“मिट्टी की कहानी”

पता नहीं ये मिट्टी किस मिट्टी की बनी है ।
इसे तो शायद अपना वज़ूद भी नहीं पता है
या फिर इसने जान बूझकर खुद को ऐसा बना लिया, के हर वज़ूद इसी से बनता चला गया ।

कहते है हम सब इंसान भी मिट्टी से बने हुए हैं ।
मगर ये मिट्टी हम इंसानों से कई दर्जा बेहतर है।
न इसे छल कपट आता है, न कोई चेहरे पर चेहरा लगाना । ये तो इतनी पाक और साफ है कि नमाज़ी को जब वुज़ू के लिए पानी नसीब न हो तो मिट्टी से ही पाकी हासिल करने (तयम्मुम करने) का हुक्म है । मिट्टी की सीरत आईने की तरह है । जो इसमें बोओगे तुम, वहीं काटोगे तुम । कोई मिलावट नहीं, न कोई फ़रेब की शिकायत ।
मिट्टी के इतने किरदार है कि खुद मिट्टी को भी नहीं पता ।
पानी से मिलकर शायद इसे इश्क़ हो जाता है अपने आप से । तभी तो वो खुशी छुपाए नहीं छुपती । कहीं पेड़ पौधों के रूप में, तो कहीं फसल और सब्जियों के रूप में लहलहाती है ।
धूप की चादर भी ज़रूरी है, सर्द हवाओं का आदर भी ज़रूरी है । बारिश की बूँदें इसे अच्छी लगती हैं, सूरज की रौशनी इसे सच्ची लगती है ।
हालातों के सफ़र में मिट्टी भी बदलती रहती है ।
कहीं रेत तो कहीं दलदल, कहीं खेत तो कहीं बंजर । अनगिनत रूप हैं इसके । मिट्टी से बने हुए घड़े हो चाहे इंसान, दोनों बनते बिगड़ते टूटते रहते हैं । पता नहीं इसे कौनसी जादूगरी आती है, नीम और आम दोनों को ये अपनी कोंख में एक साथ पालती है । और इसी से बने हैं हम इंसान सब । हमारे भीतर भी ज़िन्दगी भर कई इंसान पैदा और फ़ौत होते रहते हैं । पर जब वो आख़िरी घड़ी आती है, तब वो भीतर के सब इंसान एक होकर बन जाते हैं मिट्टी का एक ढ़हता हुआ ज़ज़ीरा । जिसे मौत का दरिया रफ़्ता रफ़्ता निगल जाता है । न जाने ये मौत किस मिट्टी की बनी है, जो हर जानदार मिट्टी के पुतले को पल भर में मिट्टी में बदल देती है । और उस आख़िरी मंज़िल क़ब्र में भी उसे आख़िर मिट्टी ही नसीब होती है । पता नहीं ये मिट्टी किस मिट्टी की बनी है ।

@rockshayar

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