“यक़ीन मानिए कुछ लोग कभी भी सुधरते नहीं”

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हादसों के बाद भी खुद को वो बदलते नहीं
यक़ीन मानिए कुछ लोग कभी भी सुधरते नहीं

एहसास जब भी होता है, मालूम तब ये चलता है
के मरते तो इन्सान हैं, एहसास कभी मरते नहीं

भर जाता होगा बेशक, वक़्त के साथ हर ज़ख्म
अपनों के दिए ज़ख्म तो इतनी जल्दी भरते नहीं

तलाशते हैं खुद को जो, खुदगर्ज़ कहलाते हैं वो
ख़ामोश रहते हैं अक्सर, बात ज्यादा करते नहीं

पीठ पीछे बुराई करना, और सामने बड़ाई करना
ऐसे नामुरादों की तो, परवाह हम भी करते नहीं

सुन लो ऐ दुश्मनों, चाहे जितना भी ज़ोर लगा लो
एक अल्लाह के अलावा हम किसी से डरते नहीं ।

क्या तुम अब भी मेरा ब्लॉग पढ़ती हो ?

क्या तुम्हें मैं याद हूँ अब भी
क्या तुम अब भी मेरा ब्लॉग पढ़ती हो ।

कहाँ रहती हो आजकल
किस शहर में
ना मेरे पास तुम्हारा पता है
ना कोई कॉन्टेक्ट नंबर
वो तो अच्छा हुआ कि
थोड़ा बहुत लिखना आ गया
वरना खुद को कैसे तसल्ली देता ।

जब भी तुम्हारी याद आती है
लिख बैठ जाता हूँ फौरन
आख़िर तुमने ही तो कहा था
अपने दिल की बातें
लिख दिया करो जनाब
मैं पढ़ा लिया करूंगी
जहाँ भी रहूंगी ।

एक अर्सा बीत गया है
ना मैं बदला हूँ
ना मेरी गुज़ारिश
आज भी हम दोनों वैसे के वैसे ही हैं
इसीलिए बस यहीं कहना चाहता हूँ
कि
क्या तुम्हें मैं याद हूँ अब भी
क्या तुम अब भी मेरी नज़्में पढ़ती हो ।।

RockShayar

“The Jungle Book”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

आओं बच्चों आज तुम्हें, मैं जंगल की सैर कराऊ
मोगली की कहानी से, तुम सबको रूबरू कराऊ

जंगल जंगल बात चली है, सुना तो होगा तुमने भी
टीवी पर हर संडे ये गीत, सुना तो होगा तुमने भी

लावारिस वो नंगा बच्चा, जो कि मोगली कहलाया
हज़ारों खतरे देकर उसे, कुदरत ने जीना सिखाया

माँ थी उसकी रक्षा, और बाप का नाम अकेला था
भेड़ियों के झुंड में वह, पल रहा इंसान अकेला था

यारों के वह यार, बल्लू के संग खूब मस्ती मचाता
मुसीबत से मगर हरदम, उसको बघीरा ही बचाता

एक था टाइगर बड़ा ही दुष्ट, नाम था उसका शेर ख़ान
मोगली के पिता का कातिल, नियत से था वो शैतान

कुदरती रिश्तों से बढ़कर रिश्ता नहीं कोई खून का
बरसों से नाशक रहा है मानव, जंगल के सुकून का

पेड़ों की शाखों पर वह, दिनभर उछल कूद मचाता
शाम को फिर लौटकर घर, ‘का’ के साथ ही आता

खुद के बनाए जुगाड़, बूमरेंग से ही वार करता था
अपने परिवार का वह, हर रोज इंतज़ार करता था

चलो बच्चों आज तुम्हें, मैं बचपन की सैर कराऊ
जंगल बुक के पन्नों से, तुम सबको रूबरू कराऊ

– RockShayar

“ज़िन्दगी के बदलते हुए रंग”

ज़िन्दगी हर रोज नये रंग बदलती है
उन्ही बदलते रंगों के साथ
वक़्त भी बदल जाता है ।
और बदल जाता है वो नज़रिया
जो हमें हर चीज़ का एहसास दिलाता है ।
पहले जो डर डराता है बहुत
वहीं बाद में हँसाता है बहुत ।

अक्सर जिसे हम कल कहते है
दरअसल वो कल नहीं होता है
बल्कि हमारे आज का ही अक्स होता है
मन के शीशों में जो साफ़ नज़र आता है ।

लोग कहते है कि सब कितने बदल गए हैं
मगर वो खुद को नहीं देख पाते हैं कभी
क्योंकि मन के शीशों में
सिर्फ मन का ही अक्स दिखाई देता है
अनगिनत गहराइयों के राज़ छुपे हैं जिसमें
बदलते हुए रंगों की रंगत
चेहरे पर नज़र आ ही जाती है।

कोई खुश होकर भी खुश नहीं है
तो कोई उदास होकर भी खुश है।
पता नहीं खुशी का रंग ग़मों के रंग से
इतना क्यों हमराज़ होता है
कि जब एक आता है तो
दूसरा पीछे पीछे खिंचा चला आता है।

ज़िन्दगी हर रोज नये रंग बदलती है
उन्ही बदलते रंगों के साथ
हम भी बदल जाते हैं ।
कहने को तो बदलाव ही नियम है कुदरत का
पर अगर कोई बदलना ना चाहे
तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

इस बार खुद को इस तरह बदलना चाहता हूँ
कि फिर कभी कोई बदलाव मुमकिन ही ना हो ।।

– RockShayar

“इस बार तो ईद पर गले लगाओगे ना पापा”

इस बार तो ईद पर गले लगाओगे ना पापा
या हर बार की तरह जज़्बात छुपाओगे पापा

क्यों अपने दिल की बात नहीं कहते हो कभी
खुद में ही गुम अक्सर ख़ामोश रहते हो यूँही

वक़्त तो गुज़र रहा है, गुज़र जाएगा एक दिन
गुज़रा हुआ वक़्त बहुत याद आएगा एक दिन

परिवार टूट रहा है, हर शख़्स रूठ रहा है
अपनो से अपनो का साथ अब छूट रहा है

अपनी ज़रूरतों को मारकर हमारी ज़रूरतें पूरी करते हो
और औलाद के प्यार की खातिर ज़िन्दगी भर तरसते हो

बहुत हो चुका बस, अब और नहीं सहेंगे हम
जैसे रहते थे बचपन में, वैसे साथ रहेंगे हम

बच्चा हूँ आपका, तो आपसे ही तो कहूँगा ये सब
हर मुश्किल को जीतकर, नाम रौशन करूँगा अब

इस बार तो ईद पर गले लगाओगे ना पापा
या हर बार की तरह जज़्बात छुपाओगे पापा ।।

Irfan

“वो यार”

एक एक करके वो, यार सब चले गए
बीच सफ़र में कुछ यार अब मिले नए

अपने अपने दौर में सबने अपना साथ दिया
बिखरा मैं जब कभी तो सबने अपना हाथ दिया

किसी ने नखरे झेले मेरे, तो किसी ने झेली नादानी
यारों के संग बीते लम्हों की, है बस इतनी सी कहानी

शिकायतें हो वो कितनी भी, ना हुई नाराज़गी कभी
देखकर हाँ बेरुख़ी मेरी, ना हुई उन्हें हैरानगी कभी

हो चाय की वहीं वाली थड़ी, या हो ग़मों की झड़ी
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर, साथ है अपने यारी खड़ी

दर्द के वो सख़्त पल, या हो खुशी के हसीं लम्हें
गुज़र गया पर आज भी, याद आते हैं वहीं लम्हें

अपनी अपनी ज़िन्दगियों में, हैं सब मशगूल अब
रूठना मनाना मस्ती तकरार, हैं सब मक़्बूल अब

धीरे धीरे फिर, यार वो सब चले गए
बीच सफ़र में कुछ यार अब मिले नए ।।