“तलाक (Divorce)”

विवाह नामक संस्था को, बर्बाद करता है जो फोर्स
घोर मानसिक त्रासदी है जी, तलाक कहो चाहे डिवोर्स

कहाँ फँस गए रे भय्या, कोर्ट कचहरी के चक्कर में
ज़िंदगी खुद लुटाई अपनी, शादी ब्याह के चक्कर में

अलग अलग हैं धाराए, अलग अलग सब मुकदमे
खुद को कटघरे में पाकर, मिले वो मानसिक सदमे

चौपट हुआ कॅरिअर सब, हुई जो पैसों की बर्बादी
अब जाकर मालूम हुआ, महंगी है कितनी आज़ादी

स्त्रियों को मिले हैं जब से, मनमाने अधिकार यहाँ
पुरूषों के तो तब से ही वो, खो गए अधिकार यहाँ

घरवाले रिश्तेदार सब, कहते हैं समझौता कर लो
नसीब का खेल है ये, हालात से समझौता कर लो

बिगङते रिश्तों के खेल में, झूठी साज़िश के मेल में
फ्यूचर नज़र आता है अब तो, क़ैद किसी जेल में

विश्वास नहीं होता है अब, विश्वास पर भी यहाँ
खो गए वो जज़्बात सब, मिलता नहीं कोई निशां

मैरिज के नाम से ही यारों, अब तो नफ़रत हो गई
खुद को पाना ही बस, इस दिल की हसरत हो गई

गृहस्थी नामक संस्था को, बर्बाद करता है जो कोर्स
एक्सट्रीम मेंटल टाॅर्चर है जी, तलाक कहो चाहे डिवोर्स ।।

Copyright © 2016
RockShayar Irfan Ali Khan
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