“मोहब्बत का हलफ़नामा”

कई मर्तबा अपनी मोहब्बत का
हलफ़नामा पेश कर चुका हूँ
दिल की भरी अदालत में
मगर ये दिमागी वक़ील
हर बार वहीं जिरह करता है
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।

हालांकि कई गवाह भी बुलाए गए
मगर वो सब हालातों के डर के आगे
ऐन वक़्त पर मुकर गए ।

बेचारा दिल
हर बार यादों के कठघरे में
अकेला ही खड़ा रह जाता है
किसी मुज़रिम की तरह
पता नहीं कौनसी दफ़ा के तहत
मोहब्बत को जुर्म करार दिया गया है ।

मुझे पता नहीं था
कि तुम्हारे सूबे को एक ख़ास दर्जा मिला हुआ है
मुल्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन के तहत
सियासतदारों के लिए
जो चुनावी बिसात रहा है बरसों से ।

मोहब्बत करने से पहले
कौन इतना सोचता है
ये तो बस हो जाती है
गर सोचकर की जाए तो वो मोहब्बत नहीं
बल्कि सौदेबाजी कहलाएगी ।

अब जबकि जुर्म साबित हो चुका है
तो मुझे मुल्जिम की तरह ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी
इस बात का कोई ग़म नहीं है
बल्कि बेहद खुशी है कि तुम्हारे इश्क़ में सजायाफ्ता क़ैदी बन चुका हूँ मैं ।

“बेशक इश्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन में
कहीं कोई दफ़ा तीन सौ सत्तर नहीं होती है”

कई मर्तबा अपने फ़ितूर का
अहदनामा पेश कर चुका हूँ
हसरतों की भरी महफ़िल में
मगर ये हालातों का वक़ील
हर बार वहीं सवाल जवाब करता है रूह से
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।।

@RockShayar

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