“मेरा दाहिना हाथ काँपता है”

मेरा दाहिना हाथ काँपता है ।
अक्सर जब भी मैं कोई चीज पकङता हूँ ।
जैसे चाय, काॅफ़ी या फिर
रोजमर्रा की ज़रूरत का कोई सामान ।

पता नहीं ऐसा क्यों होता है ?
कई दफ़ा लोग हँसते हैं मुझ पर
यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी ।

कभी जानने की कोशिश ही नहीं की मैंने
कि आख़िर ये मेरे साथ ही क्यों होता है ?

तभी एक दिन यूँ अचानक बैठे बैठे
अपनी कलाई पर बने हुए
उस चोट के निशान को देखते देखते
अपना बचपन याद आ गया ।

एक हादसा याद आया ।
जिस वक्त मैं बहुत छोटा था ।
फिर भी कुछ कुछ धुंधली यादें
ज़ेहन के अंदरूनी हिस्से में दबी पङी थी कहीं ।

शायद मैं पांच साल का रहा होगा ।
हमारे खेत पर एक
चारा काटने की मशीन लगी हुई थी ।
जिसे हम कुट्टी की मशीन कहते थे ।
मैं रोजाना उसे कौतूहल से देखता
कि ये चारा कैसे काट देती है ?
यूँही कुछ तिनके देकर उन्हें काटता रहता था ।

एक दिन पता नहीं मुझे क्या सूझी !
खेलते खेलते उस मशीन को ग़ौर से देखने लगा
और मन ही मन सोचने लगा !
आज तो पता लगाकर ही रहूंगा
कि ये साला सिस्टम है क्या ?
बाल मन में जिज्ञासा का कीङा जाग चुका था ।

चारे के साथ एकदम से यूँ अचानक
मेरा हाथ भी अंदर चला गया ।
और मैं जोर से चिल्लाया ।
वो तो उस मोटी ऊनी जर्सी ने बचा लिया
वरना उस दिन तो
मैं अपने हाथ से ही हाथ धो बैठता ।

बहुत खून निकला ।
और पापा ने भी खूब डांटा ।
मुझे तुरंत हाॅस्पिटल ले जाया गया ।
तीन टाँके आए दाहिनी कलाई पर
नब्ज़ के ठीक पास ।
खुदा ने बचा लिया उस दिन तो मरते मरते ।

मगर उस दिन के बाद से ही
ये हाथ काँपना शुरू हो गया ।

शायद अहसास की कोई नाज़ुक रग
कट गई थी उस रोज हादसे में कहीं !
इसीलिए ये दाया हाथ काँपता है मेरा ।

हर एक चीज इसे जाने क्यों
वहीं कुट्टी की मशीन लगती है ।
शायद इसीलिए डर के मारे काँपता है
या फिर यूँही बेवजह !

पता नहीं ये क्या है ?
पता नहीं ये क्यों है ?

गर जो भी हो
इतना ज़रूर यक़ीं है
कि ये कोई बीमारी नहीं है ।
सिर्फ डर है
मेरे अंदर का डर ।
जिस पर काबू पाना
सीख रहा हूँ मैं अब धीरे धीरे ।।

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