“भागते हुए पेङ”

भागते हुए से नज़र आते हैं पेङ
बस या ट्रेन में सफ़र करते हुए
अक्सर जब खिङकी से बाहर देखो तो
यही नज़ारा दिखता है ।

जाने किसके पीछे भाग रहे हैं ?

ट्रेन आगे की ओर भागती है
और पेङ पीछे की ओर ।

कई बार सोचा
कि रोककर पूछू इन्हें !
यूँ किसके पीछे भाग रहे हो तुम ?

पर फिर सोचा कि
किसी दौङते हुए को
बीच में ही क्यों टोका जाए !

बचपन में घर से खेत तक वो जो रेस लगती थी
बङी कमाल की होती थी वो ।
फर्स्ट आने पर ढ़ेर सारी टाॅफियां मिलती थी ।

शायद इन पेङो को भी
टाॅफियो का लालच दिया गया हो !

जब ट्रेन रूकती है तो ये भी रूक जाते हैं ।
रेस्ट करते हैं थोङी देर को
और फिर शुरू हो जाती है वही रेस ।

“वो बचपन का वहम अब तक नहीं टूटा
के पेङ नहीं भागते है बल्कि हम भागते हैं”

पेङ तो पैदाइश से लेकर मौत तक
हमेशा से वही खङे रहते हैं ।

इन्हें क्या मालूम सफ़र किसे कहते हैं ?

आज जब ट्रेन की खिङकी से बाहर
पेङो को यूँ बेलगाम भागते हुए देखा
तो पता चला
कि खुद से कितनी दूर आ गया हूँ
भागते भागते !

ख़्वाहिशों की इस ट्रेन का
कोई स्टोपेज नहीं दिखता कहीं !

चलती ही जा रही है बस
वक्त की पटरी पर यूँ नाॅनस्टोप ।
और वो जो चैन थी
इमरजेंसी ब्रेक के लिए
वो भी टूट चुकी है कब की यहाँ ।

अब तो पेडों के साथ साथ
खुद को भी भागते हुए देखता हूँ ।

वहम अच्छा है
अब तक नहीं टूटा
यकीनन पेङ भागते हैं
मैं तो आज भी वहीं पर ठहरा हुआ हूँ
जहाँ कल था ।
इन भागते हुए पेङो को देखते देखते
शायद मैं खुद एक पेङ बन गया हूँ
बिना फल फूल वाला सूखा पेङ ।।

RockShayar

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