“ख़्वाहिशें वो जब से मेरी बेहिसाब हो गई”

ख़्वाहिशें वो जब से मेरी बेहिसाब हो गई,
ज़िंदगी ये तब से मेरी इक अज़ाब हो गई ।

इरादों की धूल, बन गयी जिस रोज बवंडर
वक़्त की वो साज़िशें सब बेनक़ाब हो गई ।

खुद को पाने की, लगी है जब से तलब यहां
आदत की वो तब से आदत ख़राब हो गई ।

सवालों के सफ़र में, क्या करे उस नज़र का
जवाब ढूँढते ढूँढते जो लाजवाब हो गई ।

ये इश्क़ की बाज़ी है, कोई खेल नहीं मियाँ
यूं हारकर भी जीतने में कामयाब हो गई ।

मन की मनगढंत बातें, तन्हा रातें मुलाक़ातें
लिख नहीं पाया जिसे मैं वो किताब हो गई ।

मौत जब आई तो, पता यही चला इरफ़ान
ज़िंदगी की तलाश में ज़िंदगी ख़्वाब हो गई ।।

‪#‎RockShayar

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