“हो सभी की जीत जिसमें ऐसे खेल की तलाश में हूँ”

हो सभी की जीत जिसमें ऐसे खेल की तलाश में हूँ
सौ दफ़ा गिरा हूँ फिर भी, उम्मीदों के आकाश में हूँ

मनमुटाव और नाराज़गी, ज्यादा दिन अच्छी नहीं
इस ज़िन्दगी में आवारगी, ज्यादा दिन अच्छी नहीं

जीने का हक़ सबको हैं, क्यों छीनते हो तुम ये हक़
चंद पलों की है ज़िन्दगी, क्यों करते हो इस पे शक

मन की बात मन में रखने से मन को ही नुकसान है
खुलकर बात नहीं करने से, खुद मन ही परेशान है

ये ज़रूरी तो नहीं, कि सबके ख्यालात एक से हो
ये ज़रूरी तो नहीं, कि सबके हालात एक से हो

आपस में मिल बैठकर, मुश्किलों का हल निकालो
मदद को न पुकारो, खुद को यहाँ खुद ही संभालो

कोई कुछ भी कहता रहे, परवाह नहीं है अब यहाँ
बेशक खुदगर्ज कहता रहे, हमराह है मेरा रब सदा

हमदम की नहीं फ़क़त, खुद अपनी ही तलाश में हूँ
सौ दफ़ा गिरा हूँ फिर भी, उम्मीदों के आकाश में हूँ

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