“Maliqa-e-Firdaus”

फ़िरदौस से आई हो या उस ओर से
जहां बर्फीले पहाड़ आसमां को चूमते हैं
नदियाँ इठलाती हैं, और झरने झूमते हैं

वादी में जब कभी वो बर्फ पिघलती है
ज़िन्दगी मुस्कुराने को फिर मचलती है

हर सू जहां पर चिनार की खुशबू आती है
और हवाएँ मोहब्बत के गीत गुनगुनाती है

दरिया-ए-झेलम भी तुम्हारे संग बहता है
चाँदनी रातों में मन के किस्से कहता है

तेरे इश्क़ का कहवा मैं हर शब पीता हूँ
एक तसव्वुर के सहारे सदियाँ जीता हूँ

दहशतगर्दी भी तुझे बेशक बदल नहीं पाई है
नफ़रत की हवा तुझमें कभी पल नहीं पाई है

फ़िरदौस से आई हो या उस ओर से
जहां झील में दो शिकारे गुफ्तगू करते रहते हैं
फिर से हमारे मिलने की आरज़ू करते रहते हैं ।।

@RockShayar

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