“Late Tofan DaDi Maan” 12th April 2005…

बहुत याद आ रही है दादी, आज आपकी
ग्यारह साल गुज़र गए हैं
आपको गुज़रे हुए ।

अल्लाह आपको जन्नत नसीब करे ।

याद है न, आपको कितनी फिक्र होती थी मेरी
जब मुझे पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ा था ।
छुट्टियों में जब भी घर आता था
तो सबसे पहले आकर
आपको सलाम किया करता था ।
आप प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरती
माथे को चूमती, और ढ़ेरों दुआएं देती ।

दादी आप क्या गयी
घर का नक्शा ही बदल गया ।
पूरा परिवार, अलग अलग टुकड़ों में बँट गया है ।
सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं ।
हक़ीक़त में कोई किसी को जानता तक नहीं
बस बार-त्यौहार, मौत-मय्यत, शादी ब्याह पर
इकठ्ठा होकर
सब एक होने का दिखावा करते हैं।

वो तो मेरे साथ जब एक हादसा हुआ
तब कहीं जाकर, मुझे यह अहसास हुआ
कि मैं एक ऐसे कुनबे का छोटा हिस्सा हूँ
जहाँ सब अजनबी बनकर आराम से रह रहे हैं ।

किसी को किसी की असल खुशी से
कोई मतलब नहीं
सब बस नाम, रूतबा, और ओहदा देखकर ही
बर्ताव करते हैं ।
झूठी सहानुभूति तो इस तरह जताते है
कि जैसे उनसे बड़ा शुभचिंतक तो
और कोई है ही नहीं
मेरे लिए इस दुनिया में ।

दिल बहुत रोता है दादी, ये सब देखकर
आज अगर तुम होती
तो मुझे गले से लगाकर, जी भरकर रोने देती
और इन सबको खूब डाँट लगाती ।

अब मैं काफी बड़ा और समझदार हो गया हूँ
इसलिए, आज आपसे एक वादा करता हूँ दादी

“इस बिखरते हुए परिवार को
फिर से एक करने की
पूरी शिद्दत से कोशिश करूँगा”

बस मुझे आपकी दुआओं की ज़रूरत हैं ।

बहुत याद आ रही है दादी, आज आपकी
ग्यारह साल गुज़र गए हैं
आपको गुज़रे हुए ।
यहाँ आपकी कमी बहुत खलती है ।

अल्लाह आपको जन्नत नसीब करे
मग़फिरत अता फरमाएं

आमीन…

– आपका इफ़्फी (Iffy)

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