“अपनी तो नींद उङ गई तेरे फ़साने में”

अपनी तो नींद उङ गई तेरे फ़साने में,
और तूने खुद आग लगाई मेरे आशियाने में ।

एक दिन में नहीं बन गया मैं ऐसा यहां,
सदियाँ लगी हैं मुझे तो तुझ को भुलाने में ।

याद रखना इक बात, मेरे जाने के बाद
मिलेगा न कोई मुझ जैसा इस जमाने में ।

वक़्त से मिला है वो, वक़्त तो लगेगा ही
लिखा है जो भी दिल पर, उसे मिटाने में ।

आसां नहीं है इतना, बरसों लग जाते हैं
दर्द में होकर भी यूं हर रोज मुस्कुराने में ।

मुकम्मल हो ही जाती, हमारी भी कहानी
अफ़सोस, तुमने देर कर दी ज़रा आने में ।

मरते वक़्त ये मालूम हुआ इरफ़ान मुझे,
ज़िन्दगी गुज़र गई खुद को आज़माने में ।।

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