“मेरे दोस्त को जब उसका जुनून मिल गया”

उस रोज मुझे भी सीने में सुकून मिल गया,
मेरे दोस्त को जब उसका जुनून मिल गया ।

पहचान मिली जिस्म को, तब कहीं जाकर यहां
वतन की मिट्टी में जब मेरा ये ख़ून मिल गया ।

डरेगा कोई क्यों भला, जुर्म के अंजाम से यहाँ ?
कानून से बचने का जब उसे कानून मिल गया ।

प्यासे को पानी मिला, लिखू कैसे एहसास को ?
बाद मुद्दत के जैसे शायर को मज़्मून मिल गया ।

हर्फ़ बने वो हमदम मेरे, उङ चले संग संग मेरे
लिखने का इस क़दर जोश ओ जुनून मिल गया ।

माँ ने सुलाया जब गोद में, तो यूं लगा इरफ़ान
बेचैनी को मेरी जैसे मुकम्मल सुकून मिल गया ।।

– ‘राॅकशायर’ इरफ़ान अली ख़ान

जिस्म – शरीर
वतन – मातृभूमि
मुद्दत – अवधि
शायर – कवि
मज़्मून – लेखन का विषय
हर्फ़ – अक्षर
मुकम्मल – सम्पूर्ण

 
 

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