ा प्यार जता दिया करो ।

हमसे तो सब पूछ लेते हो यूँ बातों ही बातों में
दिल में क्या है तुम्हारे, कभी हमें भी बता दिया करो ।।